Explainer: केरलम के और करीब केरल; कैसे बदलता है किसी राज्य का नाम, आजादी के बाद कब-कब और किसके साथ हुआ ऐसा?
आजादी के बाद भारत में राज्यों के नाम और स्वरूप कई बार बदले हैं। कभी भाषाई पहचान के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ, तो कभी किसी राज्य के नाम को उसकी स्थानीय पहचान के अनुरूप बदला गया। अब केरल का नाम केरलम करने की प्रक्रिया इसी सिलसिले की नई कड़ी है। आइए विस्तार से जानते हैं।
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विस्तार
केरल का नाम बदलकर केरलम करने का विधेयक मंगलवार को लोकसभा से पारित हो गया। राज्यसभा से पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी बाद केरल आधिकारिक तौर पर केरलम के रूप में पहचाना जाएगा। ये पहला मौका नहीं है जब देश के किसी राज्य का नाम बदलने जा रहा है। आजादी के बाद कई मौकों पर राज्यों के नाम और स्वरूप बदले हैं।
आजाद भारत में राज्यों के नाम और स्वरूप बदलने का क्या इतिहास है? अब केरल का नाम केरलम क्यों किया जा रहा है? पहले राज्यों के नाम कब-कब बदले हैं? इन बदलावों के पीछे वजह क्या थी? राज्यों का नक्शा कैसे बदला? और किसी राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है? आइए जानते हैं...
राज्यों का नाम और स्वरूप बदलने का क्या इतिहास है?
1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम इसका सबसे बड़ा पड़ाव था, जब भाषा को महत्वपूर्ण आधार बनाकर कई राज्यों की सीमाएं और संरचना बदली गईं। इस पुनर्गठन में प्रशासनिक और अन्य व्यावहारिक पहलू भी शामिल थे, लेकिन राज्यों के नाम बदलने का सिलसिला इससे पहले ही शुरू हो चुका था। 1950 में संयुक्त प्रांत का नाम बदलकर उत्तर प्रदेश किया जा चुका था।
इसके बाद अलग-अलग समय पर आंध्र राज्य से आंध्र प्रदेश, मद्रास राज्य से तमिलनाडु, मैसूर राज्य से कर्नाटक, उत्तरांचल से उत्तराखंड और उड़ीसा से ओडिशा जैसे नाम परिवर्तन हुए। अब केरल का नाम 'केरल' से 'केरलम' करने की प्रक्रिया इसी क्रम में नया मामला है। लोकसभा 11 अगस्त 2026 को इससे संबंधित विधेयक पारित कर चुकी है।
केरल का नाम केरलम क्यों किया जा रहा है?
केरल का आधिकारिक नाम बदलकर 'केरलम' करने की मांग का आधार राज्य की मलयालम भाषाई पहचान है। केरल विधानसभा ने 24 जून 2024 को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र से राज्य का नाम ‘केरल’ से 'केरलम' करने का अनुरोध किया था। विधानसभा ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि मलयालम भाषा में राज्य का नाम ‘केरलम’ है।
इसके बाद 24 फरवरी 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केरल का नाम 'केरलम' करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। केंद्र सरकार के अनुसार, प्रस्ताव पर विधि मंत्रालय के संबंधित विभागों से भी सहमति ली गई थी। फिर 10 अगस्त को केरल का नाम बदलने संबंधी विधेयक लोकसभा में पेश किया गया और 11 अगस्त को लोकसभा ने इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया। अब विधेयक को राज्यसभा से पारित होना है। इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी होगी। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद केरल का नाम केरलम हो जाएगा।
पहले कब और कैसे बदले गए राज्यों के नाम?
1950: संयुक्त प्रांत से उत्तर प्रदेश
आजादी के बाद शुरुआती नाम परिवर्तनों में संयुक्त प्रांत का नाम उत्तर प्रदेश किया जाना शामिल है। ब्रिटिश शासन के दौरान इस क्षेत्र को संयुक्त प्रांत कहा जाता था। स्वतंत्र भारत की नई संवैधानिक व्यवस्था बनने के दौरान 24 जनवरी 1950 को संयुक्त प्रदेश का नाम बदलकर उत्तर प्रदेश कर दिया गया। यहां किसी नए राज्य का गठन नहीं हुआ था और न ही राज्य की सीमाओं में बड़ा बदलाव किया गया था। मौजूदा राज्य का सिर्फ आधिकारिक नाम बदला गया था।
1956: आंध्र राज्य से आंध्र प्रदेश
1956 में आंध्र राज्य का नाम बदलकर आंध्र प्रदेश किया गया। दरअसल, 1953 में मद्रास राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को अलग करके आंध्र राज्य बनाया गया था। इसके बाद 1956 में हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा आंध्र में शामिल किया गया। इसी पुनर्गठन के साथ आंध्र राज्य का नाम आंध्र प्रदेश हुआ। यह बदलाव 1 नवंबर 1956 से प्रभावी हुआ। लेकिन 1956 की कहानी सिर्फ आंध्र प्रदेश तक सीमित नहीं थी। इसी साल भारत के राज्यों का नक्शा बड़े पैमाने पर बदला। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 इसकी वजह बना।
राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 में आखिर क्या हुआ था?
राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 भारत के राज्यों के पुनर्गठन और उनकी सीमाओं में बदलाव के लिए बनाया गया था। यह अधिनियम 31 अगस्त 1956 को अधिनियमित हुआ था। इसके तहत 1 नवंबर 1956 को 'नियुक्त दिवस' रखा गया था, जिस दिन व्यापक पुनर्गठन प्रभावी हुआ।
इस कानून का उद्देश्य सिर्फ राज्यों के नाम बदलना नहीं था। इसके जरिए राज्यों की सीमाएं बदली गईं, कई क्षेत्रों को एक राज्य से दूसरे राज्य में शामिल किया गया, कुछ राज्यों का पुनर्गठन हुआ और नए प्रशासनिक ढांचे तैयार किए गए। 1956 का यह पुनर्गठन मुख्य रूप से भाषाई आधार के साथ प्रशासनिक और व्यावहारिक जरूरतों को ध्यान में रखकर राज्यों को व्यवस्थित करने की दिशा में बड़ा कदम था।
1956 में कौन-कौन से बड़े बदलाव हुए?
- आंध्र प्रदेश: हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा आंध्र में शामिल किया गया। इसके साथ आंध्र राज्य का नाम आंध्र प्रदेश किया गया।
- केरल: 1956 में त्रावणकोर-कोचीन के अधिकांश क्षेत्र और मद्रास राज्य के कुछ क्षेत्र मिलाकर केरल राज्य बनाया गया। आधिकारिक राज्य पुनर्गठन अधिनियम में केरल के गठन के लिए अलग प्रावधान किया गया था।
- मैसूर: 1956 में मैसूर राज्य का भी व्यापक पुनर्गठन हुआ। पुराने मैसूर के साथ बंबई, हैदराबाद, मद्रास और कुर्ग के कई कन्नड़ भाषी क्षेत्र इसमें शामिल किए गए। इससे मैसूर का क्षेत्र काफी बड़ा हो गया और बड़ी संख्या में कन्नड़ भाषी क्षेत्र एक प्रशासनिक इकाई में आ गए।
- बंबई: 1956 में बंबई राज्य का भी बड़ा विस्तार हुआ। इसमें पुराने बंबई के साथ हैदराबाद, मध्य प्रदेश, सौराष्ट्र और कच्छ के कई क्षेत्र शामिल किए गए। इस पुनर्गठन के बाद बंबई एक बड़ा और विविधतापूर्ण राज्य बन गया। हालांकि, बाद में भाषाई आधार पर बंबई राज्य का पुनर्गठन हुआ और 1960 में महाराष्ट्र और गुजरात अलग-अलग राज्य बने। यह नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि नए राज्यों के गठन का मामला था।
- मध्य प्रदेश: 1956 में मध्य प्रदेश का भी पुनर्गठन किया गया। पुराने मध्य प्रदेश के साथ मध्य भारत, भोपाल और विंध्य प्रदेश के क्षेत्र शामिल किए गए। इससे एक बड़ा मध्य प्रदेश अस्तित्व में आया और अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों को एक राज्य में शामिल किया गया।
- राजस्थान: राजस्थान में भी 1956 में क्षेत्रीय बदलाव हुए। अजमेर को राजस्थान में शामिल किया गया। इसके अलावा बंबई और मध्य भारत के कुछ क्षेत्र भी राजस्थान में शामिल किए गए।
- पंजाब: पंजाब में भी बड़ा बदलाव हुआ। पंजाब और पटियाला एवं पूर्वी पंजाब राज्य संघ के क्षेत्रों को मिलाकर नया पंजाब राज्य बनाया गया। इस तरह 1956 में पंजाब की प्रशासनिक संरचना भी बदल गई।
नाम बदलने का सिलसिला कैसे रहा जारी?
