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स्कॉलरशिप घोटाला: फेल-गुमनाम छात्रों के नाम पर 13 करोड़ की हेराफेरी, ED जांच में फर्जीवाड़े का पर्दाफाश
डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Rahul Kumar
Updated Mon, 15 Jun 2026 06:43 PM IST
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- फोटो : ED
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ईडी देहरादून सब-जोनल ऑफिस ने उत्तराखंड में एससी/एसटी स्कॉलरशिप घोटाले की चल रही जांच के सिलसिले में, प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट 2002 के तहत लगभग 13.83 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्ति को अस्थायी रूप से जब्त किया है। आरोपियों ने ऐसे छात्रों को स्कॉलरशिप के लिए चुना, जो परीक्षा में फेल हो गए थे या दूसरी तरह से वे अयोग्यता की श्रेणी में आते थे। इतना ही नहीं, कुछ छात्र तो ऐसे भी थे, जिनकी यूनिवर्सिटी का कोई अता पता नहीं था। लगभग छह हजार दावों में से 2895 दावे फर्जी निकले। इस मामले में 13 करोड़ रुपये की आपराधिक आय का पता लगा है।
समाज कल्याण विभाग से फंड प्राप्त किया
ईडी ने उत्तराखंड पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर इस केस की जांच शुरू की थी। यह एफआईआर 2011-12 से 2016-17 के दौरान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप के धोखाधड़ी से लाभ उठाने और उसे हड़पने से संबंधित थी। जांच से पता चला है कि कुछ प्राइवेट शिक्षण संस्थानों- जैसे मदरहुड इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी, रुड़की (उत्तराखंड), रुड़की इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेज/मेडिकल साइंसेज, हरिद्वार (उत्तराखंड) और महावीर इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, मेरठ (यूपी)-और उनके मैनेजमेंट व उनसे जुड़ी सोसायटियों/ट्रस्टों ने धोखाधड़ी से स्कॉलरशिप फंड हासिल किया। उन्होंने अयोग्य, नकली और जिनकी पुष्टि नहीं हो सकती थी, ऐसे छात्रों को लाभार्थी दिखाकर उत्तराखंड सरकार के समाज कल्याण विभाग से यह फंड प्राप्त किया था।
स्कॉलरशिप के लिए आए थे 6208 दावे
ज़िला समाज कल्याण अधिकारी, हरिद्वार ने इन संस्थानों से जुड़े कुल 6208 स्कॉलरशिप दावों को प्रोसेस किया था। इसके परिणामस्वरूप, जांच की अवधि के दौरान लगभग 27.98 करोड़ रुपये का स्कॉलरशिप फंड बांटा गया। बांटी गई कुल राशि में से लगभग 19.74 करोड़ रुपये सीधे संस्थानों के बैंक खातों में जमा किए गए, जबकि लगभग 8.24 करोड़ रुपये छात्रों के नाम पर खुले बैंक खातों में जमा किए गए। स्कॉलरशिप के कुल 6,208 दावों में से 2,895 दावे फर्जी थे।
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उन्हें मिली स्कॉलरशिप, जो पाने के हकदार नहीं
ईडी की जांच में एक सुनियोजित तरीका सामने आया, जिसमें ऐसे छात्रों के नाम पर स्कॉलरशिप के दावे किए गए थे जो या तो असल में एनरोल नहीं थे, क्लास में नहीं आते थे, पढ़ाई-लिखाई के लिहाज़ से योग्य नहीं थे, या फिर लागू स्कीम के तहत स्कॉलरशिप पाने के हकदार नहीं थे। अलग-अलग यूनिवर्सिटी और शिक्षा अधिकारियों से की गई जांच-पड़ताल में एडमिशन, एनरोलमेंट और परीक्षा के रिकॉर्ड में बड़ी गड़बड़ियां पाई गईं। साथ ही यह भी पता चला कि जिन लोगों को स्कॉलरशिप मिली, उनमें से कई या तो परीक्षा में फेल हो गए थे, या गैर-हाजिर रहे, या यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड में उनका कोई अता-पता नहीं था। तय योग्यता शर्तों को पूरा न करने के बावजूद उन्हें स्कॉलरशिप मिलती रही। इस धोखाधड़ी से सरकारी खजाने को गलत तरीके से नुकसान हुआ। आरोपी व्यक्तियों व उनसे जुड़ी संस्थाओं को गैर-कानूनी फायदा पहुंचा। इस कुल संख्या में हर छात्र को सिर्फ़ एक बार ही गिना गया है, भले ही उन्हें लगातार वर्षों में या ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों तरह के आवेदनों के ज़रिए स्कॉलरशिप मिली हो।
