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Hindi News ›   India News ›   Who is Prof. V. Kamakoti? What Did Priyanka Gandhi Say That Led Vice-Chancellors to Write an Open Letter?

Explainer: कौन हैं प्रो. कामकोटि, प्रियंका गांधी ने ऐसा क्या कहा कि देशभर के कुलपतियों ने लिख दिया खुला पत्र?

Thu, 30 Jul 2026 08:08 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Thu, 30 Jul 2026 08:08 PM IST
सार

संसद में की गई एक टिप्पणी ने सियासत से लेकर शिक्षा जगत तक नई बहस छेड़ दी है। एक ओर प्रो. वी. कामकोटि के पुराने बयान को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी ओर देशभर के कुलपति और शिक्षाविद उनके समर्थन में खुला पत्र जारी कर संसद में गरिमापूर्ण और तथ्य आधारित बहस की वकालत कर रहे हैं। आइए पूरे विवाद को समझते हैं।

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Who is Prof. V. Kamakoti? What Did Priyanka Gandhi Say That Led Vice-Chancellors to Write an Open Letter?
छिड़ी बहस - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी की एक टिप्पणी से नया विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने बिना नाम लिए परिक्षा एजेंसियों में सुधार के लिए बनी हाईलेवल कमेटी के एक सदस्य को गोमूत्र एक्सपर्ट कहा, जिसे आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि की ओर इशारा माना गया। इसके बाद देशभर के 215 से अधिक कुलपतियों, पूर्व कुलपतियों और शिक्षाविदों ने खुला पत्र लिखकर इस टिप्पणी का विरोध किया है। 

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ऐसे में सवाल उठता है कि कौन हैं प्रो. वी. कामकोटि? अभी क्यों चर्चा में हैं? प्रियंका गांधी की टिप्पणी को प्रो. कामकोटि से क्यों जोड़ा गया? प्रो. कामकोटि के अलावा कमेटी में कौन-कौन है? देशभर के कुलपतियों ने पत्र क्यों लिखा? 

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कौन हैं प्रो. वी. कामकोटि?

  • प्रो. वी. कामकोटि  कंप्यूटर आर्किटेक्चर, सूचना सुरक्षा और वीएलएसआई डिजाइन के विशेषज्ञ हैं। 
  • वर्ष 2001 में वे आईआईटी मद्रास में फैकल्टी सदस्य के रूप में जुड़े और जनवरी 2022 में संस्थान के निदेशक बने। 
  • आईआईटी मद्रास में वे इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा समर्थित माइक्रोप्रोसेसर डेवलपमेंट प्रोग्राम और सूचना सुरक्षा शिक्षा एवं जागरूकता कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे हैं। 
  • वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य भी हैं। इसके अलावा वे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा गठित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टास्क फोर्स के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 
  • आईआईटी मद्रास में उन्होंने जेईई के चेयरमैन और औद्योगिक परामर्श एवं प्रायोजित अनुसंधान के एसोसिएट डीन जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी निभाई हैं। 

कामकोटि को भारत के पहले स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर 'SHAKTI' के विकास के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।  उन्हें विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सूचना सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें डीआरडीओ एकेडमिक एक्सीलेंस अवॉर्ड, इंडियन इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन टेक्नो विजनरी अवॉर्ड, अब्दुल कलाम टेक्नोलॉजी इनोवेशन नेशनल फेलोशिप, एसीसीएस लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड, आईबीएम फैकल्टी अवॉर्ड और वास्विक इंडस्ट्रियल रिसर्च अवॉर्ड शामिल हैं।

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प्रियंका ने क्या कहा था? - फोटो : Amar Ujala

अभी क्यों चर्चा में हैं?

लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने परीक्षा एजेंसियों में सुधार के लिए बनाई गई छह सदस्यीय हाई-पावर टास्क फोर्स पर सवाल उठाए। इसी दौरान उन्होंने बिना नाम लिए कहा कि "एक पूर्व आईबी प्रमुख, एक आईटी कंपनी के मालिक और एक गोमूत्र एक्सपर्ट शिक्षा व्यवस्था को कैसे समझेंगे?" हालांकि उन्होंने प्रो. वी. कामकोटि का नाम नहीं लिया, लेकिन इस टिप्पणी को व्यापक तौर पर उन्हीं की ओर इशारा माना गया। इसके बाद यह मामला राजनीतिक और शैक्षणिक दोनों स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।

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Who is Prof. V. Kamakoti? What Did Priyanka Gandhi Say That Led Vice-Chancellors to Write an Open Letter?
क्या था कामकोटि का बयान? - फोटो : Amar Ujala

प्रियंका गांधी की टिप्पणी को प्रो. कामकोटि से क्यों जोड़ा गया?

इसकी वजह प्रो. कामकोटि का पहले दिया गया एक बयान है। 15 जनवरी 2025 को चेन्नई में आयोजित 'गो संरक्षणशाला' कार्यक्रम में उन्होंने गोमूत्र के कथित औषधीय गुणों का जिक्र किया था। उन्होंने एक संन्यासी का उदाहरण देते हुए कहा था कि गोमूत्र पीने के कुछ ही मिनट बाद उनका बुखार उतर गया। उन्होंने यह भी कहा था कि गोमूत्र एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल गुणों वाला है और पाचन संबंधी समस्याओं व इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS) जैसी परेशानियों में उपयोगी हो सकता है। उनके इस बयान की विपक्षी दलों और तर्कवादी संगठनों ने आलोचना की थी। इसी पुराने बयान के कारण प्रियंका गांधी की टिप्पणी को प्रो. कामकोटि से जोड़कर देखा गया।

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हाई पावर्ड टास्क फोर्स - फोटो : Amar Ujala

प्रो. कामकोटि के अलावा कमेटी में कौन-कौन है?

पेपर लीक और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में धांधली के आरोपों के बाद केंद्र सरकार ने परिक्षा एजेंसियों में सुधार के लिए छह सदस्यीय हाई-पावर टास्क फोर्स बनाई। समिति में शामिल सदस्य हैं;

  • नंदन नीलेकणि: आईटी कंपनी इंफोसिस के सह-संस्थापक हैं और भारत की आधार परियोजना को लागू करने वाली संस्था UIDAI के पहले अध्यक्ष रह चुके हैं। 
  • एस. सोमनाथ: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के पूर्व चेयरमैन हैं। चंद्रयान-3 मिशन की ऐतिहासिक सफलता के दौरान उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई थी।  
  • तपन डेका: देश के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों में गिने जाते हैं। वे इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के पूर्व निदेशक रहे हैं और लंबे समय तक आंतरिक सुरक्षा तथा आतंकवाद विरोधी अभियानों से जुड़े रहे। 
  • वी. कामकोटि: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के निदेशक हैं। वे कंप्यूटर साइंस और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ हैं।  
  • अनीता करवाल: भारत सरकार में पूर्व शिक्षा सचिव रह चुकी हैं। उन्होंने स्कूल शिक्षा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति और विभिन्न सरकारी योजनाओं को लागू करने में अहम भूमिका निभाई है।  
  • अमृत लाल मीणा: वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं, जिनके पास प्रशासन और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में लंबा अनुभव है। केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं।

देशभर के कुलपतियों ने पत्र क्यों लिखा?

प्रियंका गांधी की टिप्पणी के बाद देशभर के 215 से अधिक कुलपतियों, पूर्व कुलपतियों और शिक्षाविदों ने 30 जुलाई को संयुक्त रूप से एक खुला पत्र जारी किया। उन्होंने कहा कि किसी विद्वान के विचारों पर बहस करने के बजाय उसे किसी विशेष उपनाम या व्यंग्य से संबोधित करना वैज्ञानिक सोच और स्वस्थ सार्वजनिक संवाद को कमजोर करता है। उनका कहना था कि ऐसी टिप्पणी केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे शैक्षणिक और वैज्ञानिक समुदाय का अपमान है।

पत्र में क्या-क्या कहा गया?

