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भारत-एस्टोनियाः दो डिजिटल सभ्यताओं का संगम; डिजिटल संप्रभुता का नया व्याकरण बनेगा गवर्नेंस का वैश्विक मॉडल
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सार
मात्र 13 लाख की आबादी वाले एस्टोनिया ने वह कर दिखाया है, जिसके लिए दुनिया के बड़े और संसाधन संपन्न देश आज भी संघर्ष कर रहे हैं। एस्टोनिया और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी की नई परतें खुल रही हैं, तो इसके केंद्र में केवल रक्षा सौदे नहीं, बल्कि शासन की एक नई सोच है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एस्टोनियाई राष्ट्रपति अलार करिस।
- फोटो : ANI
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विस्तार
भारत और एस्टोनिया के बीच का संवाद केवल दो देशों की मुलाकात नहीं, बल्कि दो 'डिजिटल सभ्यताओं' का संगम है। एस्टोनिया की कहानी यह नहीं है कि उसने क्या हासिल किया, बल्कि यह है कि उसने राज्य को दुरूह शासन प्रणाली देने के बजाय सहज और निर्णायक व्यवस्था देने का साहस दिखाया। आज जब भारत स्केल यानी विस्तार की चुनौतियों से जूझ रहा है और एस्टोनिया प्रिसिजन मतलब सटीकता का वैश्विक मानक बन चुका है, तब राष्ट्रपति अलार करिस की भारत यात्रा शासन और सुरक्षा के उस नए व्याकरण को जन्म दे रही है, जहां डेटा ही नई सीमा है और एआई नया रक्षक।
यूरोप के मानचित्र पर एक छोटा सा देश होने के बावजूद एस्टोनिया ने वह कर दिखाया है, जिसके लिए दुनिया के बड़े और संसाधन संपन्न देश आज भी संघर्ष कर रहे हैं। मात्र 13 लाख की आबादी वाले एस्टोनिया और 140 करोड़ की जनसंख्या वाले भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी की नई परतें खुल रही हैं, तो इसके केंद्र में केवल रक्षा सौदे नहीं, बल्कि शासन की एक नई सोच है। इस सोच में बड़ा-छोटा नहीं, बल्कि प्रभावी और उपयोगी होना अहम है।
तकनीक ही राज्य का ढांचा
यूरोप के कई देशों ने डिजिटल गवर्नेंस को अपनाया तो सही, लेकिन उसे कानूनी जटिलताओं और नौकरशाही की असुरक्षा में उलझा दिया। वहां तकनीकी शासन के ऊपर एक 'अतिरिक्त परत' बनकर रह गई। इसके विपरीत, एस्टोनिया ने तकनीक को सुधार नहीं, बल्कि राज्य का बुनियादी ढांचा बना दिया। एस्टोनिया ने एक ऐसी डिजिटल संस्कृति विकसित की जहाँ नागरिक और राज्य के बीच अविश्वास की दीवार को गिरा दिया गया। यहां डिजिटल पहचान और डेटा-साझाकरण का मतलब नागरिकों पर निगरानी रखना नहीं, बल्कि उन्हें प्रशासनिक बोझ से मुक्त करना है।
शिक्षा और नागरिक बोध, भविष्य की नींव
एस्टोनिया का सबसे दूरदर्शी फैसला स्कूलों में कोडिंग और डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य बनाना था। उन्होंने बच्चों को कोडिंग इसलिए नहीं सिखाई कि वे केवल सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनें, बल्कि इसलिए ताकि वे एक सक्षम नागरिक बन सकें जो सिस्टम की बारीकियों को समझते हों। इसका परिणाम यह हुआ कि एक ऐसी पीढ़ी तैयार हुई जो तकनीक से डरती नहीं, बल्कि उसे संचालित करती है। इसी सामाजिक समझ के कारण एस्टोनियाई प्रशासन को कोई भी बड़ा तकनीकी बदलाव लागू करने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता। यहां नागरिक सिस्टम की भाषा और उसके लाभ को पहले से जानता है।
