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कोलकाता: निकाय चुनाव से पहले टीएमसी की हालत पतली, फिरहाद हकीम-शोभन चटर्जी समेत कई दिग्गजों ने क्यों बनाई दूरी?
Mon, 02 Nov 2026 01:55 PM IST
अमन मौर्या
आईएएनएस, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
आईएएनएस, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
Published by: अमन मौर्या
Updated Mon, 02 Nov 2026 01:55 PM IST
सार
केएमसी चुनाव से पहले टीएमसी को बड़ा झटका लगा है। फिरहाद हकीम और शोभन चटर्जी सहित कई दिग्गज पूर्व पार्षदों ने चुनाव लड़ने से दूरी बना ली है, जिससे पार्टी के सामने 209 वार्डों के लिए उम्मीदवार तलाशने की गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है।
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ममता बनर्जी, पूर्व मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
कोलकाता नगर निगम (केएमसी) के दिसंबर में होने वाले चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। पार्टी के कई दिग्गज पूर्व पार्षदों ने चुनाव लड़ने से दूरी बना ली है। इनमें कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम और शोभन चटर्जी भी शामिल हैं। इसके अलावा मेयर-इन-काउंसिल के कई पूर्व सदस्य और बोरो चेयरमैन भी चुनावी मैदान में उतरने के इच्छुक नहीं हैं।
दिग्गज नेताओं के पीछे हटने से तृणमूल कांग्रेस के दोनों धड़ों के सामने सभी 209 वार्डों के लिए उम्मीदवार तलाशने की चुनौती खड़ी हो गई है। एक धड़े का नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरे धड़े की कमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं। बता दें कि परिसीमन के बाद नगर निगम में वार्डों की संख्या 144 से बढ़कर 209 हो गई है।
फिरहाद हकीम ने चुनाव लड़ने से क्यों किया इनकार?
चार बार तृणमूल कांग्रेस के विधायक रहे फिरहाद हकीम ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि वह आगामी निकाय चुनाव नहीं लड़ना चाहते। वह ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। हकीम ने इन अटकलों को भी खारिज कर दिया कि उनकी बड़ी बेटी प्रियदर्शिनी हकीम को उस वार्ड से उम्मीदवार बनाया जा सकता है, जिसका उन्होंने पार्षद रहते हुए प्रतिनिधित्व किया था। बता दें कि हकीम पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार में कोलकाता के मेयर के साथ-साथ नगर मामलों और शहरी विकास मंत्री भी रह चुके हैं। उनके बाद कोलकाता के मेयर बने शोभन चटर्जी पहले ही सक्रिय राजनीति से दूरी बना चुके हैं।
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महिला आरक्षित हुआ अतीन घोष का वार्ड
केएमसी के पूर्व डिप्टी मेयर अतीन घोष के सामने भी चुनाव लड़ने को लेकर असमंजस की स्थिति है। वह जिस वार्ड से कई वर्षों तक पार्षद चुने जाते रहे, वह अब महिलाओं के लिए आरक्षित हो गया है। खबरों के अनुसार, घोष ने अपने एक करीबी सहयोगी से कहा है कि वह किसी दूसरे वार्ड से चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं। मेयर-इन-काउंसिल के केवल दो पूर्व सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। इनमें दक्षिण कोलकाता से संदीप रंजन बख्शी और उत्तर कोलकाता से स्वपन समद्दार शामिल हैं। इसके अलावा कई अन्य दिग्गज पूर्व पार्षदों ने भी निकाय चुनाव से दूर रहने का फैसला किया है। इनमें घनश्री बाह, मनीषा बसु और रत्ना सूर के नाम शामिल हैं। इन नेताओं ने सक्रिय राजनीति से पीछे हटने की बात कही है।
कार्यकर्ताओं के लिए क्या है मुख्य चुनौती?
