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PM Modi: 'नागरिकों के साथ विश्वास का मजबूत संबंध, ये पीएम मोदी की असाधारण सफलता', पूर्व राष्ट्रपति का लेख

रामनाथ कोविंद (भारत के पूर्व राष्ट्रपति) Published by: नितिन गौतम Updated Wed, 10 Jun 2026 06:52 AM IST
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सार

21वीं सदी की दुनिया में राजनीतिक नेताओं का कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी इस वैश्विक रुझान के अपवाद रहे हैं।

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पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पीएम मोदी के कार्यकाल को ऐतिहासिक बताया - फोटो : एएनआई / अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 जून, 2026 को जवाहरलाल नेहरू को पीछे छोड़ भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड बना दिया। यह अपने आप में ऐतिहासिक है, मगर पीएम मोदी का नेहरू से लंबा कार्यकाल, आजादी के बाद के भारत के इस निर्णायक कालखंड के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को नहीं दर्शाता है। 26 मई, 2014 से भारतीय राजनीति में निर्णायक बदलाव आया, जो महात्मा गांधी, सरदार पटेल, बाबासाहेब आंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, केएम मुंशी और आधुनिक भारत के कई अन्य निर्माताओं द्वारा समर्थित भारतीयत्व की दिशा में है, जिन्होंने अपनी धरोहर और विरासत पर आत्मगौरव की गहरी भावना के साथ प्राचीन भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पुनर्कल्पना की थी। 


आर्थिक विकास के क्षेत्र में, पीएम मोदी ने समावेश के साथ राजाजी (राजगोपालाचारी) के मॉडल को आगे बढ़ाया है। राजाजी ने नेहरू की राजनीतिक अर्थव्यवस्था से जुड़े आदेश और नियंत्रण मॉडल की कड़ी आलोचना की थी, जिसके परिणामस्वरूप कोटा, परमिट और लाइसेंस राज पैदा हुआ था। मतदाताओं की संख्या आजादी के समय की भारत की कुल आबादी से लगभग तीन गुना ज्यादा हो गई है। इस विशाल आकार के साथ चुनावी व्यवस्था की बढ़ती जटिलता भी जुड़ गई है। 
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2024 के आम चुनाव में 744 राजनीतिक दलों ने भाग लिया, जबकि 1951-52 में केवल 53 दलों ने हिस्सा लिया था। नेहरू के समय की तुलना में लोगों की आकांक्षाएं और निगरानी गुणात्मक रूप से बढ़ गई हैं। ऐसी बढ़ती उम्मीदों के अनुसार खुद को साबित करना और लोगों के साथ विश्वास का मजबूत संबंध बनाए रखना प्रधानमंत्री मोदी की असाधारण सफलता है, जिनकी स्वीकृति दर लगातार ऊंची रही है, जबकि नेहरू को अपने कार्यकाल के दौरान अपने कद और लोकप्रियता में भारी गिरावट देखनी पड़ी थी। 1950 और 1960 के दशकों के दौरान और यहां तक कि 1970 तक, दुनिया भर में कई लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राजनेताओं का कार्यकाल लंबा रहा था।
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गर्व की नई भावना बनी भारतीयता
  • भारत की गाथा में कई शताब्दियों से सभ्यतागत और सांस्कृतिक उत्कृष्टता समाहित रही है। हालांकि, औपनिवेशिक शासकों द्वारा देशवासियों में डाली गई हीनता की भावना स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही और कई औपनिवेशिक प्रथाओं का महिमामंडन भी होता रहा। एक छोटा-सा अभिजात्य समुदाय बनाया गया, जिसने मैकॉले के विचारों और आदर्शों को कायम रखा। आजादी के बाद के दशकों में अंग्रेजी को शक्ति की भाषा के रूप में बढ़ावा दिया गया।
  • नेहरू युग और उसके तत्काल बाद के समय में भारत की अधिकांश चीजों को लेकर अभिजात्य वर्ग में शर्मिंदगी की भावना देखने को मिली। परंपराओं की जैविक निरंतरता और विकास की कमी के कारण आत्मविश्वास और नवाचार की कमी हुई।
  • पीएम मोदी ने भारतीय भाषाओं, प्रणालियों, प्रतीकों और विश्वास प्रणालियों को सामने रखा। इससे लोगों में भारतीय होने और उसे व्यक्त करने में गर्व की भावना दिखाई पड़ती है। कई देशों में भारतीय मूल के लोगों ने मेरे साथ गर्व की इस नई भावना को साझा किया।
  • नेहरू काल की विशेषता सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर पश्चिम से मंजूरी और सहायता पाने की उत्सुकता थी। मोदी युग         की विशेषता मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था में आत्मविश्वास है, जो गंभीर वैश्विक व्यवधानों का सामना करने में सक्षम है।

भारत सबसे जीवंत लोकतंत्र, पीएम भरोसा दिलाने में रहे सफल
  • राजनीतिक विमर्श के क्षेत्र में, डॉ. अंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने समापन भाषण में ऐतिहासिक वक्तव्य दिया था कि संसदीय लोकतंत्र के तत्व बौद्ध संस्थाओं में पाए जाते हैं, जो दो हजार पांच सौ साल पुराने हैं। उन बौद्ध संस्थाओं ने उस समय प्रचलित राजनीतिक संस्थाओं से लोकतांत्रिक प्रथाओं को अपनाया होगा। हमारे छात्रों और न्यायविदों को यह विश्वास कराया गया कि हमारा लोकतंत्र पश्चिमी देशों  से लिया गया है।
  • पीएम मोदी वैश्विक मंचों पर कहते रहे हैं कि भारत लोकतंत्र की जननी है। विभिन्न अवसरों पर प्राचीन भारतीय लोकतांत्रिक लोकाचारों और प्रथाओं का उल्लेख किया है।
  • विश्व इस तथ्य के प्रति जागरूक हो रहा है कि भारत न केवल सबसे प्राचीन है, बल्कि सबसे बड़ा व सबसे जीवंत लोकतंत्र भी है।

आत्मविश्वास का नया मॉडल
अंग्रेजी भाषा के एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक द्वारा आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने मानसिक उपनिवेशवाद को 2035 तक समाप्त करने के लक्ष्य की बात कही।
नवंबर, 2025 में आयोजित इस कार्यक्रम में, पीएम मोदी ने भारत के लोगों से मैकाले की विरासत में निहित औपनिवेशिक मानसिकता का त्याग करने के लिए 10 साल की राष्ट्रीय प्रतिज्ञा      लेने का आग्रह किया।
बहुत स्पष्ट रूप से कहा कि भारत केवल एक उभरता हुआ बाजार नहीं है, यह एक आत्मविश्वासी नए मॉडल के रूप में उभर रहा है।
 
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