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Explainer: राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में क्यों कहां-कहां हुई प्रसूताओं की मौत, क्या कर रही है सरकार?

Tue, 14 Jul 2026 04:47 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Tue, 14 Jul 2026 04:47 PM IST
सार

राजस्थान के अलग-अलग सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की लगातार हो रही मौतों ने मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हर मामले के बाद जांच के आदेश दिए गए हैं और कई मामलों में कार्रवाई भी हुई है, लेकिन इन घटनाओं ने सरकारी अस्पतालों में प्रसव के दौरान और उसके बाद मिलने वाली चिकित्सा व्यवस्था, निगरानी और आपातकालीन देखभाल पर नई बहस छेड़ दी है।

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Why Have Maternal Deaths Been Reported Across Rajasthan's Government Hospitals? What Is the Govt Doing?
राजस्थान में प्रसूताओं की मौत - फोटो : Ai

विस्तार

राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में पिछले कुछ वक्त से प्रसूताओं की मौत के कई मामले सामने आए हैं। कोटा, बीकानेर, नागौर, डीडवाना, जोधपुर और अब भीलवाड़ा व बांसवाड़ा तक ऐसी घटनाएं हुई हैं। हर मामले के बाद जांच के आदेश दिए गए, लेकिन लगातार सामने आ रही घटनाओं ने सरकारी अस्पतालों की मातृ स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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हाल के दिनों में कहां-कहां प्रसूताओं की मौत के मामले सामने आए? इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई है? इन मौतों पर अस्पतालों और सरकार का क्या कहना है? पीड़ित परिवारवालों ने क्या आरोप लगाए हैं? 

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सबसे ताजा मामला कहां का है?

ताजा मामला भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल स्थित मातृ एवं शिशु चिकित्सालय (MCH) का है। यहां 5 जुलाई से 10 जुलाई के बीच छह दिन में पांच प्रसूताओं की मौत हो गई। मृतकों में शिमला गुर्जर, फोरी देवी, ईशा पांडे, दिव्या और संगीता जीनगर शामिल हैं। सभी महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी हुई थी और तबीयत बिगड़ने पर उन्हें मेडिकल आईसीयू में भर्ती कराया गया था। भीलवाड़ा में मार्च से जुलाई के बीच नौ प्रसूताओं की जान जा चुकी है।

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इसी दौरान बांसवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में भी दो घंटे के भीतर दो प्रसूताओं की मौत हो गई। 21 वर्षीय लक्ष्मी और 32 वर्षीय लीला ने पहली बार बच्चों को जन्म दिया था। प्रसव के 24 घंटे के भीतर दोनों की मौत हो गई, जबकि दोनों नवजात सुरक्षित हैं।

Why Have Maternal Deaths Been Reported Across Rajasthan's Government Hospitals? What Is the Govt Doing?
कहां-क्या हुआ? - फोटो : Amar Ujala

अब तक कहां क्या हुआ?

कोटा: सिजेरियन डिलीवरी के बाद पांच महिलाओं की मौत हुई। बाद में पांच अन्य महिलाओं की किडनी खराब होने का आरोप भी सामने आया।

बीकानेर: पीबीएम अस्पताल में डिलीवरी के बाद छह महिलाओं की तबीयत बिगड़ी। इलाज के दौरान शारदा नायक और प्रीति नायक की मौत हो गई।

नागौर: सामान्य प्रसव के बाद रुकमा देवी मेघवाल की मौत हुई। परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया।

डीडवाना: राजकीय बांगड़ जिला अस्पताल में प्रसव के दौरान 22 वर्षीय मोनिका और उसके गर्भस्थ शिशु की मौत हो गई।

जोधपुर: पावटा जिला अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद आठ महिलाओं की तबीयत अचानक बिगड़ गई। अस्पताल ने सभी का उपचार शुरू किया।

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प्रसूताओं की मौत - फोटो : Amar Ujala

अस्पतालों का क्या कहना है?

स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रशासन का कहना है कि अधिकांश मरीज पहले से ही गंभीर अवस्था में रेफर होकर आते हैं। भीलवाड़ा मामले में शुरुआत में ऑपरेशन थिएटर (OT) में संक्रमण की आशंका जताई गई थी। हालांकि, राज्य सरकार की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में संक्रमण को मौतों का कारण नहीं माना गया। रिपोर्ट के अनुसार अलग-अलग महिलाओं की मौत हार्ट अटैक, हाइपोवोलेमिक शॉक, पल्मोनरी थ्रोम्बोएम्बोलिज्म, हेल्प सिंड्रोम और प्रसवोत्तर अत्यधिक रक्तस्राव जैसी चिकित्सीय जटिलताओं से हुई। बांसवाड़ा अस्पताल प्रशासन का कहना है कि लक्ष्मी की मौत गंभीर एनीमिया और लीला की मौत का संभावित कारण उच्च रक्तचाप था।

कोटा मामले में एसएमएस मेडिकल कॉलेज जयपुर, एम्स दिल्ली और कोटा मेडिकल कॉलेज की जांच समितियों ने अपनी रिपोर्ट में अलग-अलग मामलों में पल्मोनरी एम्बोलिज्म, सेप्टीसीमिया व मल्टी ऑर्गन फेल्योर, गर्भाशय संक्रमण, पहले से मौजूद हृदय रोग और प्रसवोत्तर अत्यधिक रक्तस्राव को मौत का कारण बताया।

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सरकार ने क्या कहा? - फोटो : Amar Ujala

सरकार का क्या कहना है?

