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Parliament: पश्चिम एशिया संकट पर संसद में चर्चा की संभावना कम, सवाल की इजाजत न मिलने पर विपक्ष का वॉकआउट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Mon, 09 Mar 2026 04:20 PM IST
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सार
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण आज से शुरू हो गया है। लोकसभा में आज विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने पश्चिम एशिया में मौजूदा संघर्ष पर बयान दिया है, जिस पर विपक्ष की तरफ से चर्चा की मांग की गई। लेकिन पीठसीन अध्यक्ष की तरफ से अनुमति न मिलने विपक्ष ने सदन से वॉकआउट किया और सरकार पर कई आरोप लगाए हैं।
संसद की फाइल तस्वीर
- फोटो : ANI
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विस्तार
संसद के बजट सत्र के दौरान पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध को लेकर फिलहाल संसद में विस्तृत चर्चा होने की संभावना कम बताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक संसदीय नियमों के अनुसार यदि किसी मंत्री ने किसी महत्वपूर्ण और तात्कालिक विषय पर स्वयं से दिया गया बयान दे दिया है, तो उस पर अलग से चर्चा कराने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं होता।
भारत ने सभी से संयम बरतने की अपील की थी- जयशंकर
विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले ही राज्यसभा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर सरकार का पक्ष रख चुके हैं। उन्होंने सदन को बताया कि प्रधानमंत्री लगातार इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और संबंधित मंत्रालय स्थिति के अनुसार जरूरी कदमों के लिए समन्वय कर रहे हैं। डॉ. जयशंकर ने कहा कि भारत सरकार ने 20 फरवरी को ही बयान जारी कर क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता जताई थी और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की थी। उन्होंने दोहराया कि भारत का मानना है कि हालात को शांत करने के लिए संवाद और कूटनीति ही सबसे बेहतर रास्ता है।
यह भी पढ़ें - आइरिस लावन को भारत में पनाह दिए जाने पर क्या बोली सरकार?: संसद में जयशंकर ने बताया- ईरानी समकक्ष मदद के आभारी
भारत ने युद्ध को लेकर जताई थी चिंता- जयशंकर
विदेश मंत्री ने यह भी बताया कि 28 फरवरी 2026 को भारत ने आधिकारिक तौर पर इस युद्ध को लेकर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में लगातार बढ़ती हिंसा, लोगों की मौत और ईरान के नेतृत्व तंत्र के ढहने जैसी घटनाएं बेहद गंभीर हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तनाव कम करने के लिए आगे आना चाहिए।
'सरकार को विपक्ष के सवालों का जवाब भी देना चाहिए'
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि अगर मंत्री केवल बयान दें और उस पर कोई चर्चा या सवाल की अनुमति न हो, तो ऐसे बयान का कोई मतलब नहीं रह जाता। वहीं शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि यदि सरकार संसद में बयान देने आती है तो उसे विपक्ष के सवालों का जवाब भी देना चाहिए। सवालों की अनुमति न मिलने के कारण ही विपक्ष ने वॉकआउट का फैसला लिया।
अन्य कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा, 'हमारे कांग्रेस सहयोगियों द्वारा पेश किया जाने वाला प्रस्ताव आज लोकसभा में सूचीबद्ध किया गया था। हालांकि, पिछले 13 दिनों से पश्चिम एशिया और बृहत्तर मध्य पूर्व में स्थिति बिगड़ती जा रही है। भारत का एक विशाल प्रवासी समुदाय है, खाड़ी देशों और बृहत्तर मध्य पूर्व में चार करोड़ से अधिक लोग रहते हैं। बिगड़ती स्थिति के कारण वे ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। वे भारत की रणनीतिक अर्थव्यवस्था को लेकर भी चिंतित हैं। इसलिए, मंत्री के बयान के बाद, यह आवश्यक था कि इस पर पूरी चर्चा हो। संसद केवल एक नोटिस बोर्ड नहीं है जहां मंत्री आकर अपने बयान देते हैं और उसके बाद कोई चर्चा नहीं होती। ऐसी स्थिति में जब पूरी दुनिया पश्चिम एशिया और बृहत्तर मध्य पूर्व में हो रही घटनाओं को लेकर चिंतित है, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और उसके सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंदिर में इस पर चर्चा न होना एक घोर अन्याय होगा। यही कारण है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल संयुक्त रूप से इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए।' वहीं कांग्रेस सांसद के. सुरेश ने कहा, 'अगर सरकार और अध्यक्ष पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा के लिए विपक्षी दलों द्वारा लाए गए स्थगन प्रस्ताव पर सहमत हो जाते हैं, तो सरकारी खजाने को नुकसान नहीं होगा। लेकिन सरकार ने पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा के लिए पूरे विपक्ष की मांग से सहमति नहीं जताई। इसलिए सरकार जगदंबिका पाल को इस तरह की बातें कहने के लिए निर्देश देती है।' इस मुद्दे पर हिबी ईडन ने कहा, 'यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार ने उन स्थानों पर फंसे लोगों को वापस लाने के लिए कोई रचनात्मक कदम नहीं उठाए हैं। उन्होंने विदेशों में, विशेषकर पश्चिम एशिया के देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की है, जहां वे भारी संकट का सामना कर रहे हैं… हम इन देशों में अपनी आजीविका चलाने वाले लोगों के लिए बहुत चिंतित हैं… कांग्रेस संसद में इस विशेष मुद्दे पर चर्चा की मांग करती है।'
यह भी पढ़ें - West Bengal: 'सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में तय होगा SIR मामला', TMC ने चुनाव आयोग से सुनवाई न होने पर जताई नाराजगी
