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ईडी: बिना एफसीआरए के बेल्जियम से मिला 5.10 करोड़ का चंदा, 14 वर्षों से छिपे रहे 'देउ राम' और 'ज्ञान चंद'
Mon, 21 Sep 2026 06:47 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Mon, 21 Sep 2026 06:47 PM IST
सार
ईडी ने जैसलमेर में विदेशी चंदे से जुड़े मामले में दो जगहों पर तलाशी ली। जांच में बेल्जियम की संस्था से बिना एफसीआरए पंजीकरण करीब 5.10 करोड़ रुपये मिलने और इसके इस्तेमाल में अनियमितताओं का दावा किया गया है। ईडी के मुताबिक, देउ राम और ज्ञान चंद के खातों से 2.60 करोड़ रुपये नकद निकाले गए। लेकिन सवाल है कि 14 वर्षों तक यह विदेशी फंडिंग और इससे जुड़ी गतिविधियां जांच से कैसे बची रहीं? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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ईडी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के जयपुर जोनल ऑफिस ने जैसलमेर में शनिवार को दो जगहों पर तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा), 1999 के तहत की गई। मामला बेल्जियम की एक संस्था से मिले लगभग 5.10 करोड़ रुपये के विदेशी चंदे के गलत इस्तेमाल से जुड़ा है। यह चंदा बिना एफसीआरए रजिस्ट्रेशन के लिया गया था। इसका इस्तेमाल उन कामों के लिए किया गया, जिनके बारे में कभी बताया ही नहीं गया। खास बात, विदेशी चंदा जिनके नाम पर आता है, वे देउ राम और ज्ञान चंद हैं, जो 14 वर्षों में भी किसी की नजर में नहीं आए।
ईडी ने फेमा, 1999 के तहत जांच इस मामले की शुरू की है। यह जांच खास जानकारी के आधार पर प्रारंभ की गई। जैसलमेर का रहने वाला देउ राम, बेल्जियम की संस्थाओं से गैर-कानूनी तरीके से विदेशी फंड ले रहा था। इस फंड का इस्तेमाल जैसलमेर में समाज के कमजोर वर्गों के बीच धर्म परिवर्तन और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था।
जांच में पता चला कि देउ राम और उसके साथी ज्ञान चंद को कुल मिलाकर लगभग 5.10 करोड़ रुपये का विदेशी फंड मिला। यह फंड मुख्य रूप से शैक्षिक सेवाओं, सांस्कृतिक और मनोरंजक गतिविधियों, और परिवार के भरण-पोषण व बचत के लिए अनिवासी भारतीयों से मिले पैसे के तौर पर दिखाया गया था। इनमें से ज़्यादातर फंड 'अमर एएसबीएल' से मिला था, जो खुद को बेल्जियम के ब्रुसेल्स में स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था बताती है।
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खास बात यह है कि 'अमर एएसबीएल' से आए विदेशी पैसे को बैंक में अलग-अलग मकसद कोड के तहत दिखाया गया था, जैसे परिवार का खर्च और बचत, शिक्षा सेवाएं, सांस्कृतिक/मनोरंजन सेवाएं, कमीशन एजेंट सेवाएं और कर्मचारियों का वेतन। हालांकि, असल में 'अमर एएसबीएल' को कोई शिक्षा, सांस्कृतिक या मनोरंजन सेवा नहीं दी गई थी। इसके बजाय, इस पैसे का इस्तेमाल जैसलमेर में संस्था की गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। जांच में यह भी पता चला है कि जब बैंकों ने हाल ही में देउ राम और ज्ञान चंद के खातों में विदेशी पैसे भेजने से मना कर दिया, तो जैसलमेर में उनसे जुड़े दूसरे लोगों के निजी बैंक खातों के ज़रिए विदेशी पैसा भेजने की कोशिश की गई।
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ईडी ने फेमा, 1999 के तहत जांच इस मामले की शुरू की है। यह जांच खास जानकारी के आधार पर प्रारंभ की गई। जैसलमेर का रहने वाला देउ राम, बेल्जियम की संस्थाओं से गैर-कानूनी तरीके से विदेशी फंड ले रहा था। इस फंड का इस्तेमाल जैसलमेर में समाज के कमजोर वर्गों के बीच धर्म परिवर्तन और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था।
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जांच में पता चला कि देउ राम और उसके साथी ज्ञान चंद को कुल मिलाकर लगभग 5.10 करोड़ रुपये का विदेशी फंड मिला। यह फंड मुख्य रूप से शैक्षिक सेवाओं, सांस्कृतिक और मनोरंजक गतिविधियों, और परिवार के भरण-पोषण व बचत के लिए अनिवासी भारतीयों से मिले पैसे के तौर पर दिखाया गया था। इनमें से ज़्यादातर फंड 'अमर एएसबीएल' से मिला था, जो खुद को बेल्जियम के ब्रुसेल्स में स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था बताती है।
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तलाशी के दौरान ईडी को क्या-क्या मिला?