AI का प्रशासनिक अनुशासन और सटीकता
आज दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर या तो रोमांच है या डर, लेकिन एस्टोनिया ने इसे बहुत पहले ही एक 'बैकएंड टूल' के रूप में अपना लिया था। यहां एआई का उपयोग शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन के लिए किया जाता है। एआईयह तय नहीं करता कि नीति क्या होगी, लेकिन यह स्पष्ट कर देता है कि फाइल कहां अटक रही है और किस सरकारी सेवा की मांग किस क्षेत्र में अधिक है। कई बड़े देश अभी एई की नैतिक नीतियों के ड्राफ्ट बना रहे हैं, एस्टोनिया ने इसे अपनी निर्णय प्रक्रिया का एक विश्वसनीय हिस्सा बना लिया है।
भारत का संदर्भ: 'स्केल' और 'अनुमान' का समन्वय
भारत इस कहानी में इसलिए नहीं जुड़ता कि वह एस्टोनिया की नकल करना चाहता है। दरअसल, भारत का पैमाना और चुनौतियां बिल्कुल अलग हैं। भारत का जुड़ाव इसलिए है क्योंकि वह अब उसी सवाल के अगले चरण में खड़ा है जहां एस्टोनिया पहले पहुंच चुका है कि राज्य को तेज कैसे बनाया जाए, बिना उसे दुरूह बनाए। आधार और यूपीआई के जरिए करोड़ों लोगों तक पहुंचने के बाद, भारत के सामने अब चुनौती भरोसेमंद और पारदरर्शी शासन की है। ऐसे में क्या हमारी नीतियां डेटा से पूरी तरह संचालित हो सकती हैं? यहीं पर एस्टोनिया का अनुभव भारत के लिए एक केस स्टडी बन जाता है।
मोदी फैक्टर: तकनीक को 'कैपेसिटी' मानना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने टेक्नोलॉजी को केवल एक राजनीतिक नारे की तरह नहीं, बल्कि स्टेट कैपेसिटी यानी राज्य की क्षमता बढ़ाने के साधन के रूप में देखा है। भारत और एस्टोनिया के बीच बढ़ता संवाद इसी साझा दर्शन पर टिका है। यहां एआई और डिजिटल को नवाचार नहीं, बल्कि 'गवर्नेंस इंफ्रास्ट्रक्चर' माना जा रहा है। यह साझेदारी केवल स्टार्टअप्स या ऐप्स तक सीमित नहीं है, यह इस बुनियादी सवाल पर टिकी है कि एक आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य अपने नागरिकों के भरोसे पर तकनीक के जरिए कैसे खरा उतरे।
राष्ट्रपति अलार करिस की यात्रा: एक नए युग की आहट
इस वैचारिक पृष्ठभूमि के बीच, एस्टोनिया के राष्ट्रपति अलार करिस की भारत में 'ग्लोबल एआई समिट' के लिए उपस्थिति एक बड़ा रणनीतिक संदेश है। राष्ट्रपति करिस की यात्रा यह रेखांकित करेगी कि कैसे दो डिजिटल शक्तियां, एक जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा डेटा और 'स्केल' है और दूसरी जिसके पास 'सटीकता' है, वे मिलकर रक्षा और शासन का नया वैश्विक पावर कॉरिडोर बना सकते हैं। यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय वार्ता नहीं, बल्कि दो ऐसी संस्कृतियों का मिलन है जो भविष्य के डिजिटल विश्व को सुरक्षित और पारदर्शी बनाने का संकल्प रखती हैं।
एस्टोनिया में भारत के राजदूत आशीष सिन्हा की प्रतिक्रिया
"एस्टोनिया की 'डिजिटल राष्ट्र' के रूप में पहचान और भारत का विशाल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर एक-दूसरे के लिए स्वाभाविक पूरक हैं। यह साझेदारी केवल तकनीक का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लोकतांत्रिक शासन के लिए एक सुरक्षित और पारदर्शी ढांचा तैयार करने की साझा प्रतिबद्धता है।"
एस्टोनियाई विदेश मंत्री मार्गुस साहक्ना की प्रतिक्रिया
