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असम की सरकारी स्कीम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: शिक्षकों की नियुक्ति पर रोक, भर्ती प्रक्रिया पर क्यों उठे सवाल?

Tue, 08 Sep 2026 12:42 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: अस्मिता त्रिपाठी Updated Tue, 08 Sep 2026 12:42 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार की एक सरकारी योजना के तहत स्कूल-कॉलेजों में शिक्षकों की नई नियुक्ति या शामिल करने से रोक दिया है। याचिका में योजना को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई थी।

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Supreme Court  on Assam government scheme Teacher appointments halted why questions raised recruitment process
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को असम सरकार और उसके शिक्षा विभागों को निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि वे राज्य में सरकारी स्कीम (प्रोविंशियलाइजेशन) स्कीम के तहत स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति या उन्हें शामिल न करें।

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क्या है पूरा मामला? 
वेंचर शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों और कर्मचारियों को सरकारी सेवा में शामिल करने की कानूनी योजना के तहत, राज्य सरकार तय वेतन और ग्रेच्युटी, पेंशन व छुट्टी के बदले नकद भुगतान (लीव एनकैशमेंट) की देनदारियों को अपने ऊपर ले लेती है। ये भुगतान राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए लागू मौजूदा नियमों के अनुसार किए जाते हैं।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की पीठ ने जनहित याचिका के याचिकाकर्ताओं राजेश चौहान और माधव मुकुंद पुजारी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार की दलीलों पर ध्यान दिया।
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इसे क्यों दी गई चुनौती? 
जनहित याचिका में प्रांतीयकरण ( प्रोविंशियलाइजेशन) ढांचे को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह कथित तौर पर निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के बिना सरकारी सेवाओं में प्रवेश की अनुमति देता है।

याचिकाकर्ताओं ने क्या तर्क दिया? 
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि इस तरह का तंत्र असंवैधानिक है। संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करता है, जो सार्वजनिक रोजगार के मामलों में कानून के समक्ष समानता और अवसर की समानता की गारंटी देते हैं।

किस अधिनियम को दी गई है चुनौती? 
याचिका में खास रूप से असम शिक्षा (शिक्षकों की सेवाओं का प्रांतीयकरण और शैक्षणिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम, 2017 के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जिनमें कथित तौर पर ऐसे व्यक्तियों के प्रांतीयकरण की अनुमति दी गई है, जिनके पास संसदीय अधिनियमों और शिक्षक पात्रता को नियंत्रित करने वाले वैधानिक नियमों और विनियमों के तहत निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं नहीं हैं।

शिक्षकों से संबंधित क्या चुनौती दी गई? 
इसने शिक्षकों के प्रांतीयकरण से संबंधित प्रावधानों को भी चुनौती दी। यह तर्क देते हुए कि जिन व्यक्तियों के पास लागू कानूनों के तहत निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं नहीं हैं। उन्हें सरकारी और प्रांतीयकृत शैक्षणिक संस्थानों में कक्षा शिक्षण प्रदान करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

क्या मांग की गई है? 

  • असम सरकार को असम वेंचर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (प्रोविंशियलाइजेशन ऑफ सर्विसेज) एक्ट, 2011 और 2017 एक्ट के तहत प्रांतीयकृत सभी व्यक्तियों की व्यापक समीक्षा करने के निर्देश देने की मांग।

  •  प्रस्तावित समीक्षा केवल इस बात की पुष्टि तक सीमित होनी चाहिए कि क्या ऐसे व्यक्तियों के पास लागू संसदीय अधिनियमों और वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित योग्यताएं हैं।

  • अधिकारियों को उन व्यक्तियों को सरकारी या प्रांतीयकृत शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाने की अनुमति देने से रोका जाए जिनके पास निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं नहीं हैं।

  • इसने राज्य और अन्य संस्थाओं को प्रांतीयकरण की प्रक्रिया के माध्यम से शिक्षकों की किसी भी नई नियुक्ति को शुरू करने या अनुमति देने से रोकने के लिए एक आदेश की भी मांग की है।

  • सरकारी शिक्षण पदों पर भविष्य में होने वाली सभी नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 तथा शिक्षक योग्यता को नियंत्रित करने वाले वैधानिक ढांचे के अनुरूप निष्पक्ष, पारदर्शी, योग्यता-आधारित और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से ही की जाएं।

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