{"_id":"69eb348cd567ae7ce10f3a95","slug":"supreme-court-said-no-court-can-force-minor-to-carry-pregnancy-against-her-will-2026-04-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"Supreme Court: 'कोई अदालत नाबालिग को गर्भावस्था बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती', सुप्रीम कोर्ट का फैसला","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Supreme Court: 'कोई अदालत नाबालिग को गर्भावस्था बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती', सुप्रीम कोर्ट का फैसला
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Fri, 24 Apr 2026 02:44 PM IST
विज्ञापन
सार
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि कोई भी अदालत किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था के लिए मजबूर नहीं कर सकती। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की नाबालिग को सात महीने के गर्भ को मेडिकल तरीके से खत्म करने की मंजूरी दे दी।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसला देते हुए कहा कि किसी भी महिला, विशेषकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय एक नाबालिग लड़की को सात महीने से अधिक की गर्भावस्था को मेडिकल तरीके से खत्म करने की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि इस मामले में गर्भ अनचाहा है। साथ ही, उसने पहले दो बार आत्महत्या का प्रयास किया है, ऐसे में गर्भावस्था जारी रखना उसके हित में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
'गर्भवती महिला के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए न कि जन्म लेने वाले बच्चों को'
Trending Videos
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
- जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि गर्भवती महिला की पसंद सर्वोपरि है, न कि जन्म लेने वाले बच्चे की। अदालत ने कहा कि जबरन गर्भावस्था को जारी रखने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक स्थिति और समग्र विकास पर गहरा असर पड़ सकता है।
- पीठ ने कहा कि महिला की प्रजनन संबंधी स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। यदि किसी महिला को अनचाहे गर्भ को जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
- अदालत ने कहा, 'अपने शरीर से जुड़े फैसले लेने का अधिकार, खासकर प्रजनन से संबंधित मामले, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा है। इस अधिकार को गलत प्रतिबंध लगाकर कमजोर नहीं किया जा सकता, खासकर नाबालिगों और अनचाहे गर्भ के मामलों में।
- सर्वोच्च अदालत ने कहा कि कोई भी अदालत किसी भी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भवस्था के लिए मजबूर नहीं कर सकती और खासकर नाबालिग को तो बिल्कुल नहीं।
- सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भवस्था के लिए बाध्य करना न सिर्फ उसकी आजादी की अनदेखी होगी, बल्कि इससे उसे गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात भी पहुंच सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
'गर्भवती महिला के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए न कि जन्म लेने वाले बच्चों को'
- पीठ ने यह भी साफ किया कि यह तर्क देना आसान है कि यदि महिला बच्चे को पालना नहीं चाहती तो उसे गोद दे सकती है, लेकिन अनचाहे गर्भ के मामलों में यह तर्क ठीक नहीं है।
- अदालत ने कहा कि सांविधानिक अदालतों को ऐसे मामलों में गर्भवती महिला के हितों और परिस्थितियों को प्राथमिकता देनी चाहिए, न कि जन्म लेने वाले बच्चे को।
- सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर अनचाहे गर्भ को जारी रखने पर जोर दिया जाएगा, तो लोग अवैध गर्भपात केंद्रों का सहारा लेने को मजबूर होंगे, जिससे महिलाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य को खतरा बढ़ेगा।
विज्ञापन
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

कमेंट
कमेंट X