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टीएमसी के 20 बागी सांसदों पर लटकी तलवार: स्पीकर ने 22 सितंबर तक दिया वक्त; अब बचेंगे या जाएगी सदस्यता?
Thu, 03 Sep 2026 06:13 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 03 Sep 2026 06:13 PM IST
सार
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एनसीपीआई के 20 सांसदों को जवाब देने के लिए 22 सितंबर तक का समय दिया है। टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने इन सांसदों की सदस्यता दलबदल विरोधी कानून के तहत रद्द करने की मांग की है। ये सांसद जून में टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में शामिल हुए थे और बाद में एनडीए के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की। अब 22 सितंबर तक उनके जवाब और उसके बाद होने वाली कार्रवाई पर सबकी नजर रहेगी।
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टीएमसी के बागी सांसदों को राहत
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के 20 सांसदों को बड़ी राहत दी है। अब इन सांसदों को 22 सितंबर तक अपना जवाब देना होगा। उनके खिलाफ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने दलबदल विरोधी कानून के तहत सदस्यता रद्द करने की मांग की है।
पहले इन सांसदों को जवाब देने के लिए सिर्फ सात दिन का समय दिया गया था। लोकसभा अध्यक्ष ने 26 अगस्त को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा था। सांसदों ने जवाब तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की थी। उनकी इसी मांग को स्वीकार करते हुए स्पीकर ने अब 22 सितंबर की नई समयसीमा तय की है।
सवाल: 20 सांसदों के खिलाफ कार्रवाई क्यों मांगी गई?
जवाब: टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने इन 20 सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर लोकसभा अध्यक्ष के सामने याचिकाएं दाखिल की थीं। उनका आरोप और दावा इसी बात से जुड़ा है कि सांसदों ने टीएमसी छोड़कर दूसरी पार्टी का रुख किया है। मामला दलबदल विरोधी कानून के तहत सांसदों की सदस्यता पर कार्रवाई से जुड़ा है। इसलिए अब इन सांसदों के जवाब के बाद लोकसभा अध्यक्ष को आगे की प्रक्रिया पर फैसला लेना होगा।
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जून में टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में गए थे सांसद
सवाल: सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुंचा मामला?
जवाब: अभिषेक बनर्जी ने जून में ही लोकसभा अध्यक्ष के सामने अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं। इनमें बागी सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की गई थी। इसके बाद मामले में तेजी लाने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने 20 सांसदों को नोटिस जारी किया। शीर्ष अदालत ने स्पीकर के सामने चल रही सदस्यता रद्द करने की कार्यवाही को तेजी से निपटाने का निर्देश भी दिया। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष की ओर से सांसदों को नोटिस भेजे गए थे।
यह भी पढ़ें: एक्सप्लेनर: कैसे बदल रहा भारत का ऑटोमोबाइल बाजार, क्या खत्म होने वाला है पेट्रोल वाली गाड़ियों का दबदबा?
सवाल: सांसदों को पहले क्या जवाब देना था?
जवाब: 26 अगस्त को जारी नोटिस में सांसदों से सात दिन के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा गया था। लेकिन सांसदों ने इस अवधि को पर्याप्त नहीं माना। उन्होंने जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय मांगा। अब उन्हें 22 सितंबर तक जवाब देने की अनुमति मिल गई है। यानी बागी खेमे को अपनी कानूनी और राजनीतिक रणनीति तैयार करने के लिए कुछ और समय मिल गया है।
बागी खेमे के सामने कानूनी चुनौती
सवाल: क्या सिर्फ लोकसभा में ही दिख रही है टीएमसी की टूट?
जवाब: टीएमसी के भीतर चल रहा यह विवाद सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के भीतर शक्ति प्रदर्शन देखने को मिल चुका है।
सवाल: अब आगे क्या होगा?
जवाब: फिलहाल सबसे अहम तारीख 22 सितंबर है। इस दिन तक 20 सांसदों को लोकसभा अध्यक्ष के नोटिस का जवाब देना होगा। इसके बाद उनके जवाब और मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं को देखते हुए आगे की कार्रवाई तय होगी। इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि शीर्ष अदालत पहले ही स्पीकर के सामने चल रही सदस्यता रद्द करने की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने का निर्देश दे चुकी है।
सवाल: क्यों अहम है 22 सितंबर की तारीख?
जवाब: 20 सांसदों के जवाब से यह साफ होगा कि वे अपनी सदस्यता बचाने के लिए क्या कानूनी आधार रखते हैं। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष के सामने यह तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी कि दलबदल विरोधी कानून के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई बनती है या नहीं। फिलहाल अतिरिक्त समय मिलने से बागी सांसदों को राहत जरूर मिली है। लेकिन सदस्यता रद्द करने की याचिकाओं पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।
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पहले इन सांसदों को जवाब देने के लिए सिर्फ सात दिन का समय दिया गया था। लोकसभा अध्यक्ष ने 26 अगस्त को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा था। सांसदों ने जवाब तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की थी। उनकी इसी मांग को स्वीकार करते हुए स्पीकर ने अब 22 सितंबर की नई समयसीमा तय की है।
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सवाल: 20 सांसदों के खिलाफ कार्रवाई क्यों मांगी गई?