कल्याणकारी योजना का मकसद ही खत्म
जांच में यह भी पता चला कि कॉलेज मैनेजमेंट और स्टाफ़ के कंट्रोल में छात्रों के नाम पर बैंक खाते खोले गए थे। कई छात्रों के खाते खोलने के लिए कॉलेज कर्मचारियों के मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल किया गया और एडमिशन व बैंकिंग की प्रक्रियाओं में मदद के लिए बिचौलियों को लगाया गया। ऐसे खातों में जमा की गई स्कॉलरशिप की रकम बाद में संस्थानों को वापस भेज दी जाती थी या नकद निकाल ली जाती थी, जिससे कल्याणकारी योजना का मकसद ही खत्म हो जाता था।
तीसरे पक्षों को ट्रांसफर कर दी जाती थी राशि
ईडी की ओर से बैंक खातों की जांच से पता चला कि स्कॉलरशिप का पैसा मिलते ही, बड़ी रकम अलग-अलग एजुकेशनल सोसायटियों, ट्रस्टों, संबंधित संस्थाओं और तीसरे पक्षों को ट्रांसफर कर दी जाती थी, जिसके बाद नकद निकासी और कई चरणों वाले ट्रांज़ैक्शन किए जाते थे। इस तरह पैसे को दूसरी जगहों पर लगाया जाता था। इसका इस्तेमाल योग्य एससी/एसटी छात्रों के कल्याण के अलावा दूसरे कामों में किया जाता था, जिसमें संपत्ति खरीदना और संस्थानों व उन्हें कंट्रोल करने वाले लोगों के दूसरे खर्च शामिल थे। जांच में यह भी पता चला कि मनिका शर्मा, जो संबंधित शिक्षण संस्थानों और शैक्षिक सोसायटियों के कामकाज को नियंत्रित करती थीं, स्कॉलरशिप फंड की प्राप्ति, इस्तेमाल और उसे दूसरी जगह लगाने (डायवर्जन) के काम में शामिल थीं।
चल और अचल संपत्तियों में निवेश किया पैसा
जांच से यह भी पता चला कि स्कॉलरशिप फंड को शैक्षिक सोसायटियों, ट्रस्टों और संबंधित संस्थाओं के अलग-अलग बैंक खातों के ज़रिए घुमाया गया, ताकि अपराध से हुई कमाई की प्रकृति, स्रोत और मालिकाना हक को छिपाया जा सके। धोखाधड़ी वाले स्कॉलरशिप दावों से हुई इस कमाई को बाद में मनी लॉन्ड्रिंग के ज़रिए अलग-अलग चल और अचल संपत्तियों में निवेश किया गया। लगभग 13.83 करोड़ रुपये की 'अपराध से हुई कमाई' की पहचान की गई है। यह रकम एससी/एसटी स्कॉलरशिप फंड पाने के लिए विभिन्न सोसायटियों द्वारा नियंत्रित शिक्षण संस्थानों की ओर से जमा किए गए 2,895 धोखाधड़ी वाले, अयोग्य और फर्जी स्कॉलरशिप दावों से जुड़ी है।
अपराध की कमाई का दायरा
इस 'अपराध से हुई कमाई' में लगभग 2.44 करोड़ रुपये 'न्यू टुपल्स एजुकेशन सोसाइटी' (जो मेरठ में महावीर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी चलाती है) से, लगभग 3.95 करोड़ रुपये 'मदरहुड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी सोसाइटी' (जो रुड़की में मदरहुड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी चलाती है) से और लगभग 7.44 करोड़ रुपये 'मॉडर्न इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी सोसाइटी' (जो हरिद्वार में रुड़की इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज/मेडिकल साइंसेज चलाती है) से संबंधित हैं।
कई चरणों में घुमाई गई राशि
