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Explainer: क्या है भारत पर 100% तक टैरिफ की मंजूरी देने वाला अमेरिकी विधेयक, हम पर इसका कैसा होगा असर?
Sat, 08 Aug 2026 03:27 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 08 Aug 2026 03:27 PM IST
सार
अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने वाले लिंडसे ओ ग्राहम विधेयक को मंजूरी दे दी है। जानिए क्या है यह विधेयक, इससे भारत के निर्यात पर क्या असर पड़ेगा और क्या मोदी सरकार रूस से तेल खरीद कम करेगी?
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डोनाल्ड ट्रंप, पीएम मोदी, व्लादिमीर पुतिन।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अमेरिकी संसद के उच्च सदन- सीनेट में शुक्रवार को उस विधेयक को पारित कर दिया गया, जिसके तहत रूस से तेल और अन्य उत्पाद खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाया जा सकता है। इस विधेयक के जरिए यह फैसला करने की ताकत अमेरिकी राष्ट्रपति को मिलेगी कि भारत और चीन जैसे रूस के तेल-गैस के खरीदार देशों के उत्पादों पर कितना आयात शुल्क लगाया जाएगा।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर जिस विधेयक को अमेरिकी सीनेट में मंजूरी मिली है, वह क्या है? इसमें किन-किन प्रतिबंधों का जिक्र किया गया है? भारत इससे किस तरह प्रभावित हो सकता है? खुद अमेरिका में इस विधेयक को लेकर क्या विवाद हैं और इसकी आगे की राह मुश्किल क्यों है? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर जिस विधेयक को अमेरिकी सीनेट में मंजूरी मिली है, वह क्या है? इसमें किन-किन प्रतिबंधों का जिक्र किया गया है? भारत इससे किस तरह प्रभावित हो सकता है? खुद अमेरिका में इस विधेयक को लेकर क्या विवाद हैं और इसकी आगे की राह मुश्किल क्यों है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- क्या है वह विधेयक, जिसे अमेरिकी सीनेट में मंजूरी मिली?
अमेरिकी संसद में शुक्रवार को जो विधेयक पेश किया गया, उसका नाम ट्रंप के पूर्व करीबी और दिवंगत रिपब्लिकन सांसद लिंडसे ओ ग्राहम के नाम पर रखा गया है, जो कि इस बिल के रचयिता भी थे। इसे लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्स ऑफ 2026 नाम से पेश किया गया। अमेरिकी सीनेट ने इसे बहुमत से पारित किया। इसके पक्ष में 86 वोट और विपक्ष में महज 11 वोट पड़े।- अमेरिका का तर्क है कि इस विधेयक के कानून बनने के बाद रूस को दूसरे देशों से उसके तेल-उत्पादों के एवज में जो आर्थिक मदद मिल रही है, उस पर रोक लगाई जा सकती है। इससे रूस पर यूक्रेन के खिलाफ युद्ध रोकने का दबाव बनेगा।
- इतना ही नहीं, इस विधेयक के जरिए ईरान से तेल खरीदने वाले देशों को भी निशाना बनाने का प्रावधान रखा गया है, ताकि ईरान को अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने लायक मदद मिलना मुश्किल हो जाए।
- विधेयक में रूस-ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की शक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति को देने का प्रावधान है। यानी ट्रंप यह फैसला करने के लिए स्वतंत्र होंगे कि किस देश पर 0 से लेकर 100% के बीच कितना आयात शुल्क लगाया जाएगा।
ये भी पढ़ें: ट्रंप को मिली ताकत: रूस-ईरान से तेल खरीद पर भारत पर 100% टैरिफ का खतरा, क्या है US के सांसदों की नई रणनीति?
विधेयक में किन-किन पाबंदियों का जिक्र?
