SIR Fear: बंगाल में मां-बेटी ने खाया जहर, एसआईआर का फॉर्म न मिलने के डर से उठाया कदम; दोनों की हालत गंभीर
West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में एक महिला ने अपनी बेटी के साथ उस वक्त जहर खा लिया, जब उसे एसआईआर का फॉर्म नहीं मिला। महिला कई वर्षों से अपने मायके में रह रही थी। वहीं इस मामले में टीएमसी ने भाजपा पर आरोप लगाया कि एनआरसी, डिटेंशन सेंटर के जरिए लोगों में खौफ फैला रही है।
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एसआईआर का फॉर्म न मिलने पर उठाया कदम
मामले में महिला के पिता ने बताया कि जब पूरे परिवार को एसआईआर का फॉर्म मिला लेकिन उसकी बेटी को नहीं, तो वह बहुत घबरा गई। पिता ने बताया कि 'वह बार-बार कह रही थी कि उसके पास कोई दस्तावेज नहीं है, और उसे डर था कि कहीं उसे देश से बाहर न भेज दिया जाए। इसी डर और घबराहट में उसने जहर खा लिया और बेटी को भी दे दिया। परिवार के अनुसार, वह पिछले छह साल से अपने मायके में रह रही थी, क्योंकि पति से झगड़ा हो गया था। बीते कुछ दिनों से वह मानसिक रूप से बहुत परेशान थी।
स्थानीय विधायक ने भाजपा पर लगाया आरोप
धनियाखाली की तृणमूल कांग्रेस विधायक असीमा पात्रा ने इस घटना के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने हमला बोलते हुए कहा कि 'भाजपा नेताओं की तरफ से एनआरसी और डिटेंशन कैंप की बातें फैलाने से लोगों में डर पैदा हो रहा है। कुछ दिन पहले डांकोनी में भी इसी वजह से एक और आत्महत्या का मामला सामने आया था।'
तृणमूल कांग्रेस का आरोप
टीएमसी ने एक्स पर बयान जारी किया और कहा कि भाजपा की 'डर फैलाने की राजनीति' के कारण लोग अपनी जान दे रहे हैं। पार्टी ने हाल ही में बीरभूम के सैंथिया और दक्षिण 24 परगना के भांगड़ में हुई ऐसी ही दो आत्महत्याओं का भी जिक्र किया है। टीएमसी ने लिखा, 'गृह मंत्री ने खुद कहा है कि भाजपा का मिशन 'डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट' है। बंगाल के लोग पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं, वे इस देश के वैध नागरिक हैं। अब इन्हीं को अपने नागरिक होने का सबूत देना पड़ रहा है। डर और चिंता का माहौल जानलेवा बन चुका है।'
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पुलिस ने शुरू की मामले की जांच
पुलिस ने कहा कि मामले की जांच जारी है और परिवार से पूछताछ की जा रही है। यह घटना उस वक्त सामने आई है जब राज्य में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर भ्रम और अफवाहें तेजी से फैल रही हैं। कई जगह लोगों में एनआरसी और नागरिकता को लेकर डर देखा जा रहा है।
टीएमसी नेता कुणाल घोष ने कहा कि चुनाव आयोग बहुत ही कम समय सीमा के अंदर एसआईआर कर रहा है। जब 2002 में एसआईआर हुई थी, तो यह चुनावों के बाद की गई थी और पूरी प्रक्रिया में 2 साल से अधिक का समय लगा था। अब, भाजपा के दबाव में चुनाव आयोग की तरफ से की जा रही एसआईआर व्यवस्थित तरीके से नहीं की जा रही है।' वहीं केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने कहा कि 'चुनाव आयोग के नियम-कायदों में साफ तौर पर लिखा है कि बीएलओ घर-घर जाकर फॉर्म बांटेंगे। लेकिन कई जगहों पर बीएलओ ऐसा नहीं कर रहे हैं और कई जगहों पर बीएलओ के तृणमूल कांग्रेस के नेताओं से संबंध पाए गए हैं। कुछ बीएलओ तृणमूल कांग्रेस के डर से तृणमूल कांग्रेस के पार्टी दफ्तर से ही फॉर्म बांट रहे हैं। अगर ऐसा होगा, तो एसआईआर कैसे होगा?'
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वहीं पूर्व बर्धमान जिले में विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए चुनाव आयोग की तरफ से नियुक्त एक बूथ-स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) की ब्रेन स्ट्रोक के कारण मौत हो गई। इस मामले में मृतका के पति ने रविवार को दावा किया कि अप्रत्यक्ष रूप से काम के दबाव के कारण अत्यधिक मानसिक तनाव से उनकी पत्नी की मौत हुई है। जिले के अधिकारियों ने बताया कि नमिता हंसदा शनिवार देर रात मेमारी स्थित अपने घर पर 'बढ़ते काम के बोझ के कारण गंभीर तनाव' के कारण बेहोश हो गईं। उन्हें कालना उप-विभागीय अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
परिवार ने लगाया गंभीर आरोप
उनके पति माधव हंसदा ने कहा कि मेमारी के चक बलरामपुर इलाके में बूथ संख्या 278 के लिए बीएलओ के रूप में नियुक्त आईसीडीएस कार्यकर्ता नमिता 'निर्धारित समय में एसआईआर प्रक्रिया पूरी करने के लक्ष्य को पूरा करने को लेकर बहुत चिंतित थीं।' हालांकि, एक जिला अधिकारी ने स्पष्ट किया कि उनकी मृत्यु चिकित्सीय कारणों से हुई थी और उनकी एसआईआर ड्यूटी से इसका कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं हो सका। वोट कार्यकर्ता और बीएलओ एकता समूह के महासचिव स्वपन मंडल ने सीईओ मनोज अग्रवाल को एक पत्र लिखकर मानवीय आधार पर हंसदा के परिवार के निकटतम संबंधी को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने की मांग की।
वहीं नादिया जिले में एक 70 वर्षीय व्यक्ति की मौत हो गई। उसके परिवार का आरोप है कि राज्य में मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ी चिंता के कारण उसकी मौत हुई। मृतक की पहचान श्यामल कुमार साहा के रूप में हुई है। वह ताहिरपुर पुलिस स्टेशन के अंतर्गत कृष्णचकपुर मंडलपारा का निवासी था और एसआईआर की चिंता के कारण उसने खाना-पीना छोड़ दिया था। जानकारी के मुताबिक, मृतक एक फेरीवाला था।
वैध दस्तावेज होने के बावजूद भी डरा हुआ था बुजुर्ग
परिवार के सदस्यों ने दावा किया कि 2002 की मतदाता सूची में अपना नाम न होने की जानकारी मिलने के बाद से मृतक ने खाना-पीना छोड़ दिया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि उसके पास सभी वैध दस्तावेज थे। हमें इस मौत की जानकारी मिली है, लेकिन परिवार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। जांच से पता चला है कि साहा के पास मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड और संपत्ति के कागजात समेत सभी वैध दस्तावेज होने के बावजूद, मतदाता सूची के एसआईआर की घोषणा के बाद से वह डरा हुआ था। उनकी पत्नी ने कहा, 'वह मुश्किल से कुछ खा पाते थे और हमेशा चिंता में रहते थे।' इस मामले में स्थानीय तृणमूल कांग्रेस के नेता और पंचायत सदस्य साहा के परिवार से मुलाकात की है।