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धर्मांतरण पर 'जाति' से जुड़े फायदे नहीं?: क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला; किस पर होगा लागू; किन पर असर नहीं?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Tue, 24 Mar 2026 03:46 PM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने ने एक अहम फैसले में कहा है कि धर्मांतरण करने वाला व्यक्ति एससी-एसटी कानून के प्रावधानों का पात्र नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा है। आइए जानते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और पहले कब-कब अदालतों ने ऐसे ही फैसले सुनाए हैं...

Supreme Court Religious Conversion Schedule Caste Benefits SC ST Act Reservation Andhra Pradesh High Court
सुप्रीम कोर्ट का धर्म परिवर्तन से जुड़े एक मामले में अहम फैसला। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (24 मार्च) को एक अहम फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें उच्च न्यायालय ने ईसाई धर्म और उसकी प्रथाओं को अपनाने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के लाभ देने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई भी व्यक्ति जो कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म का पालन नहीं करता, वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं कहा जा सकता। इन धर्मों से इतर किसी और धर्म में जाने से उसका अनुसूचित जाति का वर्गीकरण तुरंत और पूरी तरह खत्म हो जाता है। 
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सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कई सवाल हैं? मसलन क्या जो व्यक्ति धर्म परिवर्तन करवा लेता है, वह आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता? किन लोगों को धर्म परिवर्तन के बाद भी रिजर्वेशन का लाभ मिल सकता है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- क्या है वह मामला, जिस पर न्यायलय में हुई बहस?

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जिस मामले में फैसला सुनाया है, वह आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है। दरअसल, पिछले साल आंध्र हाईकोर्ट में एक ईसाई पादरी की ओर से एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज कराए गए केस की वैधता पर सुनवाई हुई थी। इस मामले में अप्रैल 2025 में फैसला आया था। 

क्या था मामला?

चिंतादा आनंद पॉल नाम का एक व्यक्ति, जो 10 वर्षों से एक चर्च में पादरी के रूप में जुड़ा था, ने कुछ लोगों पर मारपीट करने और जातिसूचक गालियां देने का आरोप लगाते हुए एससी-एसटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई थी और आपराधिक कार्रवाई की मांग की थी। यह मामला बाद में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंच गया। 

कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

30 अप्रैल 2025 को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस हरिनाथ एन. ने कहा कि ईसाई धर्म में जाति-व्यवस्था का कोई अस्तित्व नहीं है। अदालत ने फैसला सुनाया कि जैसे ही कोई व्यक्ति ईसाई धर्म में परिवर्तित होता है, उसी दिन वह अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय का सदस्य नहीं रह जाता। इसलिए, वह व्यक्ति एससी-एसटी एक्ट जैसे संरक्षण वाले कानून का सहारा नहीं ले सकता। इसी आधार पर अदालत ने आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने इस मामले में एक बहुत ही अहम टिप्पणी की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि भले ही धर्म परिवर्तन कर चुके व्यक्ति का अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र अधिकारियों की तरफ से रद्द न किया गया हो, फिर भी धर्म बदलने के बाद वह इस कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षा का हकदार नहीं है।

अब जानें- सुप्रीम कोर्ट ने मामले में क्या पाया?

पादरी आनंद पॉल ने आंध्र हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 24 मार्च 2026 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भी आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के इस फैसले को सही ठहराते हुए बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने पर व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल प्रभाव से पूरी तरह खत्म हो जाता है।

किस पर पड़ेगा फैसले का असर?

धर्म परिवर्तन के मामले में जातीय लाभ की सुविधा से जुड़े नियम इस बात पर निर्भर करते हैं कि व्यक्ति किस वर्ग से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के मुताबिक, अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के लोगों ने अगर धर्म परिवर्तन किया है तो धर्मांतरण के साथ ही आरक्षण की सुविधा खत्म हो जाती है। हालांकि, इसके नियम भी इस पर निर्भर हैं कि धर्मांतरण करने वाला व्यक्ति किस धर्म में जा रहा है। 

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950: इस आदेश के पैरा 3 के अनुसार स्पष्ट किया गया है कि जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) को मानता है, उसे अनुसूचित जाति (एससी) का सदस्य नहीं माना जा सकता। 

अदालतों का सख्त रुख: अब सुप्रीम कोर्ट ने फिर से स्पष्ट किया है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी भी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर व्यक्ति का अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा तुरंत और पूरी तरह से छिन जाता है। यानी उसे न सिर्फ एससी-एसटी एक्ट के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा खत्म हो जाती है, बल्कि उसके आरक्षण के लाभ भी समाप्त हो जाते हैं। हालांकि, उसे धार्मिक आधार पर सुरक्षाएं और आरक्षण मिल सकते हैं। 

किस पर नहीं पड़ेगा सुप्रीम फैसले का असर?

