सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स: BCI के हर नीतिगत फैसले में AG-SG की भागीदारी जरूरी; झारखंड डीजीपी विवाद की सुनवाई टली
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के लंबे कार्यकाल की वैधता और उन्हें पद से हटाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि बीसीआई द्वारा लिए जाने वाले प्रत्येक नीतिगत फैसले में भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। यह निर्देश बीसीआई के कामकाज से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आया। याचिका में दावा किया गया है कि मनन कुमार मिश्रा पहली बार 2012 तक बीसीआई के अध्यक्ष चुने गए थे। उन्होंने 2014 में कुछ समय के लिए पद छोड़ा, लेकिन उसी साल नवंबर में दोबारा अध्यक्ष बने और तब से पद पर बने हुए हैं।
झारखंड डीजीपी के नियुक्ति विवाद की सुनवाई 7 सितंबर तक टली
झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्हें अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट नहीं मिली है, इसलिए रिपोर्ट देखे बिना सरकार अपना पक्ष नहीं रख सकती। अदालत ने रिपोर्ट उपलब्ध कराने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई 7 सितंबर को तय कर दी। 18 अगस्त को कोर्ट ने डीजीपी नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज एमिकस क्यूरी को सौंपकर रिपोर्ट मांगी थी, जिसे उन्होंने दाखिल कर दिया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि डीजीपी नियुक्ति के लिए अधिकारियों के नाम संघ लोक सेवा आयोग को क्यों नहीं भेजे गए। विवाद का संबंध प्रकाश सिंह बनाम केंद्र सरकार मामले में तय पुलिस सुधार संबंधी दिशा-निर्देशों से है। राज्य सरकार ने 2024 में नई डीजीपी नियुक्ति नियमावली बनाई, जिसके तहत अनुराग गुप्ता और बाद में तदाशा मिश्रा को डीजीपी नियुक्त किया गया। भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने नियमावली की वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिका खारिज कर नियमावली से जुड़ी याचिका हाईकोर्ट से अपने पास सुनवाई हेतु स्थानांतरित कर ली।
ऑयल इंडिया को सुप्रीम कोर्ट ने नई याचिका दाखिल करने को क्यों कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने ऑयल इंडिया को लंबित मामले में दाखिल इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन वापस लेकर इसी मुद्दे पर नई याचिका दाखिल करने की अनुमति दी है। कंपनी ने डिब्रू-सैखोवा नेशनल पार्क के नीचेएक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग (ERD) तकनीक से हाइड्रोकार्बन निकालने की अनुमति मांगी है। ऑयल इंडिया के वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने जल्द सुनवाई की मांग करते हुए बताया कि ड्रिलिंग का ढांचा पार्क की सीमा से बाहर रहेगा और करीब 4,000 मीटर नीचे जाकर क्षैतिज दिशा में आगे बढ़ेगा। कंपनी का दावा है कि यह पारंपरिक खनन की श्रेणी में नहीं आता। उसने वन सलाहकार समिति और पर्यावरण मंत्रालय के फैसले को चुनौती दी है। कंपनी के मुताबिक, अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के 2023 के उस आदेश को गलत तरीके से लागू किया, जिसमें संरक्षित क्षेत्रों और उनके एक किलोमीटर दायरे में खनन पर रोक लगाई गई थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने नई याचिका दाखिल करने की अनुमति दे दी।पर्स सीन मछली पकड़ने पर ‘अलिखित प्रतिबंध’ से सुप्रीम कोर्ट नाराज
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में पर्स सीन जाल से मछली पकड़ने वाले मछुआरों को एक्सेस पास जारी करने में देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि आवेदन लंबित रखना व्यावहारिक रूप से एक “अलिखित प्रतिबंध” लगाने के समान है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट के अनुसार, केंद्र के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) में पर्स सीन से मछली पकड़ने और राज्य के क्षेत्रीय जल से होकर वहां पहुंचने से जुड़े कानून व नियम अब लागू हैं। इसलिए केंद्र और तमिलनाडु सरकार को सहकारी संघवाद के सिद्धांत के तहत मिलकर काम करना चाहिए। अदालत ने कहा कि दोनों प्रशासनिक इकाइयों की जिम्मेदारी है कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने के साथ मछुआरों को उनके मौलिक अधिकार के तहत आवेदन की प्रक्रिया और मंजूरी तक आसान पहुंच मिले। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत उचित नियमन के अधीन है।