अमेरिकी सीनेट की तरफ से पारित लिंडसे ओ ग्राहम विधेयक में रूस, ईरान और उनके साथ व्यापार करने वाले देशों पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंधों और पाबंदियों का प्रस्ताव रखा गया है।- यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों से आने वाले सामानों पर 100% तक का शुल्क लगाने का अधिकार देता है, जो रूसी तेल-गैस के शीर्ष पांच खरीदारों में शामिल हैं, जैसे भारत और चीन। इसके जरिए अमेरिका उन सहयोगी और तटस्थ देशों को रूस-ईरान की सस्ती ऊर्जा और अमेरिकी बाजार में से एक को चुनने को मजबूर कर सकता है।
- रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, वरिष्ठ राजनीतिक-सैन्य अधिकारियों और रूसी रक्षा उद्योग के साथ काम करने वाली 20 से ज्यादा कंपनियों और संस्थाओं के खिलाफ प्रतिबंधों का प्रस्ताव है। इसके अलावा रूस के यूक्रेन के खिलाफ युद्ध से जुड़े वित्तीय संस्थानों और ऊर्जा परियोजनाओं को भी निशाना बनाने का प्रस्ताव विधेयक में शामिल है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने और तेल निर्यात से कमाई करने के लिए रूस की तरफ से इस्तेमाल किए जाने वाले पुराने, और झंडे बदलकर समुद्र में परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाला तेल टैंकरों पर भी पाबंदी लगाई जा सकती हैं। रूसी शैडो फ्लीट से जुड़ी शिपिंग कंपनियों, बीमाकर्ताओं और जहाजों पर परोक्ष रूप से प्रतिबंध लगाने का भी प्रावधान है।
- विधेयक में ईरान के खिलाफ भी कड़े कदम शामिल हैं। इसके तहत ईरान प्रतिबंध अधिनियम 1996 को 2031 तक बढ़ाने और ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बनाए रखने का प्रावधान है। साथ ही, ईरानी तेल खरीदने वाले देशों, जैसे- चीन पर भी भारी आयात शुल्क लगाने की शक्तियों का विस्तार करने की बात कही गई है।
अमेरिका का नया विधेयक अगर कानून बना तो कई देशों को होगा नुकसान।
- फोटो : AI
अगर विधेयक कानून बना तो भारत किस तरह प्रभावित होगा?
फिलहाल यह विधेयक सीनेट में पारित हुआ है और अब इसकी परीक्षा अमेरिकी संसद के निचले सदन- हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में होनी है। हालांकि, अगर यह विधेयक कानून का रूप ले लेता है तो भारत के पास दो विकल्प होंगे। इनके आधार पर ही तय होगा कि देश के आगे की राह क्या होगी...1. रूस से तेल खरीदना जारी रखा तो...
- अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी तेल के शीर्ष खरीदारों पर 100% तक का आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का अधिकार मिलने से अमेरिकी आयातकों के लिए भारतीय सामान जबरदस्त रूप से महंगे हो सकते हैं। इससे भारत के निर्यात पर निर्भर क्षेत्र, जैसे कि फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयां), इंजीनियरिंग सामान, रसायन, टेक्सटाइल्स (कपड़ा), और ऑटो पार्ट्स के क्षेत्र पर सबसे बुरा असर पड़ेगा।
- अगर भारतीय उत्पाद बहुत महंगे हो जाते हैं तो अमेरिकी खरीदार अन्य देशों के वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की ओर रुख कर सकते हैं। नतीजतन भारतीय निर्यातकों को कमजोर मांग, मुनाफे में कमी का सामना करना पड़ सकता है या फिर बाजार में टिके रहने के लिए अतिरिक्त लागत का एक हिस्सा खुद ही बोझ के तौर पर उठाना पड़ सकता है।
- इस टैरिफ के चलते भारतीय कंपनियों को अपने निर्यात बाजारों को विविध बनाने की जरूरत होगी और इससे सरकार पर वॉशिंगटन के साथ नए सिरे से व्यापारिक बातचीत करने का दबाव भी बढ़ेगा।
2. रूस से तेल खरीदने पर कमी की तो...
इस विधेयक में एक अहम प्रावधान यह भी है कि अगर कोई देश रूस से अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का 15% से कम आयात करता है या रूस के कुल तेल-गैस निर्यात के 15% से कम आयात करता है और साथ ही अपनी निर्भरता कम करने के प्रयास दिखा रहा है, तो उसे इन शुल्कों से छूट मिल सकती है। इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति को अमेरिकी राष्ट्रीय हित में प्रतिबंधों या पाबंदियों में छूट देने का भी अधिकार दिया गया है।
ये भी पढ़ें: 'सरकार की विदेश नीति की नाकामी': अमेरिकी बिल को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरा; कांग्रेस और AAP ने क्या कहा?
इस विधेयक में एक अहम प्रावधान यह भी है कि अगर कोई देश रूस से अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का 15% से कम आयात करता है या रूस के कुल तेल-गैस निर्यात के 15% से कम आयात करता है और साथ ही अपनी निर्भरता कम करने के प्रयास दिखा रहा है, तो उसे इन शुल्कों से छूट मिल सकती है। इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति को अमेरिकी राष्ट्रीय हित में प्रतिबंधों या पाबंदियों में छूट देने का भी अधिकार दिया गया है।
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क्या रूस से सच में तेल-गैस की कमी घटा सकता है भारत?
- होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट के चलते भारत के लिए पश्चिम एशिया से तेल पाना मुश्किल हो गया है। इससे रूसी कच्चे तेल की अहमियत और बढ़ गई। अगर यह विधेयक कानून बनता है, तो भारत के सामने अपनी ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने और अमेरिकी शुल्कों के जोखिम को प्रबंधित करने के बीच एक बड़ा कठिन निर्णय होगा।
- भारत मौजूदा समय में अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूसी कच्चे तेल पर बहुत अधिक निर्भर है। जुलाई के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 55% रही है और यह पिछले तीन साल से 30% से ज्यादा बनी हुई है।
- रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति पूरी तरह बंद होने की संभावना कम है, लेकिन अगर भारत इस तेल के आयात में केवल एक-तिहाई (लगभग आठ लाख से 10 लाख बैरल प्रति दिन) की भी कटौती करता है तो इसे अन्य महंगे विकल्पों से बदलने के कारण भारत को सालाना 1 से 1.8 अरब डॉलर का अतिरिक्त वित्तीय भार उठाना पड़ेगा।
रूस से तेल खरीदने वाले प्रमुख देश।
- फोटो : अमर उजाला
- हालांकि, अगर ऐतिहासिक रूप से देखें तो भारत सिर्फ टैरिफ के दबाव में रूसी तेल खरीदना बंद नहीं करेगा। जब अगस्त 2025 में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर अतिरिक्त 25% आयात शुल्क लगाकर कुल टैरिफ 50 फीसदी पर पहुंचा दिया था, तब भी भारत ने रूसी तेल की खरीद जारी रखी थी।
- भारतीय रिफाइनरियों ने केवल तभी अपनी खरीद कम की थी जब अमेरिकी प्रतिबंध सीधे तौर पर रूसी तेल कंपनियों (जैसे लुकोइल और रोजनेफ्ट) पर लगाए गए थे। ऐसे में अगर प्रतिबंध सीधे कंपनियों पर लगते हैं तो भारत को इस संकट से निपटने के लिए फिर से अमेरिका से प्रतिबंधों में छूट के लिए कूटनीतिक बातचीत करनी पड़ सकती है।
इस विधेयक को लेकर अमेरिका में क्यों विवाद?
अमेरिका में लिंडसे ओ ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को लेकर घरेलू स्तर पर गहरा राजनीतिक और आर्थिक विवाद छिड़ा है। सीनेट में भले ही इस विधेयक को मंजूरी मिल गई है, लेकिन कई सांसदों, आलोचकों और व्यावसायिक संगठनों ने इस विधेयक के कुछ प्रावधानों पर गंभीर आपत्तियां उठाई हैं।1. राष्ट्रपति को असीमित टैरिफ शक्तियां देने पर मतभेद
इस विधेयक के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को दूसरे देशों पर दंडात्मक टैरिफ (आयात शुल्क) थोपने के असीमित अधिकार दिए जा रहे हैं, जिस पर सीनेटरों ने चिंता जताई है। राष्ट्रपति के इस अधिकार को सीमित करने के लिए रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल और डेमोक्रेट सीनेटर रॉन वाइडन की ओर से एक संशोधन भी लाया गया, हालांकि यह सीनेट में खारिज हो गया।
डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद राफेल वॉर्नाक
- फोटो : अमर उजाला
2. अमेरिकी उपभोक्ताओं और व्यवसायों पर महंगाई का बोझ
यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स जैसे शक्तिशाली व्यापारिक संगठनों और आलोचकों का तर्क है कि जब अमेरिका आयातित वस्तुओं पर 100% या उससे ज्यादा का शुल्क लगाएगा, तो अंततः उसका वित्तीय नुकसान अमेरिकी व्यवसायों और आम उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़ेगा। सीनेटर रॉन वाइडन ने आगाह किया कि अमेरिकी जनता पहले से ही महंगाई की वजह से आर्थिक तंगहाली के दौर से गुजर रही है और यह टैरिफ उनकी मुश्किलें और बढ़ा देगा।
3. ईरान पर टैरिफ जोड़ने को लेकर डेमोक्रेट्स की चिंता
राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देश पर विधेयक में संशोधन कर रूस के साथ-साथ ईरान के तेल खरीदारों- खासकर चीन पर भी टैरिफ लगाने की शक्तियों को शामिल किया गया है। विश्लेषक डेविड स्मिथ के मुताबिक, कई डेमोक्रेटिक सांसद इस बात से चिंतित हैं कि ईरान के तेल आयातकों पर टैरिफ की शक्तियों का विस्तार किस तरह किया जाएगा। वे चाहते हैं कि इन शक्तियों को केवल पारंपरिक प्रतिबंधों तक ही सीमित रखा जाए, न कि टैरिफ तक। इस नए बदलाव के कारण प्रतिनिधि सभा में विधेयक पर सहमति बनने में देरी होने की आशंका है।
यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स जैसे शक्तिशाली व्यापारिक संगठनों और आलोचकों का तर्क है कि जब अमेरिका आयातित वस्तुओं पर 100% या उससे ज्यादा का शुल्क लगाएगा, तो अंततः उसका वित्तीय नुकसान अमेरिकी व्यवसायों और आम उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़ेगा। सीनेटर रॉन वाइडन ने आगाह किया कि अमेरिकी जनता पहले से ही महंगाई की वजह से आर्थिक तंगहाली के दौर से गुजर रही है और यह टैरिफ उनकी मुश्किलें और बढ़ा देगा।
3. ईरान पर टैरिफ जोड़ने को लेकर डेमोक्रेट्स की चिंता
राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देश पर विधेयक में संशोधन कर रूस के साथ-साथ ईरान के तेल खरीदारों- खासकर चीन पर भी टैरिफ लगाने की शक्तियों को शामिल किया गया है। विश्लेषक डेविड स्मिथ के मुताबिक, कई डेमोक्रेटिक सांसद इस बात से चिंतित हैं कि ईरान के तेल आयातकों पर टैरिफ की शक्तियों का विस्तार किस तरह किया जाएगा। वे चाहते हैं कि इन शक्तियों को केवल पारंपरिक प्रतिबंधों तक ही सीमित रखा जाए, न कि टैरिफ तक। इस नए बदलाव के कारण प्रतिनिधि सभा में विधेयक पर सहमति बनने में देरी होने की आशंका है।
4. रणनीतिक सहयोगियों के साथ संबंध बिगड़ने का डर
सीनेटर मैगी हसन जैसी आलोचकों का तर्क है कि यह टैरिफ अमेरिकी सहयोगियों और रणनीतिक साझेदारों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। उदाहरण के लिए तुर्किये, जो एक नाटो सदस्य और अमेरिकी सहयोगी है। इसके अलावा ब्राजील और सिंगापुर जैसे देश रूसी तेल उत्पाद खरीदते हैं और उन पर इस तरह के दंडात्मक टैरिफ लगाने से अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
5. मध्यावधि चुनावों का डर
सीनेट से आगे बढ़ने के बाद विधेयक अभी प्रतिनिधि सभा के पास लंबित है। फिलहाल हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सांसद गर्मी की छुट्टियों पर हैं और अगस्त के अंत तक इसके वापस आने की उम्मीद है। इस छुट्टी के कारण विधायी चर्चा की शुरुआत में ही प्राकृतिक रूप से देरी हो रही है। दूसरी तरफ अमेरिका में कांग्रेस (संसद) के चुनाव नजदीक आ रहे हैं। चुनावी साल में राजनीतिक प्राथमिकताओं के बदलने और समय की कमी के कारण कई सांसदों का मानना है कि इस साल के अंत तक विधेयक को प्रतिनिधि सभा से अंतिम मंजूरी मिलना बेहद कठिन हो सकता है।
सीनेटर मैगी हसन जैसी आलोचकों का तर्क है कि यह टैरिफ अमेरिकी सहयोगियों और रणनीतिक साझेदारों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। उदाहरण के लिए तुर्किये, जो एक नाटो सदस्य और अमेरिकी सहयोगी है। इसके अलावा ब्राजील और सिंगापुर जैसे देश रूसी तेल उत्पाद खरीदते हैं और उन पर इस तरह के दंडात्मक टैरिफ लगाने से अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
5. मध्यावधि चुनावों का डर
सीनेट से आगे बढ़ने के बाद विधेयक अभी प्रतिनिधि सभा के पास लंबित है। फिलहाल हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सांसद गर्मी की छुट्टियों पर हैं और अगस्त के अंत तक इसके वापस आने की उम्मीद है। इस छुट्टी के कारण विधायी चर्चा की शुरुआत में ही प्राकृतिक रूप से देरी हो रही है। दूसरी तरफ अमेरिका में कांग्रेस (संसद) के चुनाव नजदीक आ रहे हैं। चुनावी साल में राजनीतिक प्राथमिकताओं के बदलने और समय की कमी के कारण कई सांसदों का मानना है कि इस साल के अंत तक विधेयक को प्रतिनिधि सभा से अंतिम मंजूरी मिलना बेहद कठिन हो सकता है।