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कैंसर की दवाओं पर सीमित होगा ट्रेड मार्जिन: सुप्रीम कोर्ट का सवाल- 78 रुपये की दवा का एमआरपी 2,850 क्यों?

Mon, 12 Oct 2026 05:35 PM IST
देवेश त्रिपाठी आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Mon, 12 Oct 2026 05:35 PM IST
सार

केंद्र सरकार कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को एमआरपी के 30 प्रतिशत तक सीमित करने की तैयारी कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रस्ताव के साथ ही अन्य दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में बड़े अंतर पर भी चिंता जताई। अदालत ने मौजूदा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था पर केंद्र से जवाब मांगा है।

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Centre to cap trade margins on cancer drugs 30 percent Supreme Court calls for broader price review
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला किया है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करने की जरूरत पर जोर दिया।
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केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ को बताया कि सरकार उन कैंसर की दवाओं की सूची अधिसूचित करेगी, जिन पर ट्रेड मार्जिन की यह सीमा लागू होगी। उन्होंने कहा कि बाजार में होने वाले बदलाव और जन स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरतों को देखते हुए इस सूची में समय-समय पर नई दवाएं जोड़ी जा सकती हैं। हालांकि, कम कीमत वाली दवाओं को इस व्यवस्था से बाहर रखा जाएगा।
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दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की उस कीमत पर बार-बार सवाल उठाए हैं, जिस पर वे खुदरा विक्रेताओं को बेची जाती हैं और पैकेट पर दर्ज एमआरपी के बीच बड़ा अंतर होता है। अदालत ने कहा कि इस अंतर से मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। साथ ही, दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था की जरूरत है। हालांकि, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अगुवाई वाली पीठ ने सवाल किया कि क्या सरकार का प्रस्ताव केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित समस्या को दूर कर पाएगा, जबकि अन्य दवाओं और चिकित्सा उपकरणों पर भी भारी ट्रेड मार्जिन का मुद्दा है।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने भारत में बने एक हार्ट स्टेंट का उदाहरण दिया। पीठ ने कहा कि एक स्टेंट खुदरा विक्रेताओं को करीब 5,000 रुपये में दिया जाता है, जबकि उसका एमआरपी 25,000 रुपये है। अदालत ने पूछा कि कीमतों में इतने बड़े अंतर का क्या औचित्य है। इस पर तुषार मेहता ने कहा कि स्टेंट पहले से ही मूल्य सीमा के दायरे में हैं।

78 रुपये की दवा पर 2,850 रुपये का एमआरपी
सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य दवा का उदाहरण देते हुए बताया कि उसका एमआरपी 2,850 रुपये है, जबकि स्टॉकिस्ट को उसकी कीमत 78.29 रुपये पड़ती है। पीठ ने केंद्र से पूछा कि कीमतों में इस तरह के अंतर से मरीजों को क्या लाभ मिलता है।  अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार की नीति में कीमत के अलावा दवाओं की उपलब्धता और बाजार से जुड़े पहलुओं का भी ध्यान रखना पड़ता है।

उनके अनुसार, मरीजों के लिए दवाओं को किफायती बनाने और उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के बीच संतुलन जरूरी है। सरकार के वकील ने कहा, "हम दवाओं की पूरी व्यवस्था को नियंत्रित नहीं करना चाहते।" उन्होंने दलील दी कि सरकार के अत्यधिक हस्तक्षेप से बाजार और दवाओं की उपलब्धता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

पूरे दवा क्षेत्र में मूल्य नियंत्रण पर विचार की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि सरकार दवाओं की पूरी श्रेणी को नियंत्रित क्यों नहीं कर सकती। पीठ ने केंद्र से यह भी बताने को कहा कि मौजूदा मूल्य निर्धारण व्यवस्था मरीजों के हितों की रक्षा किस तरह करती है। अदालत ने ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर, 2013 का भी उल्लेख किया। उसने सवाल किया कि मूल्य नियंत्रण के दायरे में आने वाली दवाएं निर्धारित ट्रेड मार्जिन के बावजूद उपभोक्ताओं तक किस तरह पहुंचती हैं। अब इस मामले में अगली सुनवाई 27 अक्तूबर को होगी।

दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों को लेकर याचिकाएं
यह मामला जनहित याचिकाओं से जुड़ा है। इनमें दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने, मूल्य नियंत्रण की सूची में शामिल नहीं होने वाली दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने, चिकित्सा उपकरणों, जेनेरिक दवाओं और डॉक्टरों के पर्चे पर दवा लिखने की व्यवस्था को नियंत्रित करने की मांग की गई है।

पिछली सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि दवा निर्माता कंपनियों को खुदरा विक्रेताओं को दवा जिस कीमत पर दी जाती है, उससे कहीं अधिक एमआरपी तय करने की अनुमति क्यों दी जाती है। 22 सितंबर को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अगुवाई वाली पीठ ने कैंसर की एक जरूरी दवा की खुदरा खरीद कीमत और एमआरपी के बीच दस गुना अंतर को "दिनदहाड़े डकैती" बताया था।

29 सितंबर को अदालत ने सवाल किया था कि दवा उत्पादों पर एक समान ट्रेड मार्जिन सीमा क्यों नहीं तय की जा सकती। उसने कॉरपोरेट अस्पतालों की उस प्रथा पर भी चिंता जताई थी, जिसमें मरीजों को अस्पताल के भीतर मौजूद फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए कहा जाता है।

फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग पर भी विचार
यह सुनवाई ऐसे समय हुई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग मामले में केंद्र को फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के नियमन की जरूरत की समीक्षा के लिए समिति गठित करने का निर्देश दिया है।


समिति डॉक्टरों को दवाओं के प्रचार के लिए दिए जाने वाले उपहार, आतिथ्य और अन्य लाभों सहित विभिन्न गतिविधियों पर विचार करेगी। उसे संबंधित पक्षों के सुझावों और आपत्तियों पर गौर करने के बाद यह सिफारिश करनी है कि फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए वैधानिक व्यवस्था की जरूरत है या नहीं।
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