257 आवेदनों में केवल छह पास जारी
आवेदनों पर कार्रवाई की स्थिति को कोर्ट ने “परेशान करने वाली” बताया। 3 अगस्त 2026 तक EEZ Rules, 2025 के तहत ReALCRaft पोर्टल पर 257 आवेदन आए थे, जिनमें करीब 226 तमिलनाडु की ओर से सत्यापन के लिए लंबित थे और केवल छह एक्सेस पास जारी किए गए थे। पीठ ने इसे तटीय राज्यों में सबसे कम बताते हुए राज्य को आवेदनों का शीघ्र समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही तमिलनाडु को Marine Fishing Regulation Rules, 2020 के नियम 15(5) और 15(6) के तहत नियम बनाने को कहा, जिनमें क्षेत्रीय जल से EEZ तक पर्स सीन नौकाओं के आवागमन के लिए निर्धारित चैनल हो। अदालत ने निर्देश विशेषज्ञ समिति की अंतिम सिफारिशों को ध्यान में रखकर तैयार करने को कहा। समिति ने माना था कि पर्स सीन जाल से समुद्री मछली भंडार पर कोई बड़ा पर्यावरणीय नुकसान नहीं दिखता, हालांकि इसके इस्तेमाल पर प्रभावी नियमन जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार या गढ़े गए फर्जी न्यायिक फैसलों और कानूनी संदर्भों के आधार पर लगाए गए 425.27 करोड़ रुपये के कस्टम्स जुर्माने को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक या अर्ध-न्यायिक अधिकारी किसी भी एआई जनित कानूनी सामग्री पर भरोसा करने से पहले सत्यापन जरूर करें। शीर्ष अदालत ने कहा है कि एआई निर्णय लेने में सहायता कर सकता है, लेकिन निर्णय का विकल्प नहीं बन सकता।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने हीरा कारोबारी विजय घनश्याम गडिया की अपील स्वीकार करते हुए गुजरात हाईकोर्ट के 20 जनवरी 2026 के आदेश और कस्टम्स विभाग के 8 अक्तूबर 2025 के मूल आदेश को रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए संबंधित विभाग को भेज दिया। मामले में कस्टम्स के अतिरिक्त आयुक्त, सूरत ने आरोप लगाया था कि कारोबारी ने प्राकृतिक हीरों की खेप को लैब में तैयार हीरा बताकर घोषित किया ताकि कम सीमा शुल्क का लाभ लिया जा सके। इसके आधार पर कस्टम्स एक्ट की धारा 114 के तहत 425.27 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने मूल आदेश में हवाला दिए गए न्यायिक फैसलों और कानूनी लेखों की स्वतंत्र रूप से जांच की। अदालत ने पाया कि कुछ मामले अस्तित्व में ही नहीं थे या उनके वर्णन गलत थे। वहीं, कुछ वास्तविक फैसलों में भी वे कानूनी सिद्धांत नहीं थे, जिन्हें मूल आदेश में उनके नाम से जोड़ा गया था। पीठ ने कहा कि एआई का इस्तेमाल निर्णय प्रक्रिया को तेज करने में सहायक हो सकता है लेकिन अंतिम निर्णय मनुष्य को ही लेना होगा।
अदालत ने टिप्पणी की, सहायता कभी फैसले का स्थान नहीं ले सकती। एआई प्रशिक्षण के पहियों की तरह मदद कर सकता है लेकिन उसे चालक की सीट सौंपना अविवेकपूर्ण और खतरनाक होगा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई समान रैंक के किसी अन्य अधिकारी से कराने का निर्देश दिया है। मूल आदेश पारित करने वाला अधिकारी इसकी नई सुनवाई नहीं करेगा। मूल आदेश के लेखक के खिलाफ कार्रवाई की जाए या नहीं, इसका फैसला नियुक्ति प्राधिकारी पर छोड़ दिया गया है।
ऑटिज्म के स्टेम सेल इलाज पर शीर्ष कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने यश चैरिटेबल ट्रस्ट बनाम भारत संघ मामले में 30 जनवरी 2026 को दिए अपने फैसले के पालन की समीक्षा करते हुए यह निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग की ओर से स्टेम सेल थेरेपी को लेकर जारी सलाह और इस उपचार के लिए मंजूर बीमारियों की सूची को अपडेट करना सही कदम है। इन कदमों के लिए विशेषज्ञों की एक समिति की बैठक भी हुई थी। इसमें सीडीएससीओ, जैव प्रौद्योगिकी विभाग, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और एम्स दिल्ली सहित कई प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हुए थे।
मरीजों को लेकर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर उन मरीजों को लेकर चिंता जताई जो जनवरी में अदालत के फैसले के समय पहले से स्टेम सेल थेरेपी ले रहे थे। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि ऐसे मरीजों को बिना चिकित्सकीय निगरानी के नहीं छोड़ा जाना चाहिए। जरूरत होने पर उन्हें नियंत्रित और मंजूर क्लिनिकल ट्रायल में शामिल करने पर विचार किया जाए।