Khabaron Ke Khiladi: बंगाल में चुनाव, क्या इसलिए बाबरी का बवाल? विश्लेषकों ने बताया मस्जिद वाली सियासत का सच
बीते हफ्ते बाबरी मुद्दा बंगाल से यूपी तक चर्चा में रहा। मुर्शिदाबाद में विधायक हुमायूं कबीर ने नई मस्जिद निर्माण शुरू कराया, जबकि सीएम योगी ने बाबरी मस्जिद दोबारा न बनने की बात कही। इसी सियासत पर ‘खबरों के खिलाड़ी’ में विशेषज्ञों ने चर्चा की।
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बीते हफ्ते बाबरी का शोर बंगाल से उत्तर प्रदेश तक सुनाई दिया। एक तरफ पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में विधायक हुमायूं कबीर ने अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक नई मस्जिद का निर्माण शुरू कराया। वहीं, दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जो कयामत के दिन आने का सपना देख रहे है वह दिन आने वाला नहीं है। बाबरी मस्जिद अब कभी भी नहीं बनने वाली है। बाबरी पर चल रही इसी सियासत पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, पीयूष पंत, राकेश शुक्ल, अजय सेतिया और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
रामकृपाल सिंह: वोट के लिए कहा गया है कि साम, दाम, दंड भेद सब चलता है। यह विशुद्ध रूप से वोटबैंक की राजनीति है। इसके पीछे न तो किसी का बाबर से मोह है न ही किसी और से है। ये अपने वोटबैंक को सुनिश्चित करने की कोशिश है। इसमें धर्म कहीं भी नहीं है।
अजय सेतिया: हुमायूं कबीर ने खुद कहा है कि मेरा राजनीतिक कद बढ़ रहा है। इसलिए वो खुद मान रहे हैं कि मुद्दा राजनीतिक है इसका धर्म या बाबर से कोई मतलब नहीं है। ये दंगा फैलाने की भूमिका बांधी जा रही है। ये हिंदू और मुस्लिमों को लड़ाने की कोशिश की जा रही है।
अनुराग वर्मा: बाबर का नाम लाना और उस मस्जिद को बनाना यह बताने के लिए है कि हम किस सेंटिमेंट के साथ चुनाव में जा रहे हैं। मुस्लिमों का विश्वास पहले कांग्रेस से हटा, अब उनका विश्वास क्षेत्रीय पार्टियों से भी हट रहा है। अब उन्हें अपना नेता चाहिए। पश्चिम बंगाल में उसी का प्रयोग हो रहा है। वो चाहते हैं कि तनाव हो, जितना ज्यादा तनाव होगा उतना ज्यादा ध्रुवीकरण होगा।
पीयूष पंत: इस तरह के मुद्दे निश्चित रूप से मतदाताओं पर असर डालते हैं। कुछ समय पहले तक भले इसका असर नहीं पड़ता था। इसलिए हर पार्टी इस तरह की कोशिश कर रही है। हुमायूं कबीर पहले भाजपा में भी रहे हैं। बंगाल में भाजपा अब तक पैठ नहीं बना पाई है। मुझे लगता है कि यह एक रणनीति के तहत हो सकता है।
राकेश शुक्ल: मान्यता वाली मस्जिदों का एक अलग पैरामीटर है। हुमायूं कबीर एक इमारत का निर्माण कर रहे हैं। क्योंकि ये सिर्फ चुनावी गड्ढा है। तकनीकी और धार्मिक मान्याता के हिसाब से यह मस्जिद है ही नहीं। चुनाव के बाद इसका क्या होगा यह देखना होगा।