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'आयोजकों की जवाबदेही तय हो': छात्रों के विरोध प्रदर्शन मामले में शीर्ष कोर्ट में याचिका दाखिल; कब होगी सुनवाई?
Mon, 03 Aug 2026 12:13 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 03 Aug 2026 12:13 PM IST
सार
छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष कोर्ट इसको लेकर दायर एक याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है। याचिका में क्या दलीलें दी गई हैं और सुनवाई कब-कब होगी, पढ़िए रिपोर्ट-
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 20 जुलाई के 'संसद चलो' छात्र प्रदर्शन के आयोजकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन के आयोजकों ने हिंसा के लिए उकसाया।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के खिलाफ अभद्र सामग्री पोस्ट करने वाले नाबालिगों को आपराधिक कार्रवाई का सामना कराने के बजाय सामुदायिक सेवा कराई जाए।
वकील ने कोर्ट में कहा कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के आयोजक सरकार की प्रतिक्रिया के बाद भी भड़काऊ बयान देना जारी रख रहे हैं।
वकील ने कोर्ट से कहा, सरकार ने काफी उदार रुख अपनाया है, फिर भी आयोजक आग को भड़का रहे हैं। आयोजक गैर-जिम्मेदाराना बयान दे रहे हैं और समाज में कटुता पैदा कर रहे हैं। आयोजकों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
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ये भी पढ़ें: कुणाल कामरा ने रद्द किए स्टैंड-अप शो, हिंदुत्ववादी संगठनों ने किया था विरोध; क्या है मामला?
एफआईआर को लेकर क्या मांग की गई?
याचिका में 20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद दर्ज प्राथमिकियों और गिरफ्तारियों को लेकर एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ता के अनुसार, अलग-अलग राज्यों ने प्राथमिकी वापस लेने को लेकर अलग-अलग तरीके अपनाए हैं, जिससे भ्रम और लोगों में असंतोष पैदा हो रहा है।
वकील ने कहा, अलग-अलग राज्य गिरफ्तारी और प्राथमिकी को लेकर अलग-अलग अधिसूचनाएं जारी कर रहे हैं। यह एक राष्ट्रीय मुद्दा है। यहां एक समान नीति बनाई जानी चाहिए। इन अधिसूचनाओं से देश के शांतिप्रिय नागरिकों के मन में असंतोष पैदा हो रहा है।
नाबालिगों पर कार्रवाई को लेकर क्या कहा गया?
याचिका में सोशल मीडिया पर अभद्र वीडियो पोस्ट करने वाले नाबालिगों और युवाओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का मुद्दा भी उठाया गया है। वकील ने कहा कि ऐसा व्यवहार सुधार की जरूरत वाला है, लेकिन आपराधिक कार्रवाई इसका सही समाधान नहीं है।
वकील ने कहा, दुर्भाग्य से कुछ युवा लड़के और लड़कियां बेहद अपमानजनक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसके लिए उनके खिलाफ प्राथमिकियां दर्ज की जा रही हैं। वे वीडियो बना रहे हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं। यह एक बदसूरत जंग का मैदान बनता जा रहा है।
सामुदायिक सेवा कराने की मांग
उन्होंने कोर्ट से ऐसी एक समान नीति बनाने की अपील की, जिसके तहत इन नाबालिगों को आपराधिक कार्रवाई का सामना कराने के बजाय कम से कम सात दिन तक सामुदायिक सेवा करनी पड़े।
वकील ने कहा, एक समान नीति होनी चाहिए, जिसके तहत उन्हें कम से कम 7 दिन के लिए सामुदायिक सेवा के लिए भेजा जाए और फिर छोड़ दिया जाए। लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं होनी चाहिए। इससे समाज में और ज्यादा कटुता पैदा होगी। यही इस मामले की तात्कालिक जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुनवाई के लिए कल या उसके अगले दिन सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है।
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याचिका में यह भी मांग की गई है कि सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के खिलाफ अभद्र सामग्री पोस्ट करने वाले नाबालिगों को आपराधिक कार्रवाई का सामना कराने के बजाय सामुदायिक सेवा कराई जाए।
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वकील ने कोर्ट में कहा कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के आयोजक सरकार की प्रतिक्रिया के बाद भी भड़काऊ बयान देना जारी रख रहे हैं।
वकील ने कोर्ट से कहा, सरकार ने काफी उदार रुख अपनाया है, फिर भी आयोजक आग को भड़का रहे हैं। आयोजक गैर-जिम्मेदाराना बयान दे रहे हैं और समाज में कटुता पैदा कर रहे हैं। आयोजकों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
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एफआईआर को लेकर क्या मांग की गई?
याचिका में 20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद दर्ज प्राथमिकियों और गिरफ्तारियों को लेकर एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ता के अनुसार, अलग-अलग राज्यों ने प्राथमिकी वापस लेने को लेकर अलग-अलग तरीके अपनाए हैं, जिससे भ्रम और लोगों में असंतोष पैदा हो रहा है।
वकील ने कहा, अलग-अलग राज्य गिरफ्तारी और प्राथमिकी को लेकर अलग-अलग अधिसूचनाएं जारी कर रहे हैं। यह एक राष्ट्रीय मुद्दा है। यहां एक समान नीति बनाई जानी चाहिए। इन अधिसूचनाओं से देश के शांतिप्रिय नागरिकों के मन में असंतोष पैदा हो रहा है।
नाबालिगों पर कार्रवाई को लेकर क्या कहा गया?
याचिका में सोशल मीडिया पर अभद्र वीडियो पोस्ट करने वाले नाबालिगों और युवाओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का मुद्दा भी उठाया गया है। वकील ने कहा कि ऐसा व्यवहार सुधार की जरूरत वाला है, लेकिन आपराधिक कार्रवाई इसका सही समाधान नहीं है।
वकील ने कहा, दुर्भाग्य से कुछ युवा लड़के और लड़कियां बेहद अपमानजनक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसके लिए उनके खिलाफ प्राथमिकियां दर्ज की जा रही हैं। वे वीडियो बना रहे हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं। यह एक बदसूरत जंग का मैदान बनता जा रहा है।
सामुदायिक सेवा कराने की मांग
उन्होंने कोर्ट से ऐसी एक समान नीति बनाने की अपील की, जिसके तहत इन नाबालिगों को आपराधिक कार्रवाई का सामना कराने के बजाय कम से कम सात दिन तक सामुदायिक सेवा करनी पड़े।
वकील ने कहा, एक समान नीति होनी चाहिए, जिसके तहत उन्हें कम से कम 7 दिन के लिए सामुदायिक सेवा के लिए भेजा जाए और फिर छोड़ दिया जाए। लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं होनी चाहिए। इससे समाज में और ज्यादा कटुता पैदा होगी। यही इस मामले की तात्कालिक जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुनवाई के लिए कल या उसके अगले दिन सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है।