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त्यागराज स्टेडियम विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने आईएएस रिंकू दुग्गा की बहाली पर लगाई रोक; जानें क्या है पूरा मामला
Fri, 11 Sep 2026 03:32 PM IST
पवन पांडेय
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Fri, 11 Sep 2026 03:32 PM IST
सार
त्यागराज स्टेडियम में कुत्ते को टहलाने के लिए कथित तौर पर स्टेडियम खाली कराने के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने आईएएस अधिकारी रिंकू दुग्गा की बहाली पर रोक लगा दी है। केंद्र की याचिका पर अदालत ने धुग्गा को नोटिस जारी किया। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्तूबर को होगी।
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आईएएस रिंकू धुग्गा की बहाली पर रोक
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में कुत्ते को टहलाने के लिए कथित तौर पर स्टेडियम खाली कराने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी रिंकू दुग्गा की बहाली पर फिलहाल रोक लगा दी है। केंद्र सरकार ने दुग्गा की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले में रिंकू दुग्गा को नोटिस जारी किया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत ने अपने सात सितंबर के आदेश में कहा कि अगली सुनवाई तक दुग्गा की बहाली पर रोक रहेगी। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्तूबर को होगी। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पक्ष रखा।
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2022 में विवाद के बाद केंद्र ने किया था रिटायर
दरअसल, यह मामला वर्ष 2022 में सामने आया था। उस समय रिंकू दुग्गा और उनके पति, जो खुद भी आईएएस अधिकारी हैं, पर आरोप लगा था कि उनकी महिला अधिकारी को कुत्ते को टहलाने की सुविधा देने के लिए दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम को कथित तौर पर खाली कराया गया था। इस घटना की तस्वीरें और खबरें सामने आने के बाद काफी विवाद हुआ था। बाद में केंद्र सरकार ने रिंकू दुग्गा को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया था। दुग्गा ने केंद्र के इस फैसले को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) में चुनौती दी। सीएटी ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए बहाली का आदेश दिया था। इसके बाद केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने 15 अप्रैल के अपने फैसले में सीएटी के आदेश को बरकरार रखा और दुग्गा की बहाली का रास्ता साफ कर दिया।
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फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या की थी टिप्पणी?
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि स्टेडियम से जुड़ी घटना पर विभागीय कार्रवाई में उन्हें मामूली सजा दी गई थी। इसके अलावा उनकी कथित अनधिकृत अनुपस्थिति से जुड़े मामले को भी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फैसले में ध्यान में रखा गया था। हाईकोर्ट ने यह भी पाया था कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सिफारिश करने वाली समीक्षा समिति ने दुग्गा के पूरे सेवा रिकॉर्ड पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। उनके वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (APAR) में कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी। इसके अलावा पिछले वर्षों में उन्हें बेहतरीन ग्रेडिंग मिली थी और उस समय वह पदोन्नति के लिए भी विचाराधीन थीं।
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हाईकोर्ट ने कहा था कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का उद्देश्य ऐसे अधिकारियों को सेवा से हटाना है जिन्हें सरकार के लिए आगे उपयोगी नहीं माना जाता या जिन्हें ‘डेडवुड’ समझा जाता है। अदालत के मुताबिक, दुग्गा का मामला इस श्रेणी में नहीं आता था। अब सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से उनकी बहाली फिलहाल रुक गई है। शीर्ष अदालत अक्तूबर में इस मामले पर आगे सुनवाई करेगी।
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2022 में विवाद के बाद केंद्र ने किया था रिटायर
दरअसल, यह मामला वर्ष 2022 में सामने आया था। उस समय रिंकू दुग्गा और उनके पति, जो खुद भी आईएएस अधिकारी हैं, पर आरोप लगा था कि उनकी महिला अधिकारी को कुत्ते को टहलाने की सुविधा देने के लिए दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम को कथित तौर पर खाली कराया गया था। इस घटना की तस्वीरें और खबरें सामने आने के बाद काफी विवाद हुआ था। बाद में केंद्र सरकार ने रिंकू दुग्गा को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया था। दुग्गा ने केंद्र के इस फैसले को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) में चुनौती दी। सीएटी ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए बहाली का आदेश दिया था। इसके बाद केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने 15 अप्रैल के अपने फैसले में सीएटी के आदेश को बरकरार रखा और दुग्गा की बहाली का रास्ता साफ कर दिया।
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फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या की थी टिप्पणी?
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि स्टेडियम से जुड़ी घटना पर विभागीय कार्रवाई में उन्हें मामूली सजा दी गई थी। इसके अलावा उनकी कथित अनधिकृत अनुपस्थिति से जुड़े मामले को भी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फैसले में ध्यान में रखा गया था। हाईकोर्ट ने यह भी पाया था कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सिफारिश करने वाली समीक्षा समिति ने दुग्गा के पूरे सेवा रिकॉर्ड पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। उनके वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (APAR) में कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी। इसके अलावा पिछले वर्षों में उन्हें बेहतरीन ग्रेडिंग मिली थी और उस समय वह पदोन्नति के लिए भी विचाराधीन थीं।
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हाईकोर्ट ने कहा था कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का उद्देश्य ऐसे अधिकारियों को सेवा से हटाना है जिन्हें सरकार के लिए आगे उपयोगी नहीं माना जाता या जिन्हें ‘डेडवुड’ समझा जाता है। अदालत के मुताबिक, दुग्गा का मामला इस श्रेणी में नहीं आता था। अब सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से उनकी बहाली फिलहाल रुक गई है। शीर्ष अदालत अक्तूबर में इस मामले पर आगे सुनवाई करेगी।