जवाब: टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने इन 20 सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर लोकसभा अध्यक्ष के सामने याचिकाएं दाखिल की थीं। उनका आरोप और दावा इसी बात से जुड़ा है कि सांसदों ने टीएमसी छोड़कर दूसरी पार्टी का रुख किया है। मामला दलबदल विरोधी कानून के तहत सांसदों की सदस्यता पर कार्रवाई से जुड़ा है। इसलिए अब इन सांसदों के जवाब के बाद लोकसभा अध्यक्ष को आगे की प्रक्रिया पर फैसला लेना होगा।
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जून में टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में गए थे सांसद
- इन 20 सांसदों ने जून में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी छोड़ दी थी। इसके बाद उन्होंने एनसीपीआई का दामन थाम लिया। यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी के खराब प्रदर्शन के बाद सामने आया था।
- इन सांसदों के एनसीपीआई में शामिल होने के बाद राजनीतिक समीकरण और भी बदल गए। सांसदों ने अब भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के प्रति अपनी निष्ठा का एलान भी कर दिया है।
सवाल: सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुंचा मामला?
जवाब: अभिषेक बनर्जी ने जून में ही लोकसभा अध्यक्ष के सामने अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं। इनमें बागी सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की गई थी। इसके बाद मामले में तेजी लाने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने 20 सांसदों को नोटिस जारी किया। शीर्ष अदालत ने स्पीकर के सामने चल रही सदस्यता रद्द करने की कार्यवाही को तेजी से निपटाने का निर्देश भी दिया। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष की ओर से सांसदों को नोटिस भेजे गए थे।
यह भी पढ़ें: एक्सप्लेनर: कैसे बदल रहा भारत का ऑटोमोबाइल बाजार, क्या खत्म होने वाला है पेट्रोल वाली गाड़ियों का दबदबा?
सवाल: सांसदों को पहले क्या जवाब देना था?
जवाब: 26 अगस्त को जारी नोटिस में सांसदों से सात दिन के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा गया था। लेकिन सांसदों ने इस अवधि को पर्याप्त नहीं माना। उन्होंने जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय मांगा। अब उन्हें 22 सितंबर तक जवाब देने की अनुमति मिल गई है। यानी बागी खेमे को अपनी कानूनी और राजनीतिक रणनीति तैयार करने के लिए कुछ और समय मिल गया है।
बागी खेमे के सामने कानूनी चुनौती
- सूत्रों के मुताबिक, ये सांसद अपने मामले को लेकर कानूनी राय ले रहे हैं। उनका जोर इस बात पर है कि उनके मामले में दलबदल विरोधी कानून के प्रावधान किस तरह लागू होते हैं।
- इसके साथ ही सांसद यह भी तय कर रहे हैं कि लोकसभा अध्यक्ष के सामने कौन-कौन से कानूनी तर्क रखे जाएं। 22 सितंबर तक मिलने वाला समय इसी तैयारी के लिए अहम माना जा रहा है।
सवाल: क्या सिर्फ लोकसभा में ही दिख रही है टीएमसी की टूट?
जवाब: टीएमसी के भीतर चल रहा यह विवाद सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के भीतर शक्ति प्रदर्शन देखने को मिल चुका है।
- विधानसभा में टीएमसी के कुल 80 विधायक हैं। इनमें से 65 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के नेता प्रतिपक्ष पद के दावे का समर्थन किया था। इन विधायकों ने ममता बनर्जी खेमे की ओर से समर्थित उम्मीदवार को स्वीकार नहीं किया था।
- यह घटनाक्रम बताता है कि पार्टी के भीतर मतभेद कितने गहरे हैं। लोकसभा के 20 सांसदों का मामला इसी बड़े राजनीतिक टकराव की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।
- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी के खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया। जून में 20 सांसदों का पार्टी छोड़ना इसी घटनाक्रम का अहम हिस्सा रहा।
- इसके बाद इन सांसदों ने एनसीपीआई का रुख किया और एनडीए के प्रति अपनी निष्ठा जताई। ऐसे में उनकी सदस्यता का मामला अब कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है।
सवाल: अब आगे क्या होगा?
जवाब: फिलहाल सबसे अहम तारीख 22 सितंबर है। इस दिन तक 20 सांसदों को लोकसभा अध्यक्ष के नोटिस का जवाब देना होगा। इसके बाद उनके जवाब और मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं को देखते हुए आगे की कार्रवाई तय होगी। इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि शीर्ष अदालत पहले ही स्पीकर के सामने चल रही सदस्यता रद्द करने की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने का निर्देश दे चुकी है।
सवाल: क्यों अहम है 22 सितंबर की तारीख?
जवाब: 20 सांसदों के जवाब से यह साफ होगा कि वे अपनी सदस्यता बचाने के लिए क्या कानूनी आधार रखते हैं। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष के सामने यह तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी कि दलबदल विरोधी कानून के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई बनती है या नहीं। फिलहाल अतिरिक्त समय मिलने से बागी सांसदों को राहत जरूर मिली है। लेकिन सदस्यता रद्द करने की याचिकाओं पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।