Godhra Kand: 21 साल पहले हुए गोधरा कांड की कहानी, ट्रेन में जिंदा फूंक दिए गए थे 59 कारसेवक, जानें सबकुछ
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विस्तार
गुजरात सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह गोधरा कांड के 11 दोषियों को मौत की सजा दिलाने के प्रयास करेगी। इसके बाद एक बार फिर से गोधरा कांड चर्चा में आ गया। सात दिन बाद गोधरा कांड को हुए 21 साल भी पूरे हो जाएंगे। आइये जानते हैं कि ये पूरा मामला है क्या? सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या कहा? गोधरा कांड में अब तक क्या-क्या हुआ?
पहले जानिए गुजरात सरकार ने कोर्ट में क्या-क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में गोधरा कांड के कई दोषियों की जमानत याचिका पर सोमवार को सुनवाई थी। इनमें से कई दोषियों को ट्रायल कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था। अब इन दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दायर कर रखी है। इनकी याचिका पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच सुनवाई कर रही है। बेंच ने दोषियों की जमानत पर सुनवाई के लिए तीन हफ्ते बाद का समय दिया है। कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों से इस दौरान एक चार्ट फाइल करने के निर्देश दिए हैं, जिसमें आरोपियों द्वारा जेल में बिताए गए समय और उन्हें दी गई सजा की जानकारी देने के निर्देश दिए हैं।
गुजरात सरकार की तरफ से कोर्ट में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दोषियों को लेकर बेंच को बताया कि हम गंभीर कोशिश करेंगे कि दोषियों को फांसी की सजा दी जाए। यह दुर्लभतम से दुर्लभ मामला है, जहां 59 लोगों को जिंदा जला दिया गया, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। रेल की बोगी को बाहर से बंद किया गया और उसमें आग लगा दी गई।
अब जानिए गोधरा कांड की पूरी कहानी
27 फरवरी 2002 की बात है। अयोध्या से करीब दो हजार कारसेवक अहमदाबाद जाने के लिए 26 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में सवार हुए। 27 फरवरी को ट्रेन गोधरा पहुंची तो S-6 बोगी में पथराव शुरू हो गया। बोगी को बाहर से बंद कर दिया गया और फिर उपद्रवियों ने आग लगा दी गई। आगजनी में 59 लोगों की मौत हो गई। इस मामले में 1500 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाए जाने की घटना के बाद पूरा गुजरात सुलग उठा। इसके अगले दिन यानी 28 फरवरी 2002 से गुजरात के अलग-अलग जगहों पर सांप्रदायिक दंगे फैल गए। इन दंगों में 1200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। गोधरा में ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (पोटा) लगाया गया। गुजरात सरकार ने कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया। पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) लगाई। लेकिन बाद में गोधरा कांड के आरोपियों से पोटा हटा लिया गया।
अब तक क्या-क्या हुआ?
18 फरवरी 2003 : दंगों के बाद गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए। दोबारा भाजपा सरकार चुनी गई और गोधरा रेल के आरोपियों के खिलाफ फिर से आतंकवाद निरोधक कानून लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा में ट्रेन जलाए जाने के मामले समेत दंगे से जुड़े सभी मामलों की न्यायिक सुनवाई पर रोक लगाई।
4 सितंबर 2004 : जब राजद नेता लालूप्रसाद यादव के रेलमंत्री थे, तब केद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश यूसी बनर्जी की अध्यक्षता वाली एक समिति गठित हुई। इस समिति को घटना के कुछ पहलुओं की जांच का काम दिया गया। नई गठित यूपीए सरकार ने पोटा कानून को खत्म कर दिया और आरोपियों के खिलाफ पोटा आरोपों की समीक्षा का फैसला किया।
17 जनवरी 2005 : यूसी बनर्जी समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट पेश की। इसमें बताया कि ट्रेन की एस-6 में लगी आग एक 'दुर्घटना' थी। समिति ने बाहरी तत्वों द्वारा आग की साजिश की आशंका खारिज कर दी। पोटा समीक्षा समिति ने राय दी कि आरोपियों पर पोटा के तहत आरोप नहीं लगाए जाएं।
तत्कालीन यूपीए सरकार ने दंगों की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया था। एसआईटी कोर्ट ने एक मार्च 2011 को गोधरा ट्रेन अग्निकांड मामले में 31 लोगों को दोषी पाया था और 63 को बरी कर दिया था। एसआईटी रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी।
13 अक्टूबर 2006 : गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि यूसी बनर्जी समिति का गठन 'अवैध' और 'असंवैधानिक' है। नानावती-शाह आयोग पहले ही दंगे के हर पहलू की जांच कर रहा है। बनर्जी समिति की जांच रिपोर्ट भी अमान्य करार दे दी गई। सजा को चुनौती देते हुए कई याचिका लगाई गई। गोधरा ट्रेन अग्निकांड मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए गोधरा दंगा मामले में 11 दोषियों की सजा फांसी से उम्रकैद में बदली।
एक मई 2009 : सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा मामले की सुनवाई से प्रतिबंध हटाया। सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता वाले विशेष जांच दल ने गोधरा कांड व दंगों से जुड़े आठ अन्य मामलों की जांच शुरू की। गोधरा कांड की सुनवाई अहमदाबाद के साबरमती केंद्रीय जेल के अंदर ही शुरू हुई। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई अदालत को गोधरा कांड समेत गुजरात दंगों से जुड़े नौ अन्य संवेदनशील मामलों में फैसला सुनाने से रोका।
18 सितंबर 2008 : नानावती आयोग ने गोधरा कांड की जांच सौंपी। इसमें कहा कि यह पूर्व नियोजित षड्यंत्र था और एस-6 कोच को भीड़ ने पेट्रोल डालकर जलाया। गुजरात दंगे और उस पर की गई कार्रवाई पर न्यायमूर्ति नानावती-मेहता आयोग की रिपोर्ट का पहला हिस्सा 25 सितंबर 2009 को विधानसभा में पेश किया गया था।
28 सितंबर 2010 : मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में पूरी हुई, लेकिन शीर्ष अदालत की रोक के कारण फैसला नहीं सुनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाए जाने से रोक हटाई। विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया, वहीं 63 अन्य को बरी किया गया।
एक मार्च 2011 : विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 11 को फांसी और 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई। ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। जहां से हाईकोर्ट ने 11 आरोपियों की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दोषियों को मौत की सजा देने की अपील की है। सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा कांड के दो दोषियों को जमानत दे दी है। सात और जमानत याचिकाएं अभी लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल गोधरा कांड के दोषी फारुख को उम्रकैद की सजा मिलने के 17 साल बाद जमानत दी थी।
18 नवंबर 2014 : रिटायर्ड जस्टिस नानावटी और जस्टिस मेहता ने 2014 में यह रिपोर्ट तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को सौंप दी थी। तब से यह रिपोर्ट गुजरात सरकार के पास ही थी।