- ईडी को तलाशी अभियान के दौरान, कई आपत्तिजनक दस्तावेज़ और डिजिटल सबूत मिले हैं। तलाशी से यह भी पता चला कि 'अमर एएसबीएल' को 2011 में ब्रुसेल्स में शुरू किया गया था और इसे बेल्जियम के दो नागरिक - जोस गोफिनेट और उनके बेटे सालियन गोफिनेट-चलाते हैं।
- हालांकि, यह संस्था सिर्फ़ जैसलमेर में काम करती है, लेकिन इसने भारत में कोई ट्रस्ट या एनजीओ रजिस्टर नहीं कराया है। इसके बजाय, यह पिछले 14-15 वर्षों से जैसलमेर में देउ राम और ज्ञान चंद के ज़रिए काम कर रही है।
- जांच में यह भी पता चला है कि देउ राम ने एफसीआरए की मंज़ूरी के बिना और मकसद के बारे में गलत जानकारी देकर 'अमर एएसबीएल' से 5.10 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा लिया।
हिसाब-किताब में क्या खामियां मिली?
- उन्होंने इस पैसे का इस्तेमाल अपने निजी खर्चों में किया। बेल्जियम की संस्था के प्रभाव में आकर, कम पर वर्ग के बच्चों को शिक्षा देने के बहाने उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं को प्रभावित करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया। इस पैसे में से उन्होंने अपने बैंक खाते से लगभग 2.60 करोड़ रुपये नकद निकाले। इस विदेशी चंदे को लेने और इस्तेमाल करने का कोई सही हिसाब-किताब या वित्तीय रिकॉर्ड नहीं रखा गया था।
- शुरुआती जांच से पता चला है कि देउ राम और ज्ञान चंद, जोस गोफिनेट और सालियन गोफिनेट के लगातार संपर्क में रहते हैं। ये दोनों हर साल 2-3 सप्ताह के लिए जैसलमेर आते हैं, इन बच्चों के माता-पिता और रिश्तेदारों से मिलते हैं। अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों को बढ़ावा देने के लिए बैठकें व धार्मिक सभाएं आयोजित करते हैं।
खास बात यह है कि 'अमर एएसबीएल' से आए विदेशी पैसे को बैंक में अलग-अलग मकसद कोड के तहत दिखाया गया था, जैसे परिवार का खर्च और बचत, शिक्षा सेवाएं, सांस्कृतिक/मनोरंजन सेवाएं, कमीशन एजेंट सेवाएं और कर्मचारियों का वेतन। हालांकि, असल में 'अमर एएसबीएल' को कोई शिक्षा, सांस्कृतिक या मनोरंजन सेवा नहीं दी गई थी। इसके बजाय, इस पैसे का इस्तेमाल जैसलमेर में संस्था की गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। जांच में यह भी पता चला है कि जब बैंकों ने हाल ही में देउ राम और ज्ञान चंद के खातों में विदेशी पैसे भेजने से मना कर दिया, तो जैसलमेर में उनसे जुड़े दूसरे लोगों के निजी बैंक खातों के ज़रिए विदेशी पैसा भेजने की कोशिश की गई।