अमेरिका-इस्राइल का ईरान पर हमला
दरअसल, पश्चिम एशिया में यह बड़ा युद्ध 28 फरवरी को उस समय शुरू हुआ था जब अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर बड़े सैन्य हमले किए। इन हमलों में ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत सत्ता के कई अहम नेताओं की मौत हो गई थी। इसके बाद से पूरे क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया है और हाल के दिनों में तेल डिपो तथा पानी के प्लांट जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों पर भी हमले की खबरें सामने आई हैं। इस वजह से पश्चिम एशिया की स्थिति लगातार गंभीर बनी हुई है और भारत समेत कई देश हालात पर कड़ी नजर रखे हुए हैं।
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भारत ने सभी से संयम बरतने की अपील की थी- जयशंकर
विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले ही राज्यसभा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर सरकार का पक्ष रख चुके हैं। उन्होंने सदन को बताया कि प्रधानमंत्री लगातार इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और संबंधित मंत्रालय स्थिति के अनुसार जरूरी कदमों के लिए समन्वय कर रहे हैं। डॉ. जयशंकर ने कहा कि भारत सरकार ने 20 फरवरी को ही बयान जारी कर क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता जताई थी और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की थी। उन्होंने दोहराया कि भारत का मानना है कि हालात को शांत करने के लिए संवाद और कूटनीति ही सबसे बेहतर रास्ता है।
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भारत ने युद्ध को लेकर जताई थी चिंता- जयशंकर
विदेश मंत्री ने यह भी बताया कि 28 फरवरी 2026 को भारत ने आधिकारिक तौर पर इस युद्ध को लेकर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में लगातार बढ़ती हिंसा, लोगों की मौत और ईरान के नेतृत्व तंत्र के ढहने जैसी घटनाएं बेहद गंभीर हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तनाव कम करने के लिए आगे आना चाहिए।
'सरकार को विपक्ष के सवालों का जवाब भी देना चाहिए'
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि अगर मंत्री केवल बयान दें और उस पर कोई चर्चा या सवाल की अनुमति न हो, तो ऐसे बयान का कोई मतलब नहीं रह जाता। वहीं शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि यदि सरकार संसद में बयान देने आती है तो उसे विपक्ष के सवालों का जवाब भी देना चाहिए। सवालों की अनुमति न मिलने के कारण ही विपक्ष ने वॉकआउट का फैसला लिया।
अन्य कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा, 'हमारे कांग्रेस सहयोगियों द्वारा पेश किया जाने वाला प्रस्ताव आज लोकसभा में सूचीबद्ध किया गया था। हालांकि, पिछले 13 दिनों से पश्चिम एशिया और बृहत्तर मध्य पूर्व में स्थिति बिगड़ती जा रही है। भारत का एक विशाल प्रवासी समुदाय है, खाड़ी देशों और बृहत्तर मध्य पूर्व में चार करोड़ से अधिक लोग रहते हैं। बिगड़ती स्थिति के कारण वे ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। वे भारत की रणनीतिक अर्थव्यवस्था को लेकर भी चिंतित हैं। इसलिए, मंत्री के बयान के बाद, यह आवश्यक था कि इस पर पूरी चर्चा हो। संसद केवल एक नोटिस बोर्ड नहीं है जहां मंत्री आकर अपने बयान देते हैं और उसके बाद कोई चर्चा नहीं होती। ऐसी स्थिति में जब पूरी दुनिया पश्चिम एशिया और बृहत्तर मध्य पूर्व में हो रही घटनाओं को लेकर चिंतित है, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और उसके सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंदिर में इस पर चर्चा न होना एक घोर अन्याय होगा। यही कारण है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल संयुक्त रूप से इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए।' वहीं कांग्रेस सांसद के. सुरेश ने कहा, 'अगर सरकार और अध्यक्ष पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा के लिए विपक्षी दलों द्वारा लाए गए स्थगन प्रस्ताव पर सहमत हो जाते हैं, तो सरकारी खजाने को नुकसान नहीं होगा। लेकिन सरकार ने पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा के लिए पूरे विपक्ष की मांग से सहमति नहीं जताई। इसलिए सरकार जगदंबिका पाल को इस तरह की बातें कहने के लिए निर्देश देती है।' इस मुद्दे पर हिबी ईडन ने कहा, 'यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार ने उन स्थानों पर फंसे लोगों को वापस लाने के लिए कोई रचनात्मक कदम नहीं उठाए हैं। उन्होंने विदेशों में, विशेषकर पश्चिम एशिया के देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की है, जहां वे भारी संकट का सामना कर रहे हैं… हम इन देशों में अपनी आजीविका चलाने वाले लोगों के लिए बहुत चिंतित हैं… कांग्रेस संसद में इस विशेष मुद्दे पर चर्चा की मांग करती है।'
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अमेरिका-इस्राइल का ईरान पर हमला
दरअसल, पश्चिम एशिया में यह बड़ा युद्ध 28 फरवरी को उस समय शुरू हुआ था जब अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर बड़े सैन्य हमले किए। इन हमलों में ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत सत्ता के कई अहम नेताओं की मौत हो गई थी। इसके बाद से पूरे क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया है और हाल के दिनों में तेल डिपो तथा पानी के प्लांट जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों पर भी हमले की खबरें सामने आई हैं। इस वजह से पश्चिम एशिया की स्थिति लगातार गंभीर बनी हुई है और भारत समेत कई देश हालात पर कड़ी नजर रखे हुए हैं।
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