जांच में पता चला कि धोखाधड़ी से हासिल स्कॉलरशिप फंड को अचल संपत्तियों को खरीदने और अन्य खर्चों में इस्तेमाल करने से पहले इन सोसायटियों और संबंधित संस्थाओं के खातों के ज़रिए कई चरणों में घुमाया गया। पैसे को दूसरी जगह लगाया गया। इसके अनुसार, ईडी ने लगभग 13.83 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियों को ज़ब्त करने के लिए एक 'प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर' (अस्थायी ज़ब्ती आदेश) जारी किया है। इन संपत्तियों में हरिद्वार और रुड़की में स्थित फिक्स्ड डिपॉजिट खाते, ज़मीन के टुकड़े और शैक्षिक/संस्थागत इमारतें शामिल हैं, जिन्हें अपराध से हुई उक्त कमाई से हासिल किया गया था। एससी/एसटी स्कॉलरशिप घोटाले की जांच 2020 से चल रही है। अब तक, ईडी ने देहरादून की विशेष अदालत के समक्ष 05 अभियोजन शिकायतें दायर की हैं। इस मामले में 05 प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किए गए हैं। यह मौजूदा जब्ती आदेश इस मामले में जारी किया गया छठा प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर है।
समाज कल्याण विभाग से फंड प्राप्त किया
ईडी ने उत्तराखंड पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर इस केस की जांच शुरू की थी। यह एफआईआर 2011-12 से 2016-17 के दौरान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप के धोखाधड़ी से लाभ उठाने और उसे हड़पने से संबंधित थी। जांच से पता चला है कि कुछ प्राइवेट शिक्षण संस्थानों- जैसे मदरहुड इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी, रुड़की (उत्तराखंड), रुड़की इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेज/मेडिकल साइंसेज, हरिद्वार (उत्तराखंड) और महावीर इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, मेरठ (यूपी)-और उनके मैनेजमेंट व उनसे जुड़ी सोसायटियों/ट्रस्टों ने धोखाधड़ी से स्कॉलरशिप फंड हासिल किया। उन्होंने अयोग्य, नकली और जिनकी पुष्टि नहीं हो सकती थी, ऐसे छात्रों को लाभार्थी दिखाकर उत्तराखंड सरकार के समाज कल्याण विभाग से यह फंड प्राप्त किया था।
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स्कॉलरशिप के लिए आए थे 6208 दावे
ज़िला समाज कल्याण अधिकारी, हरिद्वार ने इन संस्थानों से जुड़े कुल 6208 स्कॉलरशिप दावों को प्रोसेस किया था। इसके परिणामस्वरूप, जांच की अवधि के दौरान लगभग 27.98 करोड़ रुपये का स्कॉलरशिप फंड बांटा गया। बांटी गई कुल राशि में से लगभग 19.74 करोड़ रुपये सीधे संस्थानों के बैंक खातों में जमा किए गए, जबकि लगभग 8.24 करोड़ रुपये छात्रों के नाम पर खुले बैंक खातों में जमा किए गए। स्कॉलरशिप के कुल 6,208 दावों में से 2,895 दावे फर्जी थे।
उन्हें मिली स्कॉलरशिप, जो पाने के हकदार नहीं
ईडी की जांच में एक सुनियोजित तरीका सामने आया, जिसमें ऐसे छात्रों के नाम पर स्कॉलरशिप के दावे किए गए थे जो या तो असल में एनरोल नहीं थे, क्लास में नहीं आते थे, पढ़ाई-लिखाई के लिहाज़ से योग्य नहीं थे, या फिर लागू स्कीम के तहत स्कॉलरशिप पाने के हकदार नहीं थे। अलग-अलग यूनिवर्सिटी और शिक्षा अधिकारियों से की गई जांच-पड़ताल में एडमिशन, एनरोलमेंट और परीक्षा के रिकॉर्ड में बड़ी गड़बड़ियां पाई गईं। साथ ही यह भी पता चला कि जिन लोगों को स्कॉलरशिप मिली, उनमें से कई या तो परीक्षा में फेल हो गए थे, या गैर-हाजिर रहे, या यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड में उनका कोई अता-पता नहीं था। तय योग्यता शर्तों को पूरा न करने के बावजूद उन्हें स्कॉलरशिप मिलती रही। इस धोखाधड़ी से सरकारी खजाने को गलत तरीके से नुकसान हुआ। आरोपी व्यक्तियों व उनसे जुड़ी संस्थाओं को गैर-कानूनी फायदा पहुंचा। इस कुल संख्या में हर छात्र को सिर्फ़ एक बार ही गिना गया है, भले ही उन्हें लगातार वर्षों में या ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों तरह के आवेदनों के ज़रिए स्कॉलरशिप मिली हो।
कल्याणकारी योजना का मकसद ही खत्म
जांच में यह भी पता चला कि कॉलेज मैनेजमेंट और स्टाफ़ के कंट्रोल में छात्रों के नाम पर बैंक खाते खोले गए थे। कई छात्रों के खाते खोलने के लिए कॉलेज कर्मचारियों के मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल किया गया और एडमिशन व बैंकिंग की प्रक्रियाओं में मदद के लिए बिचौलियों को लगाया गया। ऐसे खातों में जमा की गई स्कॉलरशिप की रकम बाद में संस्थानों को वापस भेज दी जाती थी या नकद निकाल ली जाती थी, जिससे कल्याणकारी योजना का मकसद ही खत्म हो जाता था।
