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Explainer: भारत में ई-22 से ई-30 पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं, फिर क्यों हटा उत्पाद शुल्क, सरकार की क्या तैयारी?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 12 Jun 2026 10:44 AM IST
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सार

वित्त मंत्रालय ने एक नई अधिसूचना जारी कर उच्च इथेनॉल मिश्रण (22% से 30%) वाले पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क को पूरी तरह खत्म कर दिया है। हालांकि, भारत में मौजूदा समय में ई-20 यानी 20 फीसदी इथेनॉल मिश्रण वाला पेट्रोल ही चलन में है। ऐसे में ज्यादा ब्लेंडिंग वाले पेट्रोल पर सरकार का एक्साइज ड्यूटी हटाना चर्चा में है। आइये जानते हैं इस कदम के मायने...

Indian Government Excise Duty E22 to E30 Petrol Prices Ethanol Blending Fuel Modi Govt E20 Standard know plann
पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को बढ़ाने की तैयारी। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

भारत में बीते कुछ वर्षो में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग की दर तेजी से बढ़ी है। पहले प्योर पेट्रोल यानी ईंधन में बिना किसी और तरल पदार्थ के मिलावट वाला पेट्रोल दशकों तक इस्तेमाल में रहा। हालांकि, भारत में अलग-अलग सरकारों के दौर में इथेनॉल ब्लेंडिंग पहले ई-10 और फिर मोदी सरकार के दौर में ई-20 तक जा पहुंची। अब केंद्र सरकार इस इथेनॉल ब्लेंडिंग को और बढ़ाने की तैयारी में है। गुरुवार को केंद्र सरकार के एक फैसले ने इसके संकेत मजबूत कर दिए। दरअसल, सरकार ने ई-20 से ऊपर वाले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) को खत्म कर दिया है, वह भी तब जब भारत में ई-20 से ऊपर का पेट्रोल चलन में नहीं है। 


ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिलनाने का इतिहास क्या रहा है? मौजूदा समय में किस हद तक इथेनॉल ब्लेंडिंग वाले पेट्रोल को चलन में लाया गया है? केंद्र सरकार के ई-20 से ऊपर वाले पेट्रोल से एक्साइज ड्यूटी हटाने के फैसले के क्या मायने हैं? ई-20 और इससे ऊपर इथेनॉल की मात्रा वाले पेट्रोल में कितना फर्क है? भारत में इस वक्त जो वाहन इस्तेमाल में हैं, वे पेट्रोल में कितने इथेनॉल के साथ चलने में कारगर हैं? आइये जानते हैं...
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भारत में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग का इतिहास क्या है?

भारत में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग (सम्मिश्रण) का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। इसकी शुरुआत 2000 के दशक से ही हुई। हालांकि, केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को तेजी से बढ़ाया गया। 

1. शुरुआती चरण: 2014 तक

2014 में पेट्रोल में इथेनॉल को मिलाने का अभियान अपने निम्नतम स्तर पर था। तब पेट्रोल में इथेनॉल की मिक्सिंग 1.5 फीसदी तक सीमित रखी गई थी। यानी पेट्रोल पंपों पर तकरीबन शुद्ध पेट्रोल ही मौजूद था। 


2. मोदी सरकार के आने के बाद: 2014 से

ई-10 पेट्रोल को बढ़ावा
हालांकि, 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग पर तेजी से काम किया गया। केंद्र सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा 10 फीसदी तक बढ़ा दी। यानी 90 फीसदी पेट्रोल में 10 फीसदी इथेनॉल की मिक्सिंग। इसके बाद 2022 तक ई10 ईंधन देश में मानक बना रहा। 

3. ई-20 की ओर तेज रुख: 2021 से

पेट्रोल में इथेनॉल को मिलाने की दिशा में एक अहम मोड़ तब आया जब 2021 में नीति आयोग ने भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग 2020-25 के लिए रोडमैप जारी किया। इस रोडमैप के तहत ई20 यानी पेट्रोल में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग के लक्ष्य को पाने की समयसीमा 2030 से घटाकर 2025 कर दी गई।

2022 में इस लक्ष्य को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति 2018 (National Policy on Biofuels) में संशोधन किया, ताकि इस कार्यक्रम को और गति दी जा सके। नतीजतन जून 2022 में तेल विपणन कंपनियों ने निर्धारित लक्ष्य से पांच महीने पहले ही 10% ब्लेंडिंग का माइलस्टोन हासिल कर लिया।

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मौजूदा समय में किस हद तक इथेनॉल ब्लेंडिंग वाले पेट्रोल चलन में हैं?  