1. संसद की गरिमा पर जोर
पत्र में कहा गया कि संसद हमेशा ऐसा मंच रहा है, जहां विचारों पर गंभीर चर्चा होती है, मतभेद गरिमा के साथ रखे जाते हैं और किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके तर्कों के आधार पर किया जाता है, न कि व्यंग्य या कटाक्ष से।

2. प्रियंका गांधी की टिप्पणी पर आपत्ति
पत्र में कहा गया कि प्रियंका गांधी ने प्रो. वी. कामकोटि के लिए कथित तौर पर "गोमूत्र एक्सपर्ट" शब्द का इस्तेमाल किया। चाहे यह राजनीतिक टिप्पणी रही हो या व्यंग्य, लेकिन इससे पूरे शैक्षणिक और वैज्ञानिक समुदाय के बारे में गलत संदेश जाता है।

3. प्रो. कामकोटि की उपलब्धियों का उल्लेख
पत्र में कहा गया कि प्रो. कामकोटि आईआईटी मद्रास के निदेशक हैं। उन्होंने आईआईटी मद्रास से एमएस और पीएचडी की है। उनके 150 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं और वे 50 से ज्यादा अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं। उन्हें डीआरडीओ एकेडमिक एक्सीलेंस अवॉर्ड और इंडियन इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन टेक्नो विजनरी अवॉर्ड सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। पत्र में यह भी कहा गया कि भारत के पहले इंडस्ट्री-ग्रेड माइक्रोप्रोसेसर के विकास में उन्होंने महत्वपूर्ण मार्गदर्शक भूमिका निभाई।

4. वैज्ञानिक सोच पर क्या कहा गया?
पत्र में कहा गया कि हर शिक्षाविद को अपने शोध, परिकल्पना और पारंपरिक ज्ञान पर चर्चा करने का अधिकार है। किसी विद्वान के तर्कों पर चर्चा करने के बजाय उसे किसी पहचान से जोड़कर खारिज करना संविधान में निहित वैज्ञानिक सोच की भावना के विपरीत है।

पत्र में यह भी कहा गया कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब केवल किसी असामान्य विचार पर संदेह करना नहीं, बल्कि हर दावे का निष्पक्ष मूल्यांकन करना भी है। इतिहास में कई ऐसे विचार रहे हैं जिन्हें पहले गलत माना गया, लेकिन बाद में उनके वैज्ञानिक आधार सामने आए। वहीं कई स्थापित मान्यताएं समय के साथ गलत भी साबित हुईं।

5. शिक्षकों और वैज्ञानिकों को लेकर चिंता
पत्र में कहा गया कि ऐसी टिप्पणियां वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं के लिए चिंता का विषय हैं। यदि किसी के विचारों से असहमति है तो उसके तथ्यों और प्रमाणों को चुनौती दी जानी चाहिए, लेकिन उसके शैक्षणिक योगदान को कमतर नहीं आंका जाना चाहिए। लोकतंत्र में मतभेद जरूरी हैं, लेकिन उपहास किसी भी तर्कपूर्ण बहस का विकल्प नहीं हो सकता।

6. अंत में क्या अपील की गई?
पत्र के अंत में कहा गया कि संसद और सार्वजनिक मंचों पर होने वाली बहसें गरिमा, तर्क और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। जब वैज्ञानिक विषय राजनीतिक उपहास का माध्यम बन जाते हैं, तो समाज तथ्य आधारित चर्चा का अवसर खो देता है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने उम्मीद जताई कि भविष्य में संसदीय बहसें इन्हीं मूल्यों के अनुरूप होंगी।

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