स्वास्थ्य मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर ने कहा है कि सरकार इन घटनाओं को बेहद गंभीरता से ले रही है। विशेषज्ञ टीम उपचार प्रक्रिया, दवाओं की गुणवत्ता, ऑपरेशन थिएटर की स्थिति, संक्रमण नियंत्रण, उपकरणों और मॉनिटरिंग व्यवस्था सहित सभी पहलुओं की वैज्ञानिक जांच करेगी। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे और अगर किसी स्तर पर लापरवाही पाई गई तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

परिजनों का क्या आरोप है?

नागौर में जून में राजकीय अस्पताल स्थित मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य केंद्र में सामान्य प्रसव के बाद रुकमा देवी मेघवाल की मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि सीने में दर्द और अन्य शिकायतों के बावजूद समय पर उचित इलाज नहीं मिला। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही स्वास्थ्य मंत्री ने मौत का कारण हार्ट फेल कैसे बता दिया। वहीं, चित्तौड़गढ़ में प्रसव के दौरान प्रसूता और नवजात की मौत के बाद परिजनों ने डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगाया।

कोटा मामले में परिजनों ने अस्पताल की लापरवाही और कथित नकली दवाओं के कारण पांच महिलाओं की दोनों किडनी खराब होने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि सभी महिलाएं करीब 70 दिनों से डायलिसिस पर हैं। परिवारों ने सरकार से किडनी ट्रांसप्लांट कराने की मांग करते हुए जिला कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा है।

अब तक क्या कार्रवाई हुई?

  • भीलवाड़ा में विशेषज्ञ जांच टीम गठित कर उपचार प्रक्रिया, दवाओं की गुणवत्ता, ऑपरेशन थिएटर, संक्रमण नियंत्रण और मॉनिटरिंग व्यवस्था की जांच शुरू कर दी गई है। अस्पताल के पीएमओ डॉ. राजीव गौतम ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन दिया है।
  • बांसवाड़ा में पांच सदस्यीय चिकित्सकीय समिति जांच कर रही है।
  • कोटा में एसएमएस मेडिकल कॉलेज जयपुर, एम्स दिल्ली और कोटा मेडिकल कॉलेज की जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी जा चुकी है। इसके अलावा वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों से भी अलग जांच कराने का निर्णय लिया गया। कार्रवाई के तहत सह आचार्य डॉ. नवनीत कुमार को निलंबित किया गया। यूटीबी पर कार्यरत सहायक आचार्य डॉ. श्रद्धा उपाध्याय को सेवा से बर्खास्त किया गया। सीनियर नर्सिंग अधिकारी गुरजौत कौर और नर्सिंग अधिकारी निमेश वर्मा को निलंबित कर जयपुर मुख्यालय से अटैच किया गया।

Why Have Maternal Deaths Been Reported Across Rajasthan's Government Hospitals? What Is the Govt Doing?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े - फोटो : Amar Ujala

राजस्थान में मातृ स्वास्थ्य की तस्वीर क्या कहती है?

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2020-21) के अनुसार, राजस्थान में मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) 95 है। यानी राज्य में हर एक लाख जीवित जन्म पर औसतन 95 महिलाओं की मौत गर्भावस्था, प्रसव या प्रसव के 42 दिन के भीतर हो जाती है। यह राष्ट्रीय औसत 88 से अधिक है, जबकि 2030 तक इसे 70 से नीचे लाने का लक्ष्य रखा गया है।

राज्य में 76.3% महिलाओं की गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में पहली एएनसी जांच होती है, लेकिन कम से कम चार बार जरूरी जांच केवल 55.3% महिलाओं की ही हो पाती है। गर्भावस्था के दौरान 100 दिन या उससे अधिक आयरन-फोलिक एसिड (IFA) की गोलियां लेने वाली महिलाओं की संख्या 33.9% और 180 दिन तक लेने वाली महिलाओं की संख्या केवल 14.4% है। वहीं 46.3% गर्भवती महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं।

हालांकि 94.9% प्रसव अस्पतालों में, 77% सरकारी अस्पतालों में और 95.6% प्रसव प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की निगरानी में होते हैं। इसके बावजूद लगातार सामने आ रही घटनाएं इस ओर संकेत करती हैं कि केवल संस्थागत प्रसव पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रसव के दौरान और उसके बाद गुणवत्ता वाली चिकित्सा, समय पर निगरानी और आपातकालीन देखभाल भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

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