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'फॉर्म 6 में संशाेधन किसने किया'?: सीईसी के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी करने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, दिया नोटिस
Mon, 05 Oct 2026 01:25 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 05 Oct 2026 01:25 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने आज मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुकदमे की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की बातों को ध्यान से सुनने के बाद चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हालांकि कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ किसी भी तरह का अंतरिम आदेश नहीं जारी किया।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
चुनाव आयोग के फैसलों और कामकाज के तरीके को लेकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अंतरिम रूप से पद से हटाने या उनके कामकाज पर रोक लगाने की मांग पर तत्काल कोई आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। बता दें कि याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने निर्वाचन आयोग के दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना कई फैसले एकतरफा लिए।
सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले में चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। कोर्ट अब निर्वाचन आयोग की ओर से पेश किए जाने वाले जवाब और संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर आरोपों की जांच करेगा। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि आयोग के जवाब से यह सामने आता है कि ऐसे फैसले लिए गए थे, जिनके लिए आवश्यक सर्वसम्मति नहीं थी, तो कोर्ट उन फैसलों को वापस लेने या रद्द करने पर विचार कर सकता है। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नोटिस के बाद, अगर वे आकर दिखाते हैं कि ABC फैसले बिना सर्वसम्मति के लिए गए थे, तो हम उन फैसलों को वापस ले लेंगे। बता दें कि चुनाव आयोग ने दावा किया था कि SIR प्रक्रिया के लिए ऑनलाइन 'फॉर्म 6' के साथ जोड़े गए नए बदलाव को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी थी। लेकिन आज CJI सूर्य कांत ने साफ कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR के दौरान वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 के किसी भी बदले हुए रूप को मंजूरी नहीं दी है।
सीईसी के खिलाफ कोई अंतरिम कार्रवाई नहीं
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त पर निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया में निर्धारित सामूहिक व्यवस्था का पालन नहीं करने का आरोप लगाया गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीईसी के खिलाफ कोई अंतरिम कार्रवाई नहीं की है और पहले निर्वाचन आयोग का पक्ष जानने का फैसला किया है। अब मामले की अगली सुनवाई में चुनाव आयोग के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि जिन फैसलों को लेकर सवाल उठाए गए हैं, वे आयोग के निर्धारित नियमों और निर्णय प्रक्रिया के अनुरूप लिए गए थे या नहीं।
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सीईसी को निलंबित करने समेत कितनी मांगें?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने राकेश कुमार सिंह और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिकाओं पर सुनवाई किया। राकेश कुमार सिंह ने मांग की है कि अंतिम सुनवाई तक ज्ञानेश कुमार CEC के कार्य न करें और आयोग का काम दोनों अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सर्वसम्मत राय से चले। शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका में CEC और अन्य अधिकारियों के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन को लेकर आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की मांग भी की गई है। याचिका में 2023 के कानून की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा गया है कि आयोग में मतभेद होने पर बहुमत का फैसला लागू होता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर कितने गंभीर आरोप?
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने ऐसे अधिकारों का व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल किया, जो कानून के मुताबिक पूरे चुनाव आयोग के हैं। याचिका में ऐसे फैसलों, दिशानिर्देशों और सॉफ्टवेयर बदलावों को चुनौती दी गई है, जिन्हें कथित तौर पर दोनों अन्य आयुक्तों की सहमति के बिना किया गया।
क्या SIR को लेकर भी विवाद?
याचिका में चुनावी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसलों का भी उल्लेख है। एक अखबारक की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा कि किसी संस्था में विचारों और टिप्पणियों में अंतर सामान्य है और उसके सभी आदेश कानूनी रूप से वैध हैं।
फॉर्म-6 में बदलाव भी सवालों के घेरे में क्यों?
याचिका में आरोप है कि मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में पूर्वजों की जानकारी और पिछले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से लिंक जैसी शर्तें सॉफ्टवेयर के जरिए जोड़ी गईं। याचिकाकर्ता का दावा है कि इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
ये भी पढ़ें: सीईसी, एसआईआर और बैलेट पेपर: कांग्रेस अध्यक्ष ने याद दिलाईं तीन शर्तें, सरकार से कहा- इससे कम पर समझौता नहीं
गोवा और पश्चिम बंगाल के मामलों का जिक्र क्यों?
