बार एसोसिएशनों के विरोध से अटकी रिटायर्ड जजों की नियुक्ति: लंबित मुकदमों पर कैसे लगेगी लगाम? सीजेआई ने बताया
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि बार एसोसिएशनों के विरोध के कारण सेवानिवृत्त जजों को हाईकोर्ट में दोबारा नियुक्त करने की पहल आगे नहीं बढ़ सकी। इस व्यवस्था का मकसद लंबित मुकदमों का बोझ कम करना था। सुप्रीम कोर्ट ने 18 लाख से अधिक लंबित आपराधिक मामलों के बीच तदर्थ जजों की नियुक्ति की अनुमति दी थी। ऐसे में सवाल है कि बार का विरोध क्यों हुआ? क्या इससे मुकदमों के निपटारे में देरी बढ़ सकती है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
विस्तार
नई दिल्ली में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा है कि हाईकोर्ट में लंबित मुकदमों का बोझ कम करने के लिए सेवानिवृत्त जजों को दोबारा नियुक्त करने की पहल बार एसोसिएशनों के विरोध के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को फिर से शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन वकीलों के संगठनों ने प्रस्ताव के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए। सीजेआई के मुताबिक, बार की नाराजगी का जोखिम उठाना किसी भी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के लिए आसान नहीं है।
सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति की पहल क्यों रुकी?
सीजेआई सूर्यकांत ने गुरुवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान यह बात कही। उनके साथ जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी पीठ में शामिल थे। मामला राजस्थान में न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने बताया कि पूर्व सीजेआई एसए बोबडे, जस्टिस संजय किशन कौल और उनकी पीठ ने सेवानिवृत्त जजों को हाईकोर्ट में तदर्थ यानी अस्थायी जज के तौर पर नियुक्त करने की व्यवस्था दोबारा शुरू करने की कोशिश की थी। इसका उद्देश्य लंबित मुकदमों के निपटारे में तेजी लाना था। हालांकि, बार एसोसिएशनों के विरोध के कारण यह पहल आगे नहीं बढ़ पाई।
संविधान का कौन-सा अनुच्छेद देता है दोबारा नियुक्ति की अनुमति?
संविधान का अनुच्छेद 224ए हाईकोर्ट में सेवानिवृत्त जजों को अस्थायी रूप से दोबारा नियुक्त करने का प्रावधान करता है। इसके तहत जरूरत पड़ने पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की पहल पर सेवानिवृत्त जजों को तदर्थ जज के रूप में काम करने के लिए बुलाया जा सकता है। इस व्यवस्था का मकसद अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करना और सुनवाई की रफ्तार बढ़ाना है। सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी 2025 को 18 लाख से अधिक लंबित आपराधिक मामलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट को तदर्थ जज नियुक्त करने की अनुमति दी थी। हालांकि, ऐसी नियुक्तियों की संख्या संबंधित हाईकोर्ट की स्वीकृत जज संख्या के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।
बार एसोसिएशनों के विरोध से क्या परेशानी हुई?
सीजेआई ने कहा कि बार एसोसिएशनों ने इस पहल का विरोध करते हुए प्रस्ताव पारित किए। उनके मुताबिक, किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के लिए वकीलों के संगठन को नाराज करने का जोखिम उठाना मुश्किल होता है। इस वजह से सेवानिवृत्त जजों को दोबारा नियुक्त करने की योजना आगे नहीं बढ़ सकी। इस व्यवस्था के जरिए अनुभवी जजों की सेवाएं लेकर मुकदमों के निपटारे में मदद मिल सकती थी। लेकिन विरोध के कारण इस दिशा में अपेक्षित पहल नहीं हो पाई। सीजेआई की टिप्पणी से अदालतों में लंबित मामलों को कम करने के प्रयासों में सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों का पता चलता है।
पेंशन के कारण न्यायिक सेवा छोड़ रहे अधिकारी, क्या है पूरा मामला?
सीजेआई सूर्यकांत ने हरियाणा और पंजाब के दो न्यायिक अधिकारियों का उदाहरण भी दिया, जिन्होंने सात से आठ साल तक सेवा करने के बाद इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने बताया कि दोनों अधिकारी पहले हाईकोर्ट में वकालत करते थे और काफी प्रतिभाशाली थे। सीजेआई के मुताबिक, उनमें से एक अधिकारी ने उनसे मुलाकात के दौरान बताया कि नए पेंशन नियमों के कारण सेवानिवृत्ति के बाद उसे 25 हजार रुपये से अधिक पेंशन नहीं मिलेगी। ऐसे में उसके लिए भविष्य में गुजारा करना मुश्किल होगा। इसलिए उसने न्यायिक सेवा छोड़कर फिर से वकालत शुरू करने का फैसला किया। यह उदाहरण न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन से जुड़ी चिंता को सामने लाता है।
न्यायिक अधिकारियों की पेंशन का मुद्दा क्यों उठा?
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता पीएस पटवालिया ने अदालत से न्यायिक अधिकारियों की पेंशन के मुद्दे पर विचार करने का अनुरोध किया। यह मांग ऐसे समय उठी, जब सीजेआई ने बताया कि पेंशन नियमों को लेकर चिंता के कारण दो न्यायिक अधिकारी सेवा छोड़ चुके हैं। न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों का दबाव कम करने के लिए अनुभवी जजों की उपलब्धता के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तें भी महत्वपूर्ण हैं। एक ओर सेवानिवृत्त जजों को दोबारा नियुक्त करने की पहल विरोध के कारण रुक गई, वहीं दूसरी ओर पेंशन से जुड़ी चिंताओं के कारण अधिकारियों के न्यायिक सेवा छोड़ने का मामला सामने आया है।