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Siddaramaiah Profile: नौ बार विधायक- दो बार बने CM, सिद्धारमैया ने तय किया जनता परिवार से कांग्रेस तक का सफर
पीटीआई, बंगलूरू
Published by: अमन तिवारी
Updated Thu, 28 May 2026 05:48 PM IST
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सार
सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। वह राज्य में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता है। जनता परिवार से कांग्रेस तक का उनका सफर बेहद प्रभावशाली रहा। अब उन्होंने आपसी समझौते के तहत पद छोड़ा है।
सिद्धारमैया, मुख्यमंत्री, कर्नाटक
- फोटो : एक्स/सिद्धारमैया
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विस्तार
सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। वह कर्नाटक के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता बन गए हैं। 77 साल के इस दिग्गज नेता ने कांग्रेस हाईकमान के निर्देश पर अपना कार्यकाल खत्म होने से दो साल पहले ही पद छोड़ दिया। यह फैसला राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के लिए लिया गया है। सिद्धारमैया ने 7 जनवरी को कांग्रेस के ही दिग्गज नेता देवराज अर्स का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। जब उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में 7 जनवरी को 2,792 दिन पूरे किए।
बता दें कि, सिद्धारमैया नौ बार विधायक चुने जा चुके हैं। वह अपने राजनीतिक करियर में दो बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। वह पहली बार 2013 में मुख्यमंत्री बने और अपना कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद पांच साल के अंतराल के बाद 2023 में वह फिर से इस शीर्ष पद पर पहुंचे।
ये भी पढ़ें: कर्नाटक CM पद से दिया इस्तीफा: राज्यसभा भी नहीं जाएंगे सिद्धारमैया, कांग्रेस आलाकमान को बताया आगे का प्लान
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सिद्धारमैया का जन्म 12 अगस्त 1948 को मैसूर जिले के सिद्धारमनहुंडी गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक और फिर कानून की डिग्री हासिल की। राजनीति में आने से पहले उन्होंने कुछ समय तक वकालत भी की। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत एक तालुका बोर्ड सदस्य के रूप में की थी। 1983 में वह पहली बार चामुंडेश्वरी निर्वाचन क्षेत्र से लोक दल के टिकट पर विधानसभा पहुंचे।
शुरुआत में सिद्धारमैया जनता परिवार से जुड़े थे और दो दशकों तक कांग्रेस के कट्टर विरोधी रहे। वह राम मनोहर लोहिया के समाजवाद से काफी प्रभावित थे। रामकृष्ण हेगड़े की सरकार के दौरान वह 'कन्नड़ कवलु समिति' के पहले अध्यक्ष बने। बाद में उन्होंने रेशम उत्पादन मंत्री के रूप में भी काम किया। 2004 में जब कांग्रेस और जेडी(एस) की गठबंधन सरकार बनी, तब वह उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि, उन्हें हमेशा यह मलाल रहा कि एचडी देवेगौड़ा की वजह से वह उस समय मुख्यमंत्री नहीं बन पाए।
ये भी पढ़ें: सीएम सिद्धारमैया इस्तीफे के बाद बोले: कांग्रेस आलाकमान के कहने पर पद छोड़ा, राज्यपाल के सचिव को दिया त्यागपत्र
2005 में जेडी(एस) से निकाले जाने के बाद सिद्धारमैया के राजनीतिक करियर में बड़ा मोड़ आया। उन्होंने नई क्षेत्रीय पार्टी बनाने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे। इसी दौरान भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उन्हें अपनी पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। सिद्धारमैया ने भाजपा की विचारधारा से असहमति जताई और 2006 में कांग्रेस का हाथ थाम लिया। यह उनके लिए एक बड़ा बदलाव था क्योंकि वह वर्षों तक कांग्रेस के खिलाफ राजनीति करते रहे थे।
कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और दलितों को एकजुट करने के लिए 'अहिंदा' सम्मेलनों का नेतृत्व किया। उनकी मेहनत रंग लाई और वह 2013 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2023 में वह दोबारा इस पद पर पहुंचे। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने कई जन कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं। हालांकि, उन पर मैसूर में अपनी पत्नी को मुडा (MUDA) साइट आवंटित करने में अनियमितता के आरोप भी लगे। इस अनुभवी राजनेता का अपने उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री की कुर्सी के एक अन्य दावेदार, डीके शिवकुमार के साथ सत्ता को लेकर लंबे समय से संघर्ष चल रहा था। आखिरकार आज यानी गुरुवार को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
बता दें कि, सिद्धारमैया नौ बार विधायक चुने जा चुके हैं। वह अपने राजनीतिक करियर में दो बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। वह पहली बार 2013 में मुख्यमंत्री बने और अपना कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद पांच साल के अंतराल के बाद 2023 में वह फिर से इस शीर्ष पद पर पहुंचे।
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सिद्धारमैया का जन्म 12 अगस्त 1948 को मैसूर जिले के सिद्धारमनहुंडी गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक और फिर कानून की डिग्री हासिल की। राजनीति में आने से पहले उन्होंने कुछ समय तक वकालत भी की। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत एक तालुका बोर्ड सदस्य के रूप में की थी। 1983 में वह पहली बार चामुंडेश्वरी निर्वाचन क्षेत्र से लोक दल के टिकट पर विधानसभा पहुंचे।
शुरुआत में सिद्धारमैया जनता परिवार से जुड़े थे और दो दशकों तक कांग्रेस के कट्टर विरोधी रहे। वह राम मनोहर लोहिया के समाजवाद से काफी प्रभावित थे। रामकृष्ण हेगड़े की सरकार के दौरान वह 'कन्नड़ कवलु समिति' के पहले अध्यक्ष बने। बाद में उन्होंने रेशम उत्पादन मंत्री के रूप में भी काम किया। 2004 में जब कांग्रेस और जेडी(एस) की गठबंधन सरकार बनी, तब वह उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि, उन्हें हमेशा यह मलाल रहा कि एचडी देवेगौड़ा की वजह से वह उस समय मुख्यमंत्री नहीं बन पाए।
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2005 में जेडी(एस) से निकाले जाने के बाद सिद्धारमैया के राजनीतिक करियर में बड़ा मोड़ आया। उन्होंने नई क्षेत्रीय पार्टी बनाने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे। इसी दौरान भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उन्हें अपनी पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। सिद्धारमैया ने भाजपा की विचारधारा से असहमति जताई और 2006 में कांग्रेस का हाथ थाम लिया। यह उनके लिए एक बड़ा बदलाव था क्योंकि वह वर्षों तक कांग्रेस के खिलाफ राजनीति करते रहे थे।
कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और दलितों को एकजुट करने के लिए 'अहिंदा' सम्मेलनों का नेतृत्व किया। उनकी मेहनत रंग लाई और वह 2013 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2023 में वह दोबारा इस पद पर पहुंचे। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने कई जन कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं। हालांकि, उन पर मैसूर में अपनी पत्नी को मुडा (MUDA) साइट आवंटित करने में अनियमितता के आरोप भी लगे। इस अनुभवी राजनेता का अपने उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री की कुर्सी के एक अन्य दावेदार, डीके शिवकुमार के साथ सत्ता को लेकर लंबे समय से संघर्ष चल रहा था। आखिरकार आज यानी गुरुवार को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।