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Assam Assembly Elections: विरासत से नहीं, सरोकारों से उठी सियासत की नई लहर; असम चुनाव में जेन जी का उभार
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सार
राजनीति अब विरासत से निकलकर योग्यता, शिक्षा और जमीनी जुड़ाव की ओर बढ़ती दिख रही है। ये नए चेहरा सियासी परिवार से नहीं हैं, न किसी बड़े नेता के बेटे-बेटियां हैं, न पारंपरिक सत्ता ढांचे का हिस्सा। वे छात्र आंदोलनों, सामाजिक काम और पेशेवर अनुभव के दम पर यहां तक पहुंचे हैं।
असम विधानसभा चुनाव 2026
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
असम इस बार सियासत में पीढ़ीगत बदलाव का गवाह भी बनने जा रहा है। 126 सीटों वाली विधानसभा के लिए छह लाख से अधिक युवा मतदाता जब पहली बार वोट डालेंगे, तो उनके सामने युवा और उम्मीद भरे चेहरे भी होंगे। राजनीतिक दलों ने 34 वर्ष तक के युवाओं को बड़ी संख्या में टिकट दिए हैं...यह महज युवा चेहरों की मौजूदगी नहीं, बल्कि जेन-जी और नए दौर के नेतृत्व का उभार है।
राजनीति अब विरासत से निकलकर योग्यता, शिक्षा और जमीनी जुड़ाव की ओर बढ़ती दिख रही है। ये नए चेहरा सियासी परिवार से नहीं हैं, न किसी बड़े नेता के बेटे-बेटियां हैं, न पारंपरिक सत्ता ढांचे का हिस्सा। वे छात्र आंदोलनों, सामाजिक काम और पेशेवर अनुभव के दम पर यहां तक पहुंचे हैं। ऐसे चेहरे सिर्फ नारों से नहीं, अनुभव और तैयारी के साथ राजनीति में आ रहे हैं। बदलाव सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि सोच का भी है, जहां पार्टियां अब जीत के लिए नए चेहरों और नई ऊर्जा पर दांव लगा रही हैं।
चाय बागान से उठी बेरोजगारी की आवाज
राइजोर दल से मार्गेरिटी से प्रत्याशी राहुल छेत्री साधारण चाय बागान पृष्ठभूमि से छात्र आंदोलनों के जरिये यहां तक पहुंचे हैं। डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय से पढ़े राहुल बेरोजगारी, शिक्षा और बुनियादी ढांचे को चुनावी बहस के केंद्र में ला रहे हैं।
छात्र राजनीति से बनाई पहचान
जुबैर अनाम मजूमदार अल्गापुर-कटलीछेरा से कांग्रेस उम्मीदवार हैं। यूथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जुबैर मुखर और आक्रामक युवा नेता के रूप में उभरे हैं। संगठन, डिजिटल पहुंच और विरोध की राजनीति, तीनों में उनकी सक्रियता दिखती है।
सुरक्षित करिअर छोड़ सियासत में उतरीं
राइजोर दल ने मरियानी से डॉ. ज्ञानश्री बोरा को अपना प्रत्याशी बनाया है। वह सुरक्षित कॅरिअर छोड़कर राजनीति में उतरी हैं। रसायनशास्त्र में पीएचडी करने वाली ज्ञानश्री कॉलेज की नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरने से पहले एंटी-सीएए आंदोलन का सक्रिय चेहरा रही हैं। बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाएं व महिलाओं की भागीदारी उनके प्रमुख मुद्दे हैं।
पहाड़ों से उभरा आदिवासी चेहरा
बीएचयू से पढ़ाई के बाद जिला स्वायत्त परिषद में सक्रिय रहीं रुपाली लांगथासा (36 वर्ष) आदिवासी समाज की नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका फोकस क्षेत्रीय विकास और सांस्कृतिक पहचान के संतुलन पर है। भाजपा ने रुपाली को हाफलांग से उतारा है।
वैश्विक अनुभव के साथ स्थानीय मुद्दों पर सक्रिय
असम जातीय परिषद के टिकट पर सेंट्रल गुवाहाटी से उम्मीदवार कुनकी चौधरी वैश्विक अनुभव और स्थानीय मुद्दों के साथ आगे बढ़ रहीं हैं। लंदन से मास्टर्स करने वाली कुनकी कॉरपोरेट कॅरिअर छोड़ राजनीति में आई हैं। शिक्षा और कौशल विकास पर काफी काम किया है।
संगठन से निकला जमीनी चेहरा
