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दलबदल कानून: 10वीं अनुसूची पर कपिल सिब्बल की याचिका, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को भेजा नोटिस; क्या-क्या कहा?

Mon, 27 Jul 2026 03:03 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Mon, 27 Jul 2026 03:03 PM IST
सार

दलबदल कानून से बचने के लिए राजनीतिक दलों के विलय के नियम को कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया है। जानिए इस मामले में सिब्बल ने क्या सवाल उठाए?

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supreme court notice to union on govt kapil sibal 10th schedule defection law plea
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की 10वीं अनुसूची की व्याख्या को चुनौती देने वाली वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। इस व्याख्या के तहत किसी राजनीतिक दल में विलय का रास्ता अपनाकर विधायक दलबदल कानून के तहत अयोग्य घोषित होने से बच सकते हैं। कपिल सिब्बल ने यह याचिका खुद पक्षकार बनकर दायर की है।
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जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सिब्बल की दलीलें सुनने के बाद नोटिस जारी किया।

सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस नरसिम्हा ने पूछा कि इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका क्यों दायर की गई है। सिब्बल ने कहा कि विलय की वजह से देश की राजनीति पर बड़ा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया से चुनाव में मिले बहुमत का फैसला अल्पमत में बदला जा सकता है।
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उन्होंने गोवा मामले का भी जिक्र किया, जो अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सिब्बल ने कहा, इस प्रक्रिया से चुनाव का फैसला बदला जा सकता है। बहुमत अल्पमत में बदल सकता है और अल्पमत बहुमत बन सकता है। 

जज ने क्या कहा?
  • नोटिस जारी करने के बावजूद जस्टिस नरसिम्हा ने इस मामले से कुछ दूरी बनाई। उन्होंने कहा, ऐसे मुद्दों का फैसला आमतौर पर विधायकों को करना चाहिए।
  • उन्होंने कहा, ये ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें आमतौर पर सदन के अंदर उठाया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो तो कम से कम राजनीतिक दलों के सामने उठाया जाना चाहिए।
  • जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि 10वीं अनुसूची का मकसद विधायकों के बीच इस व्यवस्था को नियंत्रित करना है।
  • उन्होंने कहा कि 10वीं अनुसूची के कामकाज को लेकर पहले से ही कई बड़े सवाल सामने आते रहे हैं।
  • सिब्बल ने जवाब दिया कि सत्ता में बैठे लोग कभी भी इस मामले का फैसला नहीं होने देंगे।

कपिल सिब्बल ने क्या चुनौती दी है?
अपनी याचिका में सिब्बल ने 10वीं अनुसूची में राजनीतिक दलों के विलय से जुड़े प्रावधानों की सांविधानिक व्याख्या पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्याख्या की वजह से छोटे गुट दूसरे राजनीतिक दलों के साथ विलय करके दलबदल कानून की सख्ती से बच निकलते हैं।

सिब्बल ने कहा कि इस तरह के कई मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने बताया कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की ओर से दायर याचिका भी जस्टिस नरसिम्हा की पीठ के सामने लंबित है। इस याचिका में लोकसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें शिवसेना के कुछ सांसदों के शिंदे गुट वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दी गई थी। 

कई दलों के नेताओं के विलय का मामला
हाल के दिनों में आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना यूबीटी से जुड़े कई विधायक भाजपा और दूसरे दलों में शामिल हुए हैं। वहीं, कांग्रेस की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लंबित है।

इसमें बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया था कि किसी राजनीतिक दल की मंजूरी के बिना भी उसका विधायक दल किसी दूसरे दल में विलय कर सकता है।
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