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'सवाल पूछना विद्रोह नहीं': सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा- लोकतंत्र में अलग आवाजों को सुना जाए

Sun, 30 Aug 2026 02:11 PM IST
Devesh Tripathi पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Sun, 30 Aug 2026 02:11 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्जल भुइयां ने विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र विचार और स्वस्थ बहस का केंद्र बनाए रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि छात्रों की अलग राय या कठिन सवालों को अनुशासनात्मक कार्रवाई के डर से दबाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उनके मुताबिक असहमति को टकराव के बजाय तर्क और संवाद के माध्यम से स्वीकार किया जाना चाहिए।

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न्यायमूर्ति भुइयां - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/IANS

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्जल भुइयां ने रविवार को कहा कि अलग राय रखने या सवाल पूछने वाले छात्रों को दंडात्मक कार्रवाई की धमकी नहीं दी जा सकती। ऐसा करना असांविधानिक और सत्ता का दुरुपयोग है। न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि विश्वविद्यालय ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां "स्थापित धारणाओं" की "जांच और सवाल" किए जा सकें तथा असहमति का जवाब दुश्मनी से नहीं दिया जाए।
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उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय वह जगह है, जहां स्वतंत्र रूप से सोचने की आदत विकसित होती है और छात्र कठिन सवाल पूछने में संकोच नहीं करता। उन्होंने कहा कि सवाल पूछने का अधिकार विद्रोह नहीं है और "असहिष्णु सोच" भारतीय संविधान की भावना के विपरीत है। शीर्ष अदालत के न्यायाधीश दिल्ली स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर छात्रों के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे।
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विधि छात्रों से जस्टिस भुइयां ने क्या-क्या कहा?
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, "जब छात्र अलग दृष्टिकोण रखते हैं, जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो उन्हें दंडात्मक कार्रवाई की धमकी नहीं दी जा सकती। यह असांविधानिक है। यह सत्ता और पद का दुरुपयोग है।"
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उन्होंने कहा, "विश्वविद्यालय वह जगह है, जहां व्यक्ति ऐसे विचारों से रूबरू होते हैं, जो उनके अपने विचारों से अलग हो सकते हैं। जहां स्थापित धारणाओं की जांच और सवाल किए जा सकते हैं और जहां असहमति दुश्मनी के बजाय तर्क के जरिए व्यक्त की जा सकती है। अगर हम ऐसा लोकतांत्रिक समाज चाहते हैं, जो स्वतंत्रता और भिन्नता का सम्मान करता हो, तो इस संस्कृति की शुरुआत विश्वविद्यालयों से होनी चाहिए।"

असहिष्णु सोच को लेकर क्या बोले जस्टिस उज्जल भुइयां?
दीक्षांत समारोह में अपने संबोधन के दौरान न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि भारतीय संविधान यह मानता है कि एक स्वतंत्र समाज में अलग-अलग विचार और मान्यताएं होंगी। सार्वजनिक जीवन में सार्थक भागीदारी तभी संभव है, जब असहमति के लिए जगह हो। उन्होंने कहा कि सहिष्णुता एक "सांविधानिक मूल्य" है। बुद्ध और गांधी की भूमि भारत में "असहिष्णु सोच" के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह भी एक तरह की हिंसा है।

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, "हमारा संविधान अलग तरीके से बोलने, सोचने और विश्वास करने की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। असहिष्णुता उस व्यवस्था को कमजोर करने लगती है, जब असहमति या विरोध को वैध मतभेद के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसे दबाने, खारिज करने या दंडित करने की कोशिश की जाती है। इसलिए असहमति के साथ जीने की क्षमता केवल सामाजिक गुण नहीं है। यह उदार सांविधानिक लोकतंत्र का मूल तत्व है।"

सांविधानिक मूल्य रहें समझ का केंद्र : जस्टिस भुइयां
उन्होंने कहा कि कानून के पेशेवरों और विद्वानों की जिम्मेदारी है कि असहमति के समय भी स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और न्याय जैसे सांविधानिक मूल्य कानून की समझ के केंद्र में बने रहें। न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, "लोकतंत्र तब सार्थक नहीं होता जब हर कोई विचारों की एक ही भाषा बोलता हो, बल्कि तब होता है जब अलग-अलग आवाजें साथ रह सकें, उन्हें सुना जाए और गरिमा के साथ व्यवहार किया जाए।"


उन्होंने कहा, "लोकतंत्र का बहुमत केवल इस बात से नहीं झलकता कि वह लोकप्रिय विचारों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इससे भी पता चलता है कि वह मुश्किल, अलोकप्रिय या कभी-कभी बेहद असुविधाजनक विचारों पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।"
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