भाजपा ने पवित्र राभा को गोलपाड़ा वेस्ट से प्रत्याशी बनाया है। छात्र राजनीति से शुरुआत कर युवा मोर्चा तक पहुंचे पवित्र राभा ने संगठन के जरिए अपनी पहचान बनाई। उनका एजेंडा स्थानीय विकास व रोजगार पर केंद्रित है।
मध्य वर्ग का प्रतिनिधित्व
डेविड टी. फुकन को कांग्रेस ने तिनसुकिया से प्रत्याशी बनाया है। प्रबंधन की पढ़ाई के बाद सामाजिक कार्यों से जुड़े फुकन औद्योगिक और चाय बागान की समस्याओं, शिक्षा, रोजगार व इंफ्रास्ट्रक्चर को एजेंडा बना रहे हैं।
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राजनीति अब विरासत से निकलकर योग्यता, शिक्षा और जमीनी जुड़ाव की ओर बढ़ती दिख रही है। ये नए चेहरा सियासी परिवार से नहीं हैं, न किसी बड़े नेता के बेटे-बेटियां हैं, न पारंपरिक सत्ता ढांचे का हिस्सा। वे छात्र आंदोलनों, सामाजिक काम और पेशेवर अनुभव के दम पर यहां तक पहुंचे हैं। ऐसे चेहरे सिर्फ नारों से नहीं, अनुभव और तैयारी के साथ राजनीति में आ रहे हैं। बदलाव सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि सोच का भी है, जहां पार्टियां अब जीत के लिए नए चेहरों और नई ऊर्जा पर दांव लगा रही हैं।
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चाय बागान से उठी बेरोजगारी की आवाज
राइजोर दल से मार्गेरिटी से प्रत्याशी राहुल छेत्री साधारण चाय बागान पृष्ठभूमि से छात्र आंदोलनों के जरिये यहां तक पहुंचे हैं। डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय से पढ़े राहुल बेरोजगारी, शिक्षा और बुनियादी ढांचे को चुनावी बहस के केंद्र में ला रहे हैं।
छात्र राजनीति से बनाई पहचान
जुबैर अनाम मजूमदार अल्गापुर-कटलीछेरा से कांग्रेस उम्मीदवार हैं। यूथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जुबैर मुखर और आक्रामक युवा नेता के रूप में उभरे हैं। संगठन, डिजिटल पहुंच और विरोध की राजनीति, तीनों में उनकी सक्रियता दिखती है।
सुरक्षित करिअर छोड़ सियासत में उतरीं
राइजोर दल ने मरियानी से डॉ. ज्ञानश्री बोरा को अपना प्रत्याशी बनाया है। वह सुरक्षित कॅरिअर छोड़कर राजनीति में उतरी हैं। रसायनशास्त्र में पीएचडी करने वाली ज्ञानश्री कॉलेज की नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरने से पहले एंटी-सीएए आंदोलन का सक्रिय चेहरा रही हैं। बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाएं व महिलाओं की भागीदारी उनके प्रमुख मुद्दे हैं।
पहाड़ों से उभरा आदिवासी चेहरा
बीएचयू से पढ़ाई के बाद जिला स्वायत्त परिषद में सक्रिय रहीं रुपाली लांगथासा (36 वर्ष) आदिवासी समाज की नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका फोकस क्षेत्रीय विकास और सांस्कृतिक पहचान के संतुलन पर है। भाजपा ने रुपाली को हाफलांग से उतारा है।
वैश्विक अनुभव के साथ स्थानीय मुद्दों पर सक्रिय
असम जातीय परिषद के टिकट पर सेंट्रल गुवाहाटी से उम्मीदवार कुनकी चौधरी वैश्विक अनुभव और स्थानीय मुद्दों के साथ आगे बढ़ रहीं हैं। लंदन से मास्टर्स करने वाली कुनकी कॉरपोरेट कॅरिअर छोड़ राजनीति में आई हैं। शिक्षा और कौशल विकास पर काफी काम किया है।
संगठन से निकला जमीनी चेहरा
भाजपा ने पवित्र राभा को गोलपाड़ा वेस्ट से प्रत्याशी बनाया है। छात्र राजनीति से शुरुआत कर युवा मोर्चा तक पहुंचे पवित्र राभा ने संगठन के जरिए अपनी पहचान बनाई। उनका एजेंडा स्थानीय विकास व रोजगार पर केंद्रित है।
मध्य वर्ग का प्रतिनिधित्व
डेविड टी. फुकन को कांग्रेस ने तिनसुकिया से प्रत्याशी बनाया है। प्रबंधन की पढ़ाई के बाद सामाजिक कार्यों से जुड़े फुकन औद्योगिक और चाय बागान की समस्याओं, शिक्षा, रोजगार व इंफ्रास्ट्रक्चर को एजेंडा बना रहे हैं।
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