कुछ पूर्व पार्षदों ने चुनाव नहीं लड़ने के पीछे खर्च को भी एक वजह बताया है। पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों धड़ों के बीच चल रही कानूनी लड़ाई ने चुनावी खर्च के लिए मिलने वाली पार्टी की आर्थिक मदद पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव नहीं लड़ने का फैसला कर चुके एक पूर्व पार्षद ने कहा कि पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न को लेकर कानूनी विवाद अभी सुलझा नहीं है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि उम्मीदवारों को चुनाव और प्रचार का खर्च उठाने के लिए पार्टी से धन मिलेगा या नहीं। उनके मुताबिक, मौजूदा समय में किसी उम्मीदवार के लिए अपने निजी पैसे से पूरा चुनाव लड़ना लगभग असंभव है।
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दिग्गज नेताओं के पीछे हटने से तृणमूल कांग्रेस के दोनों धड़ों के सामने सभी 209 वार्डों के लिए उम्मीदवार तलाशने की चुनौती खड़ी हो गई है। एक धड़े का नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरे धड़े की कमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं। बता दें कि परिसीमन के बाद नगर निगम में वार्डों की संख्या 144 से बढ़कर 209 हो गई है।
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फिरहाद हकीम ने चुनाव लड़ने से क्यों किया इनकार?
चार बार तृणमूल कांग्रेस के विधायक रहे फिरहाद हकीम ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि वह आगामी निकाय चुनाव नहीं लड़ना चाहते। वह ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। हकीम ने इन अटकलों को भी खारिज कर दिया कि उनकी बड़ी बेटी प्रियदर्शिनी हकीम को उस वार्ड से उम्मीदवार बनाया जा सकता है, जिसका उन्होंने पार्षद रहते हुए प्रतिनिधित्व किया था। बता दें कि हकीम पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार में कोलकाता के मेयर के साथ-साथ नगर मामलों और शहरी विकास मंत्री भी रह चुके हैं। उनके बाद कोलकाता के मेयर बने शोभन चटर्जी पहले ही सक्रिय राजनीति से दूरी बना चुके हैं।
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महिला आरक्षित हुआ अतीन घोष का वार्ड
केएमसी के पूर्व डिप्टी मेयर अतीन घोष के सामने भी चुनाव लड़ने को लेकर असमंजस की स्थिति है। वह जिस वार्ड से कई वर्षों तक पार्षद चुने जाते रहे, वह अब महिलाओं के लिए आरक्षित हो गया है। खबरों के अनुसार, घोष ने अपने एक करीबी सहयोगी से कहा है कि वह किसी दूसरे वार्ड से चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं। मेयर-इन-काउंसिल के केवल दो पूर्व सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। इनमें दक्षिण कोलकाता से संदीप रंजन बख्शी और उत्तर कोलकाता से स्वपन समद्दार शामिल हैं। इसके अलावा कई अन्य दिग्गज पूर्व पार्षदों ने भी निकाय चुनाव से दूर रहने का फैसला किया है। इनमें घनश्री बाह, मनीषा बसु और रत्ना सूर के नाम शामिल हैं। इन नेताओं ने सक्रिय राजनीति से पीछे हटने की बात कही है।
कार्यकर्ताओं के लिए क्या है मुख्य चुनौती?
कुछ पूर्व पार्षदों ने चुनाव नहीं लड़ने के पीछे खर्च को भी एक वजह बताया है। पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों धड़ों के बीच चल रही कानूनी लड़ाई ने चुनावी खर्च के लिए मिलने वाली पार्टी की आर्थिक मदद पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव नहीं लड़ने का फैसला कर चुके एक पूर्व पार्षद ने कहा कि पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न को लेकर कानूनी विवाद अभी सुलझा नहीं है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि उम्मीदवारों को चुनाव और प्रचार का खर्च उठाने के लिए पार्टी से धन मिलेगा या नहीं। उनके मुताबिक, मौजूदा समय में किसी उम्मीदवार के लिए अपने निजी पैसे से पूरा चुनाव लड़ना लगभग असंभव है।