{"_id":"6a1d992143a54780a004639a","slug":"supreme-court-pension-rights-temporary-employees-postal-department-equal-benefits-social-security-verdict-2026-06-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"पटना हाईकोर्ट का आदेश रद्द: डाक विभाग के अस्थायी कर्मचारियों के पक्ष में सुप्रीम फैसला; समान काम पर समान लाभ","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
पटना हाईकोर्ट का आदेश रद्द: डाक विभाग के अस्थायी कर्मचारियों के पक्ष में सुप्रीम फैसला; समान काम पर समान लाभ
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Mon, 01 Jun 2026 08:07 PM IST
विज्ञापन
सार
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि सरकार समान काम करने वाले अस्थायी और स्थायी कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं कर सकती। मामले में अदालत ने डाक विभाग के पूर्व कैजुअल कर्मचारियों को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ देने का आदेश देते हुए सामाजिक सुरक्षा को कर्मचारियों का संवैधानिक अधिकार बताया है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकार अपने कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं कर सकती। कोर्ट ने साफ किया कि अगर अस्थायी कर्मचारी भी स्थायी कर्मचारियों की तरह ही काम कर रहे हैं, तो उन्हें मिलने वाले लाभों से वंचित रखना गलत है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने पटना हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें डाक विभाग में दशकों तक सेवा देने वाले अस्थायी कर्मचारियों को पेंशन देने से मना कर दिया गया था।
अदालत ने कहा कि कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के मामले में समान होने के बावजूद किसी एक वर्ग को लाभ न देना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारी, चाहे वे कैजुअल हों या अस्थायी, उन्हें सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसे लाभों से दूर नहीं रखा जा सकता। बेंच ने कहा कि सरकार कर्मचारियों को अनिश्चित स्थिति में रखकर उनसे स्थायी कर्मचारियों जैसा काम नहीं ले सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह डाक विभाग में कैजुअल लेबर (नाइट गार्ड) के रूप में काम करने वाले पूर्व कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों को तीन महीने के भीतर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ जारी करे। यदि इसमें देरी होती है, तो सरकार को छह प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज भी देना होगा। कोर्ट ने पाया कि इन कर्मचारियों को अस्थायी दर्जा तो मिला था और उन्हें ग्रुप डी के समान लाभ भी दिए जा रहे थे, लेकिन प्रशासनिक ढिलाई की वजह से इन्हें कभी औपचारिक रूप से स्थायी नहीं किया गया।
विज्ञापन
अदालत ने राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 38, 39 और 43) का हवाला देते हुए कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह मजदूरों के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करे। पेंशन कोई खैरात या इनाम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक कल्याण और आर्थिक न्याय का एक हिस्सा है। कोर्ट ने 2013 के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि पेंशन एक अर्जित लाभ है जो कर्मचारी की लंबी सेवा के बदले मिलता है। यह संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति की तरह है और इसे कानून के बिना नहीं छीना जा सकता।
ये भी पढ़ें: अमेरिका में ठुकराई कई नौकरियां: छह जून को भारत आ रहे सीजेपी के संस्थापक, जंतर-मंतर पर करेंगे धरना प्रदर्शन
कोर्ट ने 1991 की एक योजना का भी जिक्र किया, जिसे कैजुअल लेबरर्स को मुख्य सेवा में शामिल करने के लिए बनाया गया था। इस योजना के तहत उन्हें ग्रुप डी कर्मचारियों के समान वेतन और भत्ते देने का प्रावधान था। कोर्ट ने कहा कि इस योजना का मकसद ही इन कर्मचारियों को धीरे-धीरे नियमित करना था। प्रशासनिक निष्क्रियता की वजह से किसी कर्मचारी के संवैधानिक अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के मामले में समान होने के बावजूद किसी एक वर्ग को लाभ न देना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारी, चाहे वे कैजुअल हों या अस्थायी, उन्हें सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसे लाभों से दूर नहीं रखा जा सकता। बेंच ने कहा कि सरकार कर्मचारियों को अनिश्चित स्थिति में रखकर उनसे स्थायी कर्मचारियों जैसा काम नहीं ले सकती।
विज्ञापन
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह डाक विभाग में कैजुअल लेबर (नाइट गार्ड) के रूप में काम करने वाले पूर्व कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों को तीन महीने के भीतर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ जारी करे। यदि इसमें देरी होती है, तो सरकार को छह प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज भी देना होगा। कोर्ट ने पाया कि इन कर्मचारियों को अस्थायी दर्जा तो मिला था और उन्हें ग्रुप डी के समान लाभ भी दिए जा रहे थे, लेकिन प्रशासनिक ढिलाई की वजह से इन्हें कभी औपचारिक रूप से स्थायी नहीं किया गया।
अदालत ने राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 38, 39 और 43) का हवाला देते हुए कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह मजदूरों के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करे। पेंशन कोई खैरात या इनाम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक कल्याण और आर्थिक न्याय का एक हिस्सा है। कोर्ट ने 2013 के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि पेंशन एक अर्जित लाभ है जो कर्मचारी की लंबी सेवा के बदले मिलता है। यह संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति की तरह है और इसे कानून के बिना नहीं छीना जा सकता।
ये भी पढ़ें: अमेरिका में ठुकराई कई नौकरियां: छह जून को भारत आ रहे सीजेपी के संस्थापक, जंतर-मंतर पर करेंगे धरना प्रदर्शन
कोर्ट ने 1991 की एक योजना का भी जिक्र किया, जिसे कैजुअल लेबरर्स को मुख्य सेवा में शामिल करने के लिए बनाया गया था। इस योजना के तहत उन्हें ग्रुप डी कर्मचारियों के समान वेतन और भत्ते देने का प्रावधान था। कोर्ट ने कहा कि इस योजना का मकसद ही इन कर्मचारियों को धीरे-धीरे नियमित करना था। प्रशासनिक निष्क्रियता की वजह से किसी कर्मचारी के संवैधानिक अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता।