Controversy: 'आध्यात्मिक गुरुओं को न मानने वाले बदमाश', मंच से हाईकोर्ट के जस्टिस का बयान; छिड़ा नया विवाद
मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन के आध्यात्मिक कार्यक्रम में दिए बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने गुरुओं को न मानने वालों को बदमाश बताया। इससे पहले वे वेदों पर टिप्पणी और कार्तिगई दीपम मामले में दिए आदेश को लेकर भी चर्चा में रहे थे।
विस्तार
मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन एक बार फिर विवादों में घिर गए हैं। एक आध्यात्मिक कार्यक्रम में दिए गए उनके बयान ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में बहस छेड़ दी है। बताया गया है कि कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि जो लोग आध्यात्मिक गुरुओं को नहीं मानते, वे बदमाश, मूर्ख और निर्दयी हैं। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक दलों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।
जस्टिस स्वामीनाथन ने कार्यक्रम में कहा कि तमिलनाडु में कुछ लोग खुद को तर्कवादी बताते हैं और गुरुओं को मानने वालों को अपमानित करते हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग ऐसा कहते हैं, वही असली बदमाश और निर्दयी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास सेवा के चार साल और बचे हैं और अब वे खुलकर अपनी बात रखना चाहते हैं। उन्होंने कठिन समय में अपने गुरु से मिले मार्गदर्शन और साहस का भी जिक्र किया।
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वेदों पर बयान से भी उठा था विवाद
यह पहला मौका नहीं है जब जस्टिस स्वामीनाथन का बयान चर्चा में आया हो। इससे पहले उन्होंने कहा था कि यदि हम वेदों की रक्षा करेंगे तो वेद हमारी रक्षा करेंगे। इस बयान के बाद भी कुछ लोगों ने आरोप लगाया था कि वे संवैधानिक दायित्व से अधिक धार्मिक विचारों को प्राथमिकता दे रहे हैं। उस समय भी इस टिप्पणी को लेकर काफी बहस हुई थी।
कार्तिगई दीपम मामला क्या था?
1 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन ने तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति से जुड़ी याचिकाओं को स्वीकार किया था। यह स्थान एक दरगाह के पास स्थित दीपस्तंभ से जुड़ा है। जब आदेश का पालन नहीं हुआ तो 3 दिसंबर को उन्होंने श्रद्धालुओं को स्वयं दीप जलाने की अनुमति दी और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल को सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
तमिलनाडु सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। राज्य सरकार का कहना था कि कानून-व्यवस्था और संवेदनशीलता को देखते हुए फैसले पर पुनर्विचार जरूरी है। फिलहाल मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है। जस्टिस के हालिया बयान ने इस पूरे विवाद को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
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