बारूद और धन से आगे: शक्ति संतुलन का नया व्याकरण दिल्ली में लिखा गया, पश्चिम का चश्मा इसे अबतक नहीं पढ़ पाया है
ब्रिक्स शिखर बैठक में 20 से अधिक देशों से दिल्ली आए मेहमान विदा हो चुके हैं। भारत मंडपम में आयोजित इस शिखर सम्मेलन ने यही साबित किया है कि मतभेद के बावजूद रिश्ते चल सकते हैं।बारूद और धन से आगे बढ़ते हुए शक्ति संतुलन का नया व्याकरण दिल्ली में लिखा गया। हालांकि, पश्चिम का चश्मा इसे अब तक नहीं पढ़ पाया है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
तीन दिन में 15 द्विपक्षीय बैठकें और इनके अलावा गलियारों में हुई वे मुलाकातें, जो कार्यक्रम सूची में दर्ज नहीं होतीं। ब्रिक्स के इस 18वें शिखर सम्मेलन का असली हासिल घोषणापत्र के पैराग्राफ नहीं, भारत मंडपम की वह मेज और उसके आसपास के वे गलियारे हैं, जहां आपस में टकराती धाराएं एक ही छत के नीचे आईं। मेजबान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति की परीक्षा मंच पर कम और इसी हाशिये पर ज्यादा हुई।
शक्ति का संतुलन अब केवल बारूद की गूंज और धन की धमक से तय नहीं हो रहा। वे देश भी एक-दूसरे के सामने बैठ सकते हैं, जो किसी दूसरे मोर्चे पर युद्ध की स्थिति में उलझे हैं। अठारहवें ब्रिक्स का सबसे बड़ा हासिल यही क्षमता है। घोषणापत्र के पैराग्राफ से ज्यादा महत्वपूर्ण वह राजनीतिक जगह है, जहां असहमति के बावजूद संवाद चलता रहा। यही वह नया व्याकरण है, जिसे पश्चिम का चश्मा अब तक पूरी तरह पढ़ नहीं पाया है।
पहली पंक्ति शनिवार को लिखी गई। पश्चिम एशिया में युद्ध के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष नेतृत्व की मुलाकात हुई। यह तब हुआ, जब घोषणापत्र में ईरान से जुड़ी भाषा पर तेहरान और अबूधाबी के मतभेद खुलकर मेज पर आ चुके थे। संदेश साफ था। मतभेद दर्ज हुआ, लेकिन रिश्ता टूटा नहीं।
जो पंक्तियों के बीच है
दूसरी पंक्ति शी जिनपिंग के भाषण में है और वह पहली नजर में जितनी आक्रामक दिखती है, उससे अधिक व्यापक है। ‘ताकत ही अधिकार है’ वाला तर्क अब नहीं चलता। यह सिर्फ वॉशिंगटन पर हमला नहीं है। यह स्वीकारोक्ति भी है कि जिस व्यवस्था को बीजिंग चुनौती देता रहा, उसका एकतरफा मॉडल अब चीन के लिए भी असुविधाजनक हो सकता है।
तीसरी पंक्ति सबसे बारीक है। रविवार को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों का हथियारीकरण साझा प्रगति में बाधा बन सकता है। खनिज का सबसे बड़ा भंडार चीन के पास था। चेतावनी उसी हॉल में दी गई, जहां चीनी राष्ट्रपति मौजूद थे, और किसी ने मेज नहीं छोड़ी।
चौथी पंक्ति घोषणापत्र में है। विश्व व्यापार संगठन के नियमों से असंगत एकतरफा शुल्क पर गंभीर चिंता दर्ज हुई, लेकिन किसी देश का नाम नहीं लिया गया। यह कमजोरी नहीं, चुनाव है। नाम लेते ही दस्तावेज खेमेबंदी का बयान बन जाता और मंच की उपयोगिता उसी दिन कमजोर पड़ जाती।
एजेंडा दिल्ली का कैलेंडर बीजिंग का
सबसे अहम तथ्य समापन सत्र में आया। 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता चीन के पास जाएगी और उन्नीसवें शिखर सम्मेलन की मेजबानी भी वही करेगा। घोषणापत्र में इसका समर्थन दर्ज है। सीधा मतलब यह है कि दिल्ली ने जो एजेंडा तय किया, उसका कैलेंडर अगले साल बीजिंग चलाएगा। यहीं से भविष्य की असली रेखा खिंचती है। प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक शासन सुधार के लिए दस प्रस्ताव तैयार करने और उन्हें अगले शिखर सम्मेलन तक ब्रिक्स सुधार रोडमैप में बदलने का सुझाव दिया था।
- इसके तीन आधार रखे गए, प्रतिनिधित्व, प्रतिक्रियाशीलता और नियम निर्माण। सुरक्षा परिषद सुधार पर भारत की मांग थी कि पाठ आधारित वार्ता निश्चित समयसीमा और ठोस नतीजों से जुड़े।
- शी जिनपिंग ने ब्रिक्स एआई ओपन सोर्स कम्युनिटी का प्रस्ताव दिया है। नियम गढ़ने की दौड़ अब सिर्फ तकनीक की नहीं, मानकों और शासन की भी है। तीसरी, महत्वपूर्ण खनिजों पर भारत की चेतावनी किसी ठोस तंत्र में बदलती है या भाषण भर रह जाती है। मोदी ने खुद कहा कि दुनिया अब विचार और वादे नहीं, ठोस नतीजे चाहती है। यह वाक्य अगले मेजबान के लिए चुनौती भी है और समीक्षा का पैमाना भी।
मेज पर बने रहना भी रणनीति
ग्यारह सदस्यों के हित एक जैसे नहीं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, पाकिस्तान और हिंद महासागर की प्रतिस्पर्धा जैसे सवाल हैं। स्टिमसन सेंटर की यून सन इसे अभी सतही सुधार मानती हैं। लेकिन सतही सुधार भी सुधार है, अगर उसके पीछे एक साल का ठोस कार्यक्रम हो। यही इस शिखर सम्मेलन का व्यावहारिक निष्कर्ष है, हर विवाद सैन्य तरीके से नहीं निपटता और मेज पर बने रहना भी एक रणनीति है।