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Maharashtra: 'पति-पत्नी दोनों कमा रहे तो खर्च भी दोनों उठाएं', बॉम्बे हाईकोर्ट ने बराबरी को लेकर क्या कहा?

Tue, 28 Jul 2026 05:54 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Tue, 28 Jul 2026 05:54 PM IST
सार

Bombay High Court: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि अगर पति और पत्नी दोनों कमाते हैं तो घर चलाने और बच्चे की पढ़ाई का खर्च दोनों को मिलकर उठाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि बराबरी का अधिकार चुनिंदा परिस्थितियों में नहीं लिया जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने एक पति को राहत देते हुए गुजारा भत्ते की राशि आधी कर दी। अदालत ने यह फैसला क्यों सुनाया? आइए, विस्तार से पूरे मामले को जानते हैं...

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Maharashtra Husband and Wife Must Share Household and Childs Education Expenses says Bombay High Court
बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

पति-पत्नी के अधिकार और जिम्मेदारियों को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि अगर पति और पत्नी दोनों कमाने वाले हैं तो घर चलाने और बच्चे की शिक्षा का खर्च दोनों को मिलकर उठाना चाहिए। कोर्ट ने साफ कहा कि बराबरी का दावा केवल सुविधा के समय नहीं किया जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बेटे के लिए तय 50 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता घटाकर 25 हजार रुपये कर दिया और पति को राहत दी।
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यह मामला एक ऐसे दंपति से जुड़ा था, जिनके बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है। फैमिली कोर्ट ने जनवरी 2025 में पति को पत्नी और बेटे के लिए हर महीने 50 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ पति ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उसकी आर्थिक स्थिति पहले जैसी नहीं रही है और यह राशि कम की जानी चाहिए। न्यायमूर्ति एम. एम. साठये की एकल पीठ ने पिछले सप्ताह दिए आदेश में फैमिली कोर्ट के फैसले में संशोधन करते हुए गुजारा भत्ता 25 हजार रुपये प्रति माह कर दिया।
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पति की आर्थिक स्थिति पर अदालत ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान पति ने अदालत को बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान उसकी नौकरी चली गई थी। अब वह पहले की तुलना में काफी कम वेतन पर काम कर रहा है और आर्थिक दबाव में है। अदालत ने माना कि कोविड-19 का असर कई लोगों की नौकरियों और कारोबार पर पड़ा था। इसलिए पति की आय कम होने का उसका पक्ष स्वीकार करने योग्य है। कोर्ट ने कहा कि उसकी कमाई में आई गिरावट का उचित कारण सामने रखा गया है।
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घर और ईएमआई को लेकर अदालत ने क्या टिप्पणी की?

  • अदालत ने पाया कि पति मुंबई के अंधेरी स्थित उस फ्लैट की ईएमआई चुका रहा है, जिसमें पत्नी और बेटा रह रहे हैं। इसके अलावा नवी मुंबई के पनवेल स्थित दूसरे मकान की ईएमआई भी वही भर रहा है, जबकि वह खुद बिहार में रह रहा है।
  • कोर्ट ने कहा कि पत्नी दोनों मकानों की ईएमआई में कोई योगदान नहीं दे रही है। पति ने पत्नी से बिहार में उसके साथ रहने या कम से कम पनवेल वाले घर में शिफ्ट होने का अनुरोध किया था, ताकि वह अंधेरी वाला मकान बेचकर अपना आर्थिक बोझ कम कर सके। लेकिन पत्नी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पति की इस मांग में कोई गलती नहीं है।

बराबरी और खर्च को लेकर अदालत ने क्या कहा?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पत्नी अंधेरी जैसे प्रीमियम इलाके में रहना चाहती है और उसकी ईएमआई में कोई योगदान नहीं करती, तो पति द्वारा गुजारा भत्ता कम करने की मांग को गलत नहीं कहा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि "बराबरी का दावा चुनिंदा तरीके से नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब दोनों पक्ष कमाने वाले हों।" कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों पति-पत्नी अच्छी जीवनशैली बनाए रखना चाहते हैं और अपने बच्चे को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं, तो दोनों को इन खर्चों में बराबर का योगदान देना चाहिए।
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