'तब तो कारगिल के समय ही हो जाना चाहिए था परमाणु युद्घ'
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उड़ी स्थित सैन्य मुख्यालय पर आतंकी हमला मामले में सेना से हुई चूक को पूर्व सैन्य अधिकारी स्वीकार करने केलिए तैयार नहीं हैं। इनका मानना है कि बीते कुछ दशकों में रक्षात्मक बना कर सरकारों ने सेना के मनोबल से खिलवाड़ किया है। रक्षा मामले के विशेषज्ञ यह भी मानने केलिए तैयार नहीं हैं कि अगर भारत आगे बढ़ कर पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) और एलओसी से लगे आतंकी शिविरों पर हमला किया तो दोनों देशों के बीच परमाणु युद्घ का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
इस तर्क को जवाबदेही से भागने वाला बताते हुए विशेषज्ञों ने पूछा कि अगर ऐसा है तो कारगिल घुसपैठ के दौरान भारत की ओर से की गई सैन्य कार्रवाई के समय दोनों देशों के बीच परमाणु युद्घ क्यों नहीं हुआ। आतंकी हमला मामले में सेना के स्तर पर चूक के सवाल पर मेजर जनरल (रि) जीडी बक्सी कहते हैं 'बीते कुछ दशकों से सेना की भूमिका रक्षात्मक बना दी गई है।
सेना के लिए तलवार और ढाल दोनों की जरूरत है। जबकि हो यह रहा है कि सेना को ढाल से आतंकवाद के खिलाफ जंग लडने के लिए कहा जा रहा है। जाहिर है कि इससे सेना के मनोबल को नुकसान पहुंचा है। सरकारें सेना केमनोबल पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव के खतरे को नहीं समझ रही। सीधी कार्रवाई से बचने के लिए परमाणु युद्घ के खतरे की बात कही जा रही है।
'सवाल यह है कि सेना के हाथ में कितने अधिकार हैं'
अगर यह सच है तो कारगिल युद्घ के दौरान पाकिस्तान ने परमाणु हथियार का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? लेफ्टिनेंट जनरल (रि) निरंजन सिंह मलिक कहते हैं सेना की चूक पर बात करने वालों को सबसे पहले तो यह जानना चाहिए कि हमारी सेना किन परिस्थितियों में काम कर रही हैं।
दुनिया का किसी भी देश की सेना इतनी विपरीत परिस्थितियों में काम नहीं कर रही। फिर सवाल यह है कि सेना के हाथ में कितने अधिकार हैं। मेजर जनरल (रि) शंकर प्रसाद भी सेना के स्तर पर हुई चूक को खारिज करते हैं।
उन्होंने कहा कि एनआईए और सेना अपने स्तर पर इस तरह के मामले की जांच और जरूरत पडने पर कार्रवाई करती है। कितने लोगों को पता है कि जहां हमला हुआ वहां की परिस्थिति क्या थी?