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CRPF: 30 वर्ष पुरानी भूली हुई शहादत को याद करने के लिए छुट्टी लेकर गांव पहुंचे सीआरपीएफ जवान, पढ़िये ये अनूठी

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sun, 25 Jan 2026 04:32 PM IST
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सार

रविंद्र कुमार, जो सीआरपीएफ की 73वीं बटालियन में सिपाही थे, वे '24 जनवरी' 1995 को शहीद हो गए थे। गांव में कोई भी व्यक्ति यह बात नहीं जानता था। 30 वर्ष पुरानी भूली हुई शहादत को याद करने के लिए, लोगों को यकीन दिलाने के लिए, देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल यानी 'सीआरपीएफ' जवान, छुट्टी लेकर शहीद के गांव पहुंचे थे।

CRPF jawan takes leave to visit village and commemorate a forgotten martyrdom from 30 years ago
सीआरपीएफ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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77वें गणतंत्र दिवस से दो दिन पहले उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जनपद में स्थित गांव 'गोड़ही बनकटवा' के लोग हैरान रह गए। किसी को मालूम ही नहीं था कि गांव में ये क्या हो रहा है। एकाएक सीआरपीएफ जवान, गांव में क्यों आ गए हैं। सभी लोग, इस सवाल का जवाब लेना चाह रहे थे। उन्हें बताया गया कि इसी गांव के रहने वाले रविंद्र कुमार, जो सीआरपीएफ की 73वीं बटालियन में सिपाही थे, वे आज ही के दिन यानी '24 जनवरी' 1995 को शहीद हो गए थे। गांव में कोई भी व्यक्ति इस जवाब पर यकीन नहीं कर पा रहा था। 30 वर्ष पुरानी भूली हुई शहादत को याद करने के लिए, लोगों को यकीन दिलाने के लिए, देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल यानी 'सीआरपीएफ' जवान, छुट्टी लेकर शहीद के गांव पहुंचे थे। 

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बता दें कि 24 जनवरी 1995 को देश की आंतरिक सुरक्षा की रक्षा करते हुए 73 वीं बटालियन, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के आठ वीर जवानों ने मणिपुर राज्य के कुकीमुन क्षेत्र में आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान अपने प्राणों की आहुति दी थी। इन्हीं अमर शहीदों में एक नाम था, चालक रविंद्र कुमार, जो उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जनपद के निवासी थे। उनकी शहादत के 30 वर्ष तक भी उनके गांव और आसपास के क्षेत्र में किसी को उनके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यूं कहिये कि एक तरह से उन्हें और उनकी शहादत को भुला दिया गया था। 
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सीआरपीएफ सिपाही रविंद्र कुमार, तीन भाई थे। तब रविंद्र कुमार अविवाहित थे। उनकी शहादत के बाद दूसरे भाई को करुणा मूलक आधार पर फोर्स में भर्ती किया गया था। हैरानी की बात है, उनके साथ कुछ ऐसा घटित हुआ कि जिस पर किसी को यकीन नहीं हो सका। वे अपनी ड्यूटी के दौरान ही गायब हो गए थे। उनके परिजनों का कहना है कि हो सकता है आतंकवादियों द्वारा उनका अपहरण कर लिया गया हो। उनके तीसरे भाई से एक संतान थी, जिसका कुछ वर्ष पहले निधन हो गया। इस प्रकार उनके समूचे परिवार में अब सिर्फ एक विधवा स्त्री और उसके दो बच्चे मात्र जीवित हैं। इन लोगों को भी आजीविका के कारण गांव छोड़ना पड़ा। ये तीनों स्थानीय कस्बे में आकर मजदूरी करने लगे। 
 
इसके बारे में सबसे पहले संत कबीर नगर के निवासी और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के इंस्पेक्टर श्रवण यादव को जब यह जानकारी मिली तो उन्होंने अपने कुछ साथियों से चर्चा की। भुला दिए गए शहीद की यादों को जीवित करने के लिए उनमें से तीन साथियों महेंद्र कुमार, मन्नू यादव और अनिल भारतीय ने उनकी पुण्यतिथि मनाने के लिए उनके शहादत दिवस पर छत्तीसगढ़, कश्मीर जैसे दुर्गम इलाके से छुट्टी लेकर उनके गांव आने का फैसला किया। स्थानीय ग्राम प्रधान ने इसमें उनका सहयोग किया। संत कबीर नगर के एक समाजसेवी प्रदीप सिंह ने जानकारी मिलने पर स्वयं वहां जाकर शहीद के परिजनों को सम्मानित करने का कार्य किया। 
 

शहीद के गांव गोड़ही बनकटवा जो कि उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जनपद में स्थित है, वहां पर जब पहली बार यह कार्यक्रम हुआ तो लोग आश्चर्य से चकित रह गए। गांव के अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं था कि उनके गांव का कोई सपूत देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान करके एक इतिहास रच चुका है। 30 वर्षों बाद जब उस गांव में शहीद की बरसी मनाई जा रही थी तो शहीद के परिवार से लेकर गांव के लोगों की आंखें नम थी, क्योंकि उनके लिए यह एक सुखद आश्चर्य था। 
 
फिलहाल इस कार्यक्रम के माध्यम से ही उस शहीद के बारे में उसके गांव और आस पास के लोगों को पता चल पाया है। उम्मीद है इस कार्यक्रम के बाद शासन और प्रशासन भी ऐसे शहीदों की सुध जरूर लेगा और 'शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले' सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक हकीकत बनकर न सिर्फ वर्तमान समाज बल्कि आने वाली पीढियां के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगा।

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