Justice SK Kaul: 'विस्थापित कश्मीरी पंडितों के बारे में बहुत कम कहा गया क्योंकि...', जस्टिस कौल ने कही ये बात
Justice SK Kaul: उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि आतंकवाद से शांति भंग होने से पहले विभिन्न समुदायों के लोग एकता में रहते थे और वे यह समझने में असमर्थ हैं कि स्थिति धीरे-धीरे कैसे खराब हो गई।
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सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने शनिवार को कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर बात की। उन्होंने कहा कि घाटी में अलगाववादी उग्रवाद के आगमन के साथ ही विस्थापित हुए साढ़े चार लाख कश्मीरी पंडितों के बारे में बहुत कम कहा गया। शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वे इतने 'बड़े मतदाता' नहीं थे कि राजनीतिक दखल के लिए आमंत्रित कर सकें।
न्यायमूर्ति कौल पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य में अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को निरस्त करने के फैसले को बरकरार रखने वाली पीठ का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने 1980 के दशक से राज्य और गैर राज्य तत्वों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच और रिपोर्ट देने के लिए एक निष्पक्ष 'सत्य और सुलह आयोग' को गठित करने की सिफारिश की थी। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से शांति भंग होने से पहले विभिन्न समुदायों के लोग एकता में रहते थे और वे यह समझने में असमर्थ हैं कि स्थिति धीरे-धीरे कैसे खराब हो गई।
कौल खुद एक कश्मीरी पंडित हैं। उनका मानना है कि तीस साल से ज्यादा समय की बेलगाम हिंसा के बाद अब लोगों के लिए आगे बढ़ने का वक्त आ गया है। न्यायमूर्ति कौल ने शुक्रवार को एक इंटरव्यू में भारत मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के उस सर्वसम्मत फैसले के बारे में बात की, जिसमें जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के केंद्र के फैसले को बरकरार रखा गया था।
उन्होंने कहा, यह सर्वसम्मत फैसला था। जिसका मतलब है कि मह सभी ने सोचा होगा कि यह सही रास्ता है। निसंदेह प्रत्येक फैसला, खासतौर पर महत्वपूर्ण निर्ण वाद-विवाद पैदा करेगा। ऐसे लोग होंगे जो इसके खिलाफ अपना नजरिया सामने रखेंगे। यह वास्तव में मुझे प्रभावित नहीं करता है, क्योंकि यह फैसले पर एक राय है और हमें इसके बारे में अति-संवेदनशील नहीं होना चाहिए।
उन्होंने मुस्लिम बहुल राज्य में अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडित समुदाय के विस्थापन पर चुप्पी पर अफसोस जताया। न्यायमूर्ति कौल ने कहा, 'इससे पहले सुरक्षा संबंधी चिंताएं वास्तव में कोई समस्या नहीं थीं। लेकिन फिर पतन एक ऐसे चरण में पहुंच गया, जहां अपने ही देश के एक समुदाय के साढ़े चार लाख से ज्यादा लोग अपने स्थान से विस्थापित हो गए। मुझे लगता है कि इस बारे में बहुत कम कहा गया था।' उन्होंने कहा,'शायद वे मतदाता इतनी बड़ी संख्या में नहीं थे कि राजनीतिक दखल को आमंत्रित कर सकते थे। फिर स्थिति इस हद तक बिगड़ गई कि सेना को बुलाना पड़ा, क्योंकि देश की क्षेत्रीय अखंडता खतरे में पड़ रही थी।'
सत्य और सुलह आयोग गठित करने की सिफारिश के बारे में पूछे जाने पर न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि यह स्वीकार करने का 'अच्छा तरीका' है कि कुछ गलत हुआ है। उन्होंने कहा, 'सवाल यह है कि क्या हम इस मुद्दे से नहीं निपटते? क्या हम उस चीज को अभी भी लोगों को चोट पहुंचाने दें जहां यह दर्द होता है? मैंने सोचा कि यह स्वीकार करने का एक अच्छा तरीका था कि कुछ गलत हुआ है और वह गलत क्या था जो हुआ है। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आपको आगे बढ़ना चाहिए। 30 साल एक लंबा समय है। आपको आगे बढ़ना होगा।'
सेवानिवृत्ति के बाद सरकार पद संभालने को लेकर कही ये बात
पूर्व न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पद संभालने को लेकर बंटी राय के बीच उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कौल ने अपना विचार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को इस तरह के रोजगार की पेशकश की जाती है, उन्हें फैसला करने की अनुमति दी जानी चाहिए। न्यायमूर्ति कौल ने शुक्रवार ने कहा,'यह संवैधानिक अदालत के न्यायाधीश पर छोड़ दें कि वह क्या करना चाहते हैं।' उन्होंने कहा, 'दो तरह के पद हैं। एक न्यायाधिकरण हैं, जहां किसी को न्यायाधिकरणों का संचालन करना पड़ता है। लोग इस तरह के काम स्वीकार करते हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि यह इसी तरह का काम है।'
न्यायमूर्ति कौल की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की पीठ ने सितंबर 2023 में उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए इस तरह की जिम्मेदारी स्वीकार करने से पहले दो साल की अनिवार्य कूलिंग-ऑफ अवधि की मांग की गई थी। पीठ ने कहा था कि यह शीर्ष अदालत का काम नहीं है कि वह किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सेवानिवृत्ति के बाद की पेशकश स्वीकार करने से रोके या संसद को इस संबंध में एक विशिष्ट कानून बनाने का निर्देश दे। पीठ बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जिसने इस तरह की नियुक्तियों से स्वतंत्र न्यायपालिका पर पड़ने वाले असर पर चिंता जताई थी।
दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण पर भी बोले न्यायमूर्ति कौल
पूर्व न्यायाधीश कौल ने कहा है कि वायु प्रदूषण के मुद्दे को कभी-कभी 'राजनीतिक' मुद्दे के तौर पर लिया जाता है। लेकिन अदालतों को कार्यपालिका का काम नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें अपना काम करने के लिए मजबूर करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा वायु प्रदूषण से जुड़ा आदेश पारित करने के बाद संबंधित अधिकारियों द्वारा कई कदम उठाए गए थे। वायु प्रदूषण हर साल सर्दियों में दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को जाम कर देते हैं।
उन्होंने कहा, कई चीजें की गई हैं लेकिन हलवा का सबूत इसे खाने में निहित है। समस्या यह है कि इसे (वायु प्रदूषण को) कभी-कभी राजनीतिक मुद्दे के रूप में भी लिया जाता है। न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि केंद्र सरकार ने इस मुद्दे को देखने के लिए कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है और राज्यों सहित हितधारकों के साथ बैठकें की जा रही हैं। उन्होंने कहा,'मेरा मानना है कि अदालतों को कार्यपालिका का काम नहीं करना चाहिए बल्कि कार्यपालिका को वह करने के लिए प्रेरित करना चाहिए जो उसका काम है।'