  • 2023 में इंडिया एनर्जी वीक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ई-20 ईंधन लॉन्च किया और इसे शुरुआत में 11 राज्यों के 84 पेट्रोल पंपों पर रोलआउट किया गया। 
  • सरकार ने अप्रैल 2023 से बेचे जाने वाले सभी नए वाहनों के लिए ई-20-अनुरूप (मटेरियल-कंप्लायंट) होना अनिवार्य कर दिया। इसके बाद अप्रैल 2025 से पूरी तरह से ई-20 पेट्रोल के अनुरूप वाहनों की बिक्री शुरू हो गई। 
  • अगस्त 2025 तक भारत ने 19.93% औसत इथेनॉल ब्लेंडिंग का आंकड़ा छू लिया, जो कि लक्ष्य (20% सम्मिश्रण) से लगभग छह महीने पहले ही हासिल कर लिया गया था।
मौजूदा समय में देशभर के पेट्रोल पंपों पर ई-20 ईंधन सबसे व्यापक रूप से उपलब्ध है। 1 अप्रैल 2026 से इसका इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया है। मौजूदा समय में भारत में बिकने वाले अधिकांश नए पेट्रोल वाहन विशेष रूप से ई20 ईंधन पर सुरक्षित रूप से चलने के लिए प्रमाणित और डिजाइन किए गए हैं।

केंद्र के ई-20 से ऊपर वाले पेट्रोल से एक्साइज ड्यूटी हटाने के फैसले के क्या मायने?

केंद्र सरकार की तरफ से गुरुवार को ई-22, ई-25, ई-27 और ई-30 यानी 22 से 30 फीसदी तक इथेनॉल की मौजूदगी वाले पेट्रोल से केंद्रीय उत्पाद शुल्क पूरी तरह हटाया गया है। इसके जरिए केंद्र सरकार का मुख्य मकसद कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता में कमी बताया गया है। हालांकि, एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि भारत में अभी ई-20 से ऊपर इथेनॉल ब्लेंड वाला पेट्रोल प्रयोग में ही नहीं है। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार अब ई-20 से ऊपर इथेनॉल मिलावट वाले पेट्रोल को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है।

1. कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता में कमी और ऊर्जा सुरक्षा 

भारत अपनी तेल खपत का लगभग 85% हिस्सा आयात करता है, जिसकी आपूर्ति का संकट मौजूदा समय में काफी गहराया है। ऐसे में केंद्र सरकार अब भारत में ही इथेनॉल के उत्पादन का फायदा उठाते हुए आम पेट्रोल में इसकी ब्लेंडिंग बढ़ाने की तैयारी कर रही है। बताया गया है कि उच्च इथेनॉल वाले पेट्रोल को उत्पाद शुल्क में छूट देने का मुख्य मकसद यही है कि तेल कंपनियां जल्द उच्च इथेनॉल ब्लेंड वाले ईंधन का उत्पादन बढ़ाएं, ताकि इनकी बिक्री शुरू की जा सके और विदेश से आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम की जा सके। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा का प्रबंधन भी सुनिश्चित किया जा सकता है।

ये भी पढ़ें: Ethanol: महंगे क्रूड के कारण बड़ा फैसला; E22 से E30 इथेनॉल वाले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी शून्य, जानिए मतलब

2. इथेनॉल उद्योग की अतिरिक्त क्षमता का इस्तेमाल करने की तैयारी

भारत की इथेनॉल उत्पादन क्षमता में हाल के वर्षों में भारी बढ़ोतरी हुई है और वर्तमान में यह 20-21 अरब लीटर प्रति वर्ष तक पहुंच गई है। हालांकि, मौजूदा ई-20 ब्लेंडिंग लक्ष्य के लिए केवल 10-12 अरब लीटर इथेनॉल की ही आवश्यकता होती है। यह फैसला डिस्टिलरी (शराब बनाने वाले) उद्योग के लिए एक स्पष्ट संकेत है, जिससे वे अपनी बची हुई अतिरिक्त क्षमता, जो वर्तमान में सिर्फ 50% उपयोग हो रही है, का व्यावसायिक उपयोग कर सकेंगे।


3. ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों को फायदा पहुंचाने की तैयारी

चूंकि, इथेनॉल घरेलू स्तर पर कृषि उत्पादों (मुख्य रूप से गन्ना और मक्का) से तैयार किया जाता है, इसलिए उच्च ब्लेंड्स के चलन में आने से इथेनॉल की मांग बढ़ेगी। इसका नतीजा यह होगा कि भारत का जो पैसा विदेशी कच्चा तेल खरीदने में जाता है, वह सीधे भारतीय किसानों की जेब में जाएगा, जिससे उनकी आय बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त होगी। 

4. भारत में प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन को कम करने का लक्ष्य

यह फैसला कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने और भारत को उसके 'स्वच्छ ईंधन' और पर्यावरण लक्ष्यों की ओर आगे ले जाने में भी एक बड़ी भूमिका निभाएगा। दरअसल, सरकार की खुद की रिपोर्ट के मुताबिक, ई-10 ईंधन की तुलना में, ई-20 ईंधन के इस्तेमाल से कार्बन उत्सर्जन में लगभग 30% तक की गिरावट आती है। इसके पीछे वजह बताई गई है कि इथेनॉल का ऑक्टेन नंबर पेट्रोल से अधिक होता है (पेट्रोल के 84.4 के मुकाबले इथेनॉल का लगभग 108.5)। इसके वाष्पीकरण की उच्च ताप क्षमता इंजन के तापमान को कम रखती है, जिससे ईंधन अधिक अच्छी तरह से जलता है और खतरनाक गैसों का उत्सर्जन कम होता है। ऐसे में पेट्रोल में जितना ज्यादा इथेनॉल की मिलावट बढ़ाई जाएगी, उतना ही प्रदूषण कम करने का दावा किया जाता है। 

अगर भारत में ई-20 प्रचलन में तो ज्यादा इथेनॉल ब्लेंडिंग का गाड़ियों पर क्या असर?

भारत में ई-10 को लेकर नीति आने के बाद से वाहन निर्माताओं ने इसी वर्ग के पेट्रोल के लिए गाड़ियां बनाना जारी रखा था। ऐसे में 2012 से मार्च 2023 के बीच निर्मित अधिकांश कारें और दोपहिया वाहन विशेष रूप से ई-10 ईंधन को ही ध्यान में रखकर डिजाइन्ड हैं। कुछ ही वाहन निर्माता ऐसे थे जिनके वाहन 2009 से ही ई-20 के अनुकूल थे। ऐसे में 2023 के बाद जब ई-20 ईंधन को मानक बनाया गया, तब कई ई-10 वाहनों में दिक्कतों की बातें सामने आईं। 2023 के बाद से वाहन निर्माताओं ने भी अपने वाहनों को ई-20 के लिए ही डिजाइन करना शुरू कर दिया। 

ऐसे में अभी भी ई-20 कॉम्पैटिबल वाहनों के जरिए ई20 पेट्रोल का मानक के रूप में स्थापित होना जारी है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि अगर ई-10 और ई-20 पेट्रोल के लिए बनाए गए पुराने और मौजूदा वाहनों में ई22, ई25, ई30 या ई85 जैसे ज्यादा इथेनॉल वाले पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है, तो गाड़ियों पर इसके कई गंभीर और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। 

1. माइलेज (ईंधन दक्षता) में भारी कमी

उच्च इथेनॉल ब्लेंडिंग का सबसे सीधा असर गाड़ी के माइलेज पर पड़ता है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ई-20 के लिए कैलिब्रेट किए गए वाहनों में 1 से 2 प्रतिशत की ईंधन दक्षता में गिरावट आ सकती है। 

हालांकि, सड़क पर उपभोक्ताओं का अनुभव इससे कहीं अधिक खराब रहा है। लोकल सर्किल्स नाम की संस्था के सर्वे के मुताबिक, कुछ वाहन मालिकों ने ईंधन दक्षता में 20% तक की कमी की बात कही है। ऐसे में ई-22 से ई-30 पेट्रोल का मार्च 2023 से पहले निर्मित वाहनों के माइलेज पर नकारात्मक असर और भी ज्यादा हो सकता है।