1969: मद्रास राज्य से तमिलनाडु
आजादी के बाद तमिलनाडु का आधिकारिक नाम मद्रास राज्य था। समय के साथ राज्य की पहचान को तमिल भाषा और क्षेत्रीय संस्कृति से जोड़ने की मांग मजबूत हुई। इसके बाद संसद ने मद्रास राज्य नाम परिवर्तन अधिनियम, 1968 पारित किया। इसके तहत 14 जनवरी 1969 से मद्रास राज्य का नाम तमिलनाडु हो गया।
1973: मैसूर राज्य से कर्नाटक
1956 में मैसूर राज्य का विस्तार हो चुका था और कई कन्नड़ भाषी क्षेत्र उसमें शामिल किए गए थे। लेकिन राज्य का नाम मैसूर ही रहा। बाद में राज्य की व्यापक कन्नड़ पहचान को देखते हुए नाम बदलने की मांग उठी। संसद ने मैसूर राज्य नाम परिवर्तन अधिनियम, 1973 पारित किया। इसके तहत 1 नवंबर 1973 से मैसूर राज्य का नाम कर्नाटक कर दिया गया।
2006: पॉन्डिचेरी से पुदुचेरी
राज्यों के अलावा एक केंद्रशासित प्रदेश का नाम भी बदला गया। संसद ने पॉन्डिचेरी (नाम-परिवर्तन) अधिनियम, 2006 पारित किया। इसके तहत 1 अक्तूबर 2006 से केंद्रशासित प्रदेश पॉन्डिचेरी का नाम पुदुचेरी कर दिया गया।
2007: उत्तरांचल से उत्तराखंड
उत्तराखंड का मामला भी दो अलग चरणों में समझना जरूरी है। 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर नया राज्य बना था और उसका नाम उत्तरांचल रखा गया था। इसके बाद राज्य के नाम को उत्तराखंड करने की मांग उठी। संसद ने उत्तरांचल नाम परिवर्तन अधिनियम, 2006 पारित किया। इसके तहत 1 जनवरी 2007 से उत्तरांचल का नाम उत्तराखंड कर दिया गया। यानी यहां पहले नया राज्य बना, फिर करीब छह साल बाद उसका नाम बदला गया।
2011: उड़ीसा से ओडिशा
उड़ीसा का नाम बदलकर ओडिशा करने की मांग राज्य की स्थानीय पहचान और नाम के प्रचलित रूप से जुड़ी थी। 28 अगस्त 2008 को उड़ीसा विधानसभा ने राज्य का नाम उड़ीसा से ओडिशा करने का प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद संवैधानिक प्रक्रिया के तहत मामला केंद्र तक गया।
संसद ने उड़ीसा नाम परिवर्तन अधिनियम, 2011 पारित किया। यह कानून 23 सितंबर 2011 को बना और 1 नवंबर 2011 से लागू हुआ। इसके बाद राज्य का आधिकारिक नाम उड़ीसा की जगह ओडिशा हो गया।
राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया क्या है?
किसी राज्य का नाम बदलना सिर्फ राज्य सरकार के प्रस्ताव से नहीं हो जाता। इसकी पूरी प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत होती है। इसी अनुच्छेद में संसद को किसी मौजूदा राज्य का नाम बदलने, उसकी सीमा या क्षेत्र बदलने और नया राज्य बनाने की शक्ति दी गई है।
1. सबसे पहले नाम बदलने का प्रस्ताव आता है
किसी राज्य के नाम को बदलने की मांग राज्य सरकार, विधानसभा या अन्य स्तर से उठ सकती है। लेकिन केवल विधानसभा में प्रस्ताव पारित हो जाने से राज्य का नाम आधिकारिक रूप से नहीं बदलता। केरल के मामले में भी यही हुआ। पहले केरल विधानसभा ने राज्य का नाम ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव पारित किया, इसके बाद मामला केंद्र सरकार के पास गया।
2. राष्ट्रपति की सिफारिश जरूरी
संविधान के अनुच्छेद 3 के मुताबिक राज्य के नाम, क्षेत्र या सीमा से संबंधित विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पेश नहीं किया जा सकता।
3. राज्य विधानसभा से राय मांगी जाती है
राष्ट्रपति की सिफारिश के बाद विधेयक संसद में पेश किया जा सकता है। अगर प्रस्ताव से किसी राज्य के नाम, क्षेत्र या सीमा पर असर पड़ता है, तो राष्ट्रपति उस विधेयक को संबंधित राज्य की विधानसभा के पास उसकी राय जानने के लिए भेजते हैं। विधानसभा को अपनी राय देने के लिए राष्ट्रपति की ओर से एक समय-सीमा दी जाती है। जरूरत पड़ने पर यह समय बढ़ाया भी जा सकता है।
4. विधानसभा की सहमति जरूरी है या सिर्फ राय?
यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। राज्य विधानसभा की राय लेना जरूरी है, लेकिन उसकी सहमति संसद के लिए बाध्यकारी नहीं है। यानी विधानसभा प्रस्ताव का समर्थन कर सकती है, विरोध कर सकती है या कोई दूसरी राय दे सकती है। इसके बावजूद संसद संवैधानिक प्रक्रिया के तहत विधेयक पर आगे बढ़ सकती है।
5. विधेयक संसद में आता है
राष्ट्रपति की सिफारिश के बाद विधेयक संसद में पेश किया जाता है। राज्य का नाम बदलने के लिए संसद कानून बनाती है। इसलिए अंतिम विधायी निर्णय संसद के पास होता है, न कि केवल राज्य सरकार या विधानसभा के पास।
6. लोकसभा और राज्यसभा से पारित होना
विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पारित होना होता है। दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है।
7. राष्ट्रपति की मंजूरी
संसद से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह अधिनियम यानी कानून बन जाता है।
8. कानून में तय तारीख से नया नाम लागू
नाम बदलने का कानून बनने के बाद भी जरूरी नहीं कि उसी दिन नया नाम लागू हो जाए। संबंधित कानून में प्रभावी होने की तारीख तय की जा सकती है या केंद्र सरकार को राजपत्र में अधिसूचना जारी करके तारीख तय करने का अधिकार दिया जा सकता है।