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Supreme Court: सबरीमाला में महिलाओं के साथ भेदभाव मामले में नौ जजों की पीठ गठित, सात अप्रैल से होगी सुनवाई

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 16 Feb 2026 11:45 AM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट की 9-न्यायाधीशों की बेंच 7 अप्रैल से धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के भेदभाव के मामलों पर सुनवाई करेगी। केंद्र ने सबरीमाला फैसले की समीक्षा का समर्थन किया।

Supreme Court Sabarimala 9-judge bench hearing discrimination against women hearing from April 7 know details
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट की 9-न्यायाधीशों की बेंच 7 अप्रैल से धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के भेदभाव के मामलों पर सुनवाई शुरू करेगी। इस मामले में प्रमुख रूप से केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी पक्ष अपनी लिखित दलीलें 14 मार्च तक जमा करें। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह सबरीमाला फैसले की समीक्षा का समर्थन करते हैं। बेंच में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल हैं।

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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील परमेश्वर और शिवम सिंह को एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया है, ताकि न्यायालय को आवश्यक मार्गदर्शन और पक्षों की दलीलों का विश्लेषण प्रदान किया जा सके। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि सुनवाई 22 अप्रैल तक पूरी की जाएगी। सबरीमाला फैसले की समीक्षा का समर्थन करने वाले पक्षों के लिए कृष्ण कुमार सिंह को नोडल काउंसल नियुक्त किया गया है, जबकि फैसले का विरोध करने वालों के लिए शश्वती परी को नोडल काउंसल बनाया गया।
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सुनवाई से पहले बढ़ी सियासी हलचल
यह मुद्दा इसलिए फिर सामने आया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट सोमवार को 2018 के फैसले से जुड़े रिव्यू और रिट याचिकाओं पर विचार करने वाला है। उस फैसले में हर उम्र की महिलाओं को भगवान अयप्पा के मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। विपक्षी कांग्रेस का कहना है कि सरकार को अदालत में जाने से पहले जनता को अपना रुख साफ-साफ बताना चाहिए। उनका आरोप है कि सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर अब तक असमंजस की स्थिति में है।

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11 मई 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पांच-न्यायाधीशों की बेंच सीमित समीक्षा शक्तियों के तहत कानून के सवालों को बड़े बेंच को भेज सकती है। 2018 के सबरीमाला फैसले ने सभी उम्र की महिलाओं के मंदिर प्रवेश को अनुमति दी थी।सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 के दायरे पर सात प्रमुख सवाल भी तैयार किए हैं। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया कि धार्मिक समूह या संप्रदाय की प्रथाओं को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा पीआईएल (जनहित याचिका) के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है या नहीं। सबरीमाला मामले के अलावा बेंच ने मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश और पारसी महिलाओं के अगियारी (पवित्र अग्नि स्थल) में प्रवेश से जुड़े मुद्दों को भी बड़े बेंच के समक्ष भेजा है।



विपक्ष का सवाल
नेता प्रतिपक्ष वी डी सतीशन ने मुख्यमंत्री विजयन से पूछा कि क्या सरकार अब भी सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने पुराने हलफनामे के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है तो उसे मजबूती से अदालत में यही बात रखनी चाहिए। अगर नहीं है तो हलफनामा वापस लिया जाए। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने भी कहा कि पूरे केरल में सरकार से साफ रुख की मांग हो रही है और पीछे हटना जनता के साथ धोखा होगा।

सत्तारूढ़ दल सीपीआई(एम) ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। पार्टी के राज्य सचिव एम वी गोविंदन ने कहा कि सरकार अपना पक्ष अदालत में ही रखेगी और अभी इसे सार्वजनिक करना जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि भक्तों की भावनाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों दोनों का सम्मान किया जाएगा। पार्टी के वरिष्ठ नेता ए विजयराघवन ने भी कहा कि यह मामला बेहद जटिल है और सभी पक्षों को सुनने के बाद ही कोई ठोस फैसला लिया जाना चाहिए।

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