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Labour Codes: श्रम कानूनों की आलोचना पर विधि आयोग बोला- दशकों में किया गया सबसे व्यापक और दूरगामी सुधार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Sun, 22 Feb 2026 05:12 PM IST
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सार
केंद्र सरकार के नए श्रम कानूनों को लेकर राजनीतिक विवाद तेज है, लेकिन विधि आयोग की एक वरिष्ठ अधिकारी ने इन्हें व्यवस्था में बड़ा बदलाव बताया है। उनके अनुसार, ये प्रावधान बिखरे कानूनों को एकीकृत कर श्रम बाजार को आधुनिक स्वरूप देने का प्रयास करते हैं। गिग और असंगठित श्रमिकों को दायरे में लाना इसका अहम पक्ष है।
श्रम कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन (फाइल फोटो)
- फोटो : ANI
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विस्तार
विपक्षी दलों और ट्रेड यूनियनों की आलोचना के बीच एक शीर्ष विधि आयोग अधिकारी ने चार नए श्रम कानूनों को दशकों में किया गया सबसे व्यापक और दूरगामी सुधार बताया है। विधि आयोग की सदस्य सचिव अंजू राठी राणा ने कहा कि ये कानून देश में अधिक समावेशी और भविष्य के अनुरूप श्रम बाजार बनाने की क्षमता रखते हैं।
उन्होंने कहा कि वर्षों से भारत में श्रम कानून क्रमिक रूप से विकसित होते रहे, जिससे अलग-अलग परिभाषाओं, विभिन्न मानकों और अनुपालन दायित्वों वाले अनेक कानून बन गए। चारों कानूनों का ढांचा वेतन, सुरक्षा मानकों और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को एक साथ लाकर इस जटिलता को कम करने का प्रयास करता है।
ये भी पढ़ें: ED का बड़ा फैसला: इस वित्त वर्ष 500 चार्जशीट दाखिल करने का लक्ष्य, अब एक से दो साल में पूरी होगी मामलों की जांच
विधि आयोग अधिकारी ने बताई श्रम कानूनों की खासियतें
अंजू राठी राणा ने बताया कि वेतन संहिता, 2019 केंद्र सरकार को फ्लोर वेज तय करने का अधिकार देती है और वेतन संबंधी परिभाषाओं को मानकीकृत करती है। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को औपचारिक मान्यता देती है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ट्रेड यूनियन, स्थायी आदेश और औद्योगिक विवादों से जुड़े कानूनों को समेकित करती है, जबकि व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएं संहिता सुरक्षा मानकों को एक आधुनिक ढांचे में लाती है।
हालांकि विपक्ष और 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने इन संहिताओं को श्रमिक विरोधी और कॉरपोरेट समर्थक बताते हुए आरोप लगाया है कि ये 'हायर एंड फायर' नीति को बढ़ावा देती हैं, यूनियन अधिकारों को सीमित करती हैं और सामाजिक सुरक्षा को कमजोर करती हैं।
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विधायी एकीकरण केवल शुरुआत :विधि आयोग
राणा ने कहा कि विधायी एकीकरण केवल शुरुआत है। इन कानूनों की सफलता राज्यों में समन्वित क्रियान्वयन और उद्यमों को लचीलापन देने के साथ श्रमिकों की सुरक्षा के संतुलन पर निर्भर करेगी। श्रम मंत्रालय द्वारा हाल ही में नियोक्ताओं के अनुपालन संबंधी ढांचे की रूपरेखा भी जारी की गई है। उन्होंने कहा कि असली परीक्षा यह होगी कि क्या ये सुधार व्यवहार में प्रभावी और विश्वसनीय श्रमिक संरक्षण सुनिश्चित कर पाते हैं।
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उन्होंने कहा कि वर्षों से भारत में श्रम कानून क्रमिक रूप से विकसित होते रहे, जिससे अलग-अलग परिभाषाओं, विभिन्न मानकों और अनुपालन दायित्वों वाले अनेक कानून बन गए। चारों कानूनों का ढांचा वेतन, सुरक्षा मानकों और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को एक साथ लाकर इस जटिलता को कम करने का प्रयास करता है।
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विधि आयोग अधिकारी ने बताई श्रम कानूनों की खासियतें
अंजू राठी राणा ने बताया कि वेतन संहिता, 2019 केंद्र सरकार को फ्लोर वेज तय करने का अधिकार देती है और वेतन संबंधी परिभाषाओं को मानकीकृत करती है। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को औपचारिक मान्यता देती है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ट्रेड यूनियन, स्थायी आदेश और औद्योगिक विवादों से जुड़े कानूनों को समेकित करती है, जबकि व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएं संहिता सुरक्षा मानकों को एक आधुनिक ढांचे में लाती है।
हालांकि विपक्ष और 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने इन संहिताओं को श्रमिक विरोधी और कॉरपोरेट समर्थक बताते हुए आरोप लगाया है कि ये 'हायर एंड फायर' नीति को बढ़ावा देती हैं, यूनियन अधिकारों को सीमित करती हैं और सामाजिक सुरक्षा को कमजोर करती हैं।
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विधायी एकीकरण केवल शुरुआत :विधि आयोग
राणा ने कहा कि विधायी एकीकरण केवल शुरुआत है। इन कानूनों की सफलता राज्यों में समन्वित क्रियान्वयन और उद्यमों को लचीलापन देने के साथ श्रमिकों की सुरक्षा के संतुलन पर निर्भर करेगी। श्रम मंत्रालय द्वारा हाल ही में नियोक्ताओं के अनुपालन संबंधी ढांचे की रूपरेखा भी जारी की गई है। उन्होंने कहा कि असली परीक्षा यह होगी कि क्या ये सुधार व्यवहार में प्रभावी और विश्वसनीय श्रमिक संरक्षण सुनिश्चित कर पाते हैं।
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