अगर कोई व्यक्ति हिंदू से सिख, हिंदू से बौद्ध, सिख से हिंदू, सिख से बौद्ध, बौद्ध से हिंदू या बौद्ध से सिख धर्म यानी इन्हीं तीन धर्मों के अंतर्गत परिवर्तित होता है, तो उसका अनुसूचित जाति का वर्गीकरण खत्म नहीं होता। हालांकि, इन तीन धर्मों के लोग अगर इससे इतर किसी धर्म में परिवर्तित होते हैं, जैसे- इस्लाम, ईसाई, आदि तो उन्हें अनुसूचित जाति से जुड़े लाभ नहीं मिल सकते। हालांकि, वह अन्य तरह के धर्म से जुड़े लाभ (आरक्षण, सुरक्षा कानून, आदि) और पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से जुड़े लाभ (राज्यों के कानून के हिसाब से) हासिल कर सकते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट से पहले अदालतों ने इस मुद्दे पर क्या कहा?

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग उच्च न्यायालयों ने यह भी माना है कि अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म में (जैसे ईसाई धर्म में) धर्मांतरण कर लेता है, लेकिन केवल नौकरी या आरक्षण का लाभ उठाने के लिए खुद को हिंदू या अपनी मूल जाति का बताता है, तो इसे संविधान के साथ धोखा माना जाएगा। अदालत के मुताबिक, आरक्षण या जातिगत लाभ देने का मकसद जाति वर्गों को सामाजिक न्याय देना है, और बिना सच्ची आस्था के केवल आरक्षण के लिए धर्म बदलना इसके मूल उद्देश्य को नष्ट करता है। अदालतों ने तर्क दिया है कि चूंकि हिंदू धर्म से इतर अन्य धर्मों में जाति-व्यवस्था इतनी गहराई से नहीं मानी जाती, इसलिए धर्म बदलने के बाद जाति के आधार पर भेदभाव से बचाने वाले कानून का लाभ नहीं लिया जा सकता।

1. सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक फैसले

सूसाई बनाम भारत संघ (1986): सुप्रीम कोर्ट ने दशकों पहले 1986 में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय का कोई व्यक्ति यदि ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति के लिए बनी योजनाओं और लाभों के लिए पूरी तरह अयोग्य हो जाता है।

सी. सेल्वाराणी मामला (2024): सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत ही अहम फैसले में कहा कि ईसाई धर्म अपनाने पर व्यक्ति अपनी मूल जाति खो देता है। अदालत ने कहा कि धर्मांतरण सच्ची आस्था से होना चाहिए। अगर धर्म परिवर्तन केवल आरक्षण का लाभ लेने के लिए किया गया है तो इसे अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह आरक्षण के सामाजिक उद्देश्य को खत्म करता है। अदालत ने दोहरी पहचान रखने को संविधान के साथ धोखा करार दिया था। 

2. इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया फैसला

ऐसा ही एक मामले में पिछले साल दिसंबर में फैसला आया था। जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गया है, तो वह कानूनी रूप से एससी का दर्जा बरकरार नहीं रख सकता। अदालत ने 1950 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि जो हिंदू, सिख या बौद्ध नहीं है, वह एससी नहीं हो सकता। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को सख्त निर्देश दिए कि पूरे राज्य में ऐसे मामलों की जांच की जाए, जहां अल्पसंख्यक धर्मों में धर्मांतरित लोग अभी भी गैरकानूनी रूप से एससी वर्ग को मिलने वाले लाभों का दावा कर रहे हैं।

3. मद्रास उच्च न्यायालय में भी आए केस

सी. सेल्वाराणी मामला (2023): सुप्रीम कोर्ट में जाने से पहले सी. सेल्वाराणी केस मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा था। यहां एक ऐसी महिला को एससी प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया गया था, जो जन्म से ईसाई थी और नियमित रूप से चर्च जाती थी, लेकिन केवल सरकारी नौकरी में आरक्षण पाने के लिए खुद को हिंदू और वल्लुवन जाति का बता रही थी।

अकबर अली मामला: मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि इस्लाम या ईसाई धर्म में धर्मांतरण के बाद व्यक्ति अपनी जाति को आगे नहीं ले जा सकता। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपना लेता है, तो वह केवल एक मुसलमान बन जाता है और मुस्लिम समाज में उसकी जगह इस बात से तय नहीं होती कि धर्मांतरण से पहले उसकी जाति क्या थी।

4. कर्नाटक हाईकोर्ट बोला था- ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं

कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी कहा था कि ईसाइयों को एससी एक्ट के तहत संरक्षण देना गलत है। अदालत का मानना था कि यह कानून विशेष रूप से जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए बना है, जबकि ईसाई धर्मशास्त्र में जाति-व्यवस्था जैसी कोई प्रथा ही नहीं है।

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