"हम भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक 'प्रमुख रणनीतिक साझेदार' के रूप में देखते हैं। एआई और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में हमारा सहयोग वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए 'ट्रस्टेड कनेक्टिविटी' के विचार को और अधिक मजबूत करेगा।"
एस्टोनियाई मॉडल और भारत के लिए संभावनाएं
1.वन्स-ओनली सिद्धांत
एस्टोनिया में नागरिक को अपनी जानकारी सरकार को केवल एक बार देनी पड़ती है। भारत में इसे लागू करने से विभिन्न मंत्रालयों के बीच फाइलों का चक्कर खत्म हो सकता है।
2.डेटा एम्बेसी
एस्टोनिया ने युद्ध जैसी स्थिति के लिए दूसरे देशों में डिजिटल बैकअप बनाए हैं। भारत अपनी डिजिटल संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए इस 'डिजिटल संदूक' की अवधारणा को अपना सकता है।
3.प्रशासनिक एआई
एस्टोनियाई मॉडल से भारत यह सीख सकता है कि कैसे एआई का उपयोग भ्रष्टाचार मिटाने और नौकरशाही की देरी को पहचानने के लिए एक 'बैकएंड वॉचडॉग' के रूप में किया जाए।
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तकनीक ही राज्य का ढांचा
यूरोप के कई देशों ने डिजिटल गवर्नेंस को अपनाया तो सही, लेकिन उसे कानूनी जटिलताओं और नौकरशाही की असुरक्षा में उलझा दिया। वहां तकनीकी शासन के ऊपर एक 'अतिरिक्त परत' बनकर रह गई। इसके विपरीत, एस्टोनिया ने तकनीक को सुधार नहीं, बल्कि राज्य का बुनियादी ढांचा बना दिया। एस्टोनिया ने एक ऐसी डिजिटल संस्कृति विकसित की जहाँ नागरिक और राज्य के बीच अविश्वास की दीवार को गिरा दिया गया। यहां डिजिटल पहचान और डेटा-साझाकरण का मतलब नागरिकों पर निगरानी रखना नहीं, बल्कि उन्हें प्रशासनिक बोझ से मुक्त करना है।
शिक्षा और नागरिक बोध, भविष्य की नींव
एस्टोनिया का सबसे दूरदर्शी फैसला स्कूलों में कोडिंग और डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य बनाना था। उन्होंने बच्चों को कोडिंग इसलिए नहीं सिखाई कि वे केवल सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनें, बल्कि इसलिए ताकि वे एक सक्षम नागरिक बन सकें जो सिस्टम की बारीकियों को समझते हों। इसका परिणाम यह हुआ कि एक ऐसी पीढ़ी तैयार हुई जो तकनीक से डरती नहीं, बल्कि उसे संचालित करती है। इसी सामाजिक समझ के कारण एस्टोनियाई प्रशासन को कोई भी बड़ा तकनीकी बदलाव लागू करने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता। यहां नागरिक सिस्टम की भाषा और उसके लाभ को पहले से जानता है।
AI का प्रशासनिक अनुशासन और सटीकता
आज दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर या तो रोमांच है या डर, लेकिन एस्टोनिया ने इसे बहुत पहले ही एक 'बैकएंड टूल' के रूप में अपना लिया था। यहां एआई का उपयोग शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन के लिए किया जाता है। एआईयह तय नहीं करता कि नीति क्या होगी, लेकिन यह स्पष्ट कर देता है कि फाइल कहां अटक रही है और किस सरकारी सेवा की मांग किस क्षेत्र में अधिक है। कई बड़े देश अभी एई की नैतिक नीतियों के ड्राफ्ट बना रहे हैं, एस्टोनिया ने इसे अपनी निर्णय प्रक्रिया का एक विश्वसनीय हिस्सा बना लिया है।
भारत का संदर्भ: 'स्केल' और 'अनुमान' का समन्वय
भारत इस कहानी में इसलिए नहीं जुड़ता कि वह एस्टोनिया की नकल करना चाहता है। दरअसल, भारत का पैमाना और चुनौतियां बिल्कुल अलग हैं। भारत का जुड़ाव इसलिए है क्योंकि वह अब उसी सवाल के अगले चरण में खड़ा है जहां एस्टोनिया पहले पहुंच चुका है कि राज्य को तेज कैसे बनाया जाए, बिना उसे दुरूह बनाए। आधार और यूपीआई के जरिए करोड़ों लोगों तक पहुंचने के बाद, भारत के सामने अब चुनौती भरोसेमंद और पारदरर्शी शासन की है। ऐसे में क्या हमारी नीतियां डेटा से पूरी तरह संचालित हो सकती हैं? यहीं पर एस्टोनिया का अनुभव भारत के लिए एक केस स्टडी बन जाता है।
मोदी फैक्टर: तकनीक को 'कैपेसिटी' मानना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने टेक्नोलॉजी को केवल एक राजनीतिक नारे की तरह नहीं, बल्कि स्टेट कैपेसिटी यानी राज्य की क्षमता बढ़ाने के साधन के रूप में देखा है। भारत और एस्टोनिया के बीच बढ़ता संवाद इसी साझा दर्शन पर टिका है। यहां एआई और डिजिटल को नवाचार नहीं, बल्कि 'गवर्नेंस इंफ्रास्ट्रक्चर' माना जा रहा है। यह साझेदारी केवल स्टार्टअप्स या ऐप्स तक सीमित नहीं है, यह इस बुनियादी सवाल पर टिकी है कि एक आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य अपने नागरिकों के भरोसे पर तकनीक के जरिए कैसे खरा उतरे।
राष्ट्रपति अलार करिस की यात्रा: एक नए युग की आहट
इस वैचारिक पृष्ठभूमि के बीच, एस्टोनिया के राष्ट्रपति अलार करिस की भारत में 'ग्लोबल एआई समिट' के लिए उपस्थिति एक बड़ा रणनीतिक संदेश है। राष्ट्रपति करिस की यात्रा यह रेखांकित करेगी कि कैसे दो डिजिटल शक्तियां, एक जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा डेटा और 'स्केल' है और दूसरी जिसके पास 'सटीकता' है, वे मिलकर रक्षा और शासन का नया वैश्विक पावर कॉरिडोर बना सकते हैं। यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय वार्ता नहीं, बल्कि दो ऐसी संस्कृतियों का मिलन है जो भविष्य के डिजिटल विश्व को सुरक्षित और पारदर्शी बनाने का संकल्प रखती हैं।
एस्टोनिया में भारत के राजदूत आशीष सिन्हा की प्रतिक्रिया
"एस्टोनिया की 'डिजिटल राष्ट्र' के रूप में पहचान और भारत का विशाल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर एक-दूसरे के लिए स्वाभाविक पूरक हैं। यह साझेदारी केवल तकनीक का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लोकतांत्रिक शासन के लिए एक सुरक्षित और पारदर्शी ढांचा तैयार करने की साझा प्रतिबद्धता है।"
एस्टोनियाई विदेश मंत्री मार्गुस साहक्ना की प्रतिक्रिया
"हम भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक 'प्रमुख रणनीतिक साझेदार' के रूप में देखते हैं। एआई और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में हमारा सहयोग वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए 'ट्रस्टेड कनेक्टिविटी' के विचार को और अधिक मजबूत करेगा।"
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1.वन्स-ओनली सिद्धांत
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एस्टोनिया ने युद्ध जैसी स्थिति के लिए दूसरे देशों में डिजिटल बैकअप बनाए हैं। भारत अपनी डिजिटल संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए इस 'डिजिटल संदूक' की अवधारणा को अपना सकता है।
3.प्रशासनिक एआई
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