याचिका में गोवा और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए हैं। गोवा में 97 पात्र मतदाताओं को बहाल करने के निर्देश के बावजूद सॉफ्टवेयर में उन्हें बहाल करने की सुविधा नहीं होने का आरोप लगाया गया। पश्चिम बंगाल में 16.10 लाख से अधिक अपीलों का भी जिक्र है।
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सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले में चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। कोर्ट अब निर्वाचन आयोग की ओर से पेश किए जाने वाले जवाब और संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर आरोपों की जांच करेगा। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि आयोग के जवाब से यह सामने आता है कि ऐसे फैसले लिए गए थे, जिनके लिए आवश्यक सर्वसम्मति नहीं थी, तो कोर्ट उन फैसलों को वापस लेने या रद्द करने पर विचार कर सकता है। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नोटिस के बाद, अगर वे आकर दिखाते हैं कि ABC फैसले बिना सर्वसम्मति के लिए गए थे, तो हम उन फैसलों को वापस ले लेंगे। बता दें कि चुनाव आयोग ने दावा किया था कि SIR प्रक्रिया के लिए ऑनलाइन 'फॉर्म 6' के साथ जोड़े गए नए बदलाव को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी थी। लेकिन आज CJI सूर्य कांत ने साफ कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR के दौरान वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 के किसी भी बदले हुए रूप को मंजूरी नहीं दी है।
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सीईसी के खिलाफ कोई अंतरिम कार्रवाई नहीं
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त पर निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया में निर्धारित सामूहिक व्यवस्था का पालन नहीं करने का आरोप लगाया गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीईसी के खिलाफ कोई अंतरिम कार्रवाई नहीं की है और पहले निर्वाचन आयोग का पक्ष जानने का फैसला किया है। अब मामले की अगली सुनवाई में चुनाव आयोग के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि जिन फैसलों को लेकर सवाल उठाए गए हैं, वे आयोग के निर्धारित नियमों और निर्णय प्रक्रिया के अनुरूप लिए गए थे या नहीं।
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सीईसी को निलंबित करने समेत कितनी मांगें?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने राकेश कुमार सिंह और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिकाओं पर सुनवाई किया। राकेश कुमार सिंह ने मांग की है कि अंतिम सुनवाई तक ज्ञानेश कुमार CEC के कार्य न करें और आयोग का काम दोनों अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सर्वसम्मत राय से चले। शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका में CEC और अन्य अधिकारियों के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन को लेकर आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की मांग भी की गई है। याचिका में 2023 के कानून की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा गया है कि आयोग में मतभेद होने पर बहुमत का फैसला लागू होता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर कितने गंभीर आरोप?
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने ऐसे अधिकारों का व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल किया, जो कानून के मुताबिक पूरे चुनाव आयोग के हैं। याचिका में ऐसे फैसलों, दिशानिर्देशों और सॉफ्टवेयर बदलावों को चुनौती दी गई है, जिन्हें कथित तौर पर दोनों अन्य आयुक्तों की सहमति के बिना किया गया।
क्या SIR को लेकर भी विवाद?
याचिका में चुनावी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसलों का भी उल्लेख है। एक अखबारक की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा कि किसी संस्था में विचारों और टिप्पणियों में अंतर सामान्य है और उसके सभी आदेश कानूनी रूप से वैध हैं।
फॉर्म-6 में बदलाव भी सवालों के घेरे में क्यों?
याचिका में आरोप है कि मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में पूर्वजों की जानकारी और पिछले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से लिंक जैसी शर्तें सॉफ्टवेयर के जरिए जोड़ी गईं। याचिकाकर्ता का दावा है कि इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
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गोवा और पश्चिम बंगाल के मामलों का जिक्र क्यों?
याचिका में गोवा और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए हैं। गोवा में 97 पात्र मतदाताओं को बहाल करने के निर्देश के बावजूद सॉफ्टवेयर में उन्हें बहाल करने की सुविधा नहीं होने का आरोप लगाया गया। पश्चिम बंगाल में 16.10 लाख से अधिक अपीलों का भी जिक्र है।