तीसरे पक्षों को ट्रांसफर कर दी जाती थी राशि
ईडी की ओर से बैंक खातों की जांच से पता चला कि स्कॉलरशिप का पैसा मिलते ही, बड़ी रकम अलग-अलग एजुकेशनल सोसायटियों, ट्रस्टों, संबंधित संस्थाओं और तीसरे पक्षों को ट्रांसफर कर दी जाती थी, जिसके बाद नकद निकासी और कई चरणों वाले ट्रांज़ैक्शन किए जाते थे। इस तरह पैसे को दूसरी जगहों पर लगाया जाता था। इसका इस्तेमाल योग्य एससी/एसटी छात्रों के कल्याण के अलावा दूसरे कामों में किया जाता था, जिसमें संपत्ति खरीदना और संस्थानों व उन्हें कंट्रोल करने वाले लोगों के दूसरे खर्च शामिल थे। जांच में यह भी पता चला कि मनिका शर्मा, जो संबंधित शिक्षण संस्थानों और शैक्षिक सोसायटियों के कामकाज को नियंत्रित करती थीं, स्कॉलरशिप फंड की प्राप्ति, इस्तेमाल और उसे दूसरी जगह लगाने (डायवर्जन) के काम में शामिल थीं।
चल और अचल संपत्तियों में निवेश किया पैसा
जांच से यह भी पता चला कि स्कॉलरशिप फंड को शैक्षिक सोसायटियों, ट्रस्टों और संबंधित संस्थाओं के अलग-अलग बैंक खातों के ज़रिए घुमाया गया, ताकि अपराध से हुई कमाई की प्रकृति, स्रोत और मालिकाना हक को छिपाया जा सके। धोखाधड़ी वाले स्कॉलरशिप दावों से हुई इस कमाई को बाद में मनी लॉन्ड्रिंग के ज़रिए अलग-अलग चल और अचल संपत्तियों में निवेश किया गया। लगभग 13.83 करोड़ रुपये की 'अपराध से हुई कमाई' की पहचान की गई है। यह रकम एससी/एसटी स्कॉलरशिप फंड पाने के लिए विभिन्न सोसायटियों द्वारा नियंत्रित शिक्षण संस्थानों की ओर से जमा किए गए 2,895 धोखाधड़ी वाले, अयोग्य और फर्जी स्कॉलरशिप दावों से जुड़ी है।
अपराध की कमाई का दायरा
इस 'अपराध से हुई कमाई' में लगभग 2.44 करोड़ रुपये 'न्यू टुपल्स एजुकेशन सोसाइटी' (जो मेरठ में महावीर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी चलाती है) से, लगभग 3.95 करोड़ रुपये 'मदरहुड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी सोसाइटी' (जो रुड़की में मदरहुड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी चलाती है) से और लगभग 7.44 करोड़ रुपये 'मॉडर्न इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी सोसाइटी' (जो हरिद्वार में रुड़की इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज/मेडिकल साइंसेज चलाती है) से संबंधित हैं।
कई चरणों में घुमाई गई राशि
जांच में पता चला कि धोखाधड़ी से हासिल स्कॉलरशिप फंड को अचल संपत्तियों को खरीदने और अन्य खर्चों में इस्तेमाल करने से पहले इन सोसायटियों और संबंधित संस्थाओं के खातों के ज़रिए कई चरणों में घुमाया गया। पैसे को दूसरी जगह लगाया गया। इसके अनुसार, ईडी ने लगभग 13.83 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियों को ज़ब्त करने के लिए एक 'प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर' (अस्थायी ज़ब्ती आदेश) जारी किया है। इन संपत्तियों में हरिद्वार और रुड़की में स्थित फिक्स्ड डिपॉजिट खाते, ज़मीन के टुकड़े और शैक्षिक/संस्थागत इमारतें शामिल हैं, जिन्हें अपराध से हुई उक्त कमाई से हासिल किया गया था। एससी/एसटी स्कॉलरशिप घोटाले की जांच 2020 से चल रही है। अब तक, ईडी ने देहरादून की विशेष अदालत के समक्ष 05 अभियोजन शिकायतें दायर की हैं। इस मामले में 05 प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किए गए हैं। यह मौजूदा जब्ती आदेश इस मामले में जारी किया गया छठा प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर है।