2. इंजन और पुर्जों को नुकसान

इथेनॉल की यह विशेषता होती है कि वह पेट्रोल की तुलना में अधिक तेजी से नमी सोखता है और इसके जलने का तरीका भी अलग होता है। अगर उच्च इथेनॉल, जैसे ई-25 या ई-30 को ई-20 या ई-10 अनुकूल वाहनों में डाला जाता है, तो लंबे समय में यह रबर सील, गैसकेट, फ्यूल लाइन, फ्यूल पंप और इंजेक्टर को नुकसान पहुंचा सकता है। यह पुर्जे इतनी अधिक इथेनॉल सांद्रता को झेलने के लिए डिजाइन नहीं किए गए हैं। 

क्या मौजूदा ई-20 वाहनों को ज्यादा इथेनॉल के लिए बदला जा सकता है?

विशेषज्ञों के मुताबिक, ई-20 वाहन को ई-30 के लिए अनुकूल बनाना तकनीकी रूप से कुछ हद तक संभव है। इसके लिए कन्वर्जन किट के जरिए इंजन कंट्रोल यूनिट (ईसीयू) को रीकैलिब्रेट करना और फ्यूल इंजेक्शन में बदलाव करना होगा। हालांकि, अभी तक बाजार में सभी कारों के लिए कोई एक यूनिवर्सल कन्वर्जन किट मौजूद नहीं है।


क्या ई-10, ई-20 वाहनों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार बदल सकती है नीति?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा ई-10 और ई-20 वाहनों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार अपनी नीति में सावधानी बरत रही है और भविष्य की रणनीतियों में बदलाव कर रही है। पुराने और मौजूदा वाहनों को नुकसान से बचाने के लिए सरकार ई-20 से ऊपर के इथेनॉल ब्लेंड को सभी के लिए अनिवार्य करने में जल्दबाजी नहीं करेगी। 

अनिवार्य ब्लेंडिंग की सीमा तय रखेगी सरकार: नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों को इस बात की चिंता है कि इथेनॉल की मात्रा ई-20 से अधिक (जैसे ई-25 या ई-30) करने से लाखों मौजूदा ई-10 और ई-20 वाहनों के माइलेज में गिरावट आएगी और उनके रखरखाव का खर्च बढ़ जाएगा। इसलिए, सरकार फिलहाल ई-20 से आगे की ब्लेंडिंग को सभी के लिए अनिवार्य करने के पक्ष में नहीं है। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री ने भी सरकार को सुझाव दिया है कि सामान्य कारों के लिए ब्लेंडिंग को ई-20 पर ही स्थिर रखा जाए।

ईंधन को लेकर 'मल्टी-ब्लेंड' विकल्प: पुराने वाहनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार पेट्रोल पंपों पर अलग-अलग डिस्पेंसर (नॉजल) लगाने की तैयारी कर रही है। पेट्रोल पंपों पर स्पष्ट रूप से लेबल लगा होगा कि मशीन से कौन सा ईंधन- ई-20, ई-22, ई-25, ई-30 या ई-85) मिल रहा है। इससे उपभोक्ता अपनी गाड़ी के इंजन की मौजूदा क्षमता (ई-10 या ई-20) के अनुसार सही ईंधन चुन सकेंगे और इंजन खराब होने के खतरे से बचेंगे। 

फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों पर जोर: मौजूदा ई-20 वाहनों को उच्च ब्लेंड के अनुकूल बनाने के लिए महंगी कन्वर्जन किट या इंजन में बदलाव करने के बजाय, सरकार अब खास 'फ्लेक्स-फ्यूल' वाहनों की बिक्री को बढ़ावा देने की नीति अपना रही है। ये ऐसे वाहन हैं जो ई-20 से लेकर ई-100 तक किसी भी स्तर के इथेनॉल ईंधन पर सुरक्षित रूप से चल सकते हैं। हाल ही में सुजुकी और हीरो जैसी कंपनियों ने अपने फ्लेक्स फ्यूल वाहनों की रेंज भी पेश की है।

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