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Bengal: 19 साल बाद कोलकाता लौटेंगी लेखिका तस्लीमा नसरीन, भाजपा सरकार आयोजित कराएगी 'कट्टरता विरोधी' कार्यक्रम
Tue, 14 Jul 2026 05:12 PM IST
Pavan
पीटीआई, कोलकाता
पीटीआई, कोलकाता
Published by: Pavan
Updated Tue, 14 Jul 2026 05:12 PM IST
सार
2007 में वामपंथी सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर तस्लीमा नसरीन को बाहर भेजा था, वहीं अब भाजपा सरकार उन्हें धार्मिक उग्रवाद के खिलाफ एक प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। 19 साल बाद वही शहर एक बार फिर उनके स्वागत के लिए तैयार है; लेकिन इस बार सरकार और राजनीतिक माहौल दोनों पूरी तरह बदल चुके हैं।
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तस्लीमा नसरीन, लेखिका
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
मशहूर और विवादित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन लगभग दो दशकों (19 साल) के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर कोलकाता वापस आ रही हैं। साल 2007 में उनके लेखन के खिलाफ हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें मजबूरी में यह शहर छोड़ना पड़ा था। अब अगले महीने वह कोलकाता में एक बड़े मंच पर नजर आएंगी। पश्चिम बंगाल में हाल ही में सत्ता में आई भाजपा सरकार इस घटनाक्रम को एक बड़ी राजनीतिक जीत और धार्मिक कट्टरपंथ के सामने न झुकने के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है।
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1 अगस्त को होगा कार्यक्रम
तस्लीमा नसरीन ने खुद सोशल मीडिया पर जानकारी दी है कि वह 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले एक 'कट्टरता विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम' में हिस्सा लेंगी। इस कार्यक्रम में वह अपनी कविताएं भी पढ़ेंगी। यह कार्यक्रम कई धर्मनिरपेक्ष और कट्टरता विरोधी संगठनों द्वारा मिलकर आयोजित किया जा रहा है। बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद इस आयोजन को अभिव्यक्ति की आजादी और धर्मनिरपेक्षता से जोड़कर देखा जा रहा है।
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पश्चिमबांगर जोन्नो संगठन और इस कार्यक्रम के आयोजक मोहित रॉय ने कहा- यह तस्लीमा नसरीन की शहर में वापसी का एक बड़ा उत्सव होगा। 2007 में तत्कालीन वामपंथ (लेफ्ट फ्रंट) सरकार ने कट्टरपंथी ताकतों के आगे घुटने टेक दिए थे और उन्हें शहर छोड़ने पर मजबूर किया था। लेकिन यह एक नया बंगाल है। खुद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी इस कार्यक्रम में शामिल होंगे। वहीं जब आयोजकों से पूछा गया कि क्या तस्लीमा अब हमेशा के लिए कोलकाता में रहेंगी, तो उन्होंने कहा कि फिलहाल इस बारे में कोई बातचीत नहीं हुई है।
राजनीतिक मायने और भाजपा का रुख
भाजपा के लिए तस्लीमा नसरीन की वापसी सिर्फ एक लेखिका का लौटना नहीं है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। उस समय तस्लीमा नसरीन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह राजनीतिक दलों के हाथों की फुटबॉल नहीं बनना चाहतीं। उन्हें सिर्फ शांति से साहित्य उत्सवों और पुस्तक मेलों में शामिल होने की अनुमति मिलनी चाहिए।
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क्यों छोड़ना पड़ा था तस्लीमा नसरीन को कोलकाता?
तस्लीमा नसरीन का विवादों और संघर्षों से पुराना नाता रहा है।
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1 अगस्त को होगा कार्यक्रम
तस्लीमा नसरीन ने खुद सोशल मीडिया पर जानकारी दी है कि वह 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले एक 'कट्टरता विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम' में हिस्सा लेंगी। इस कार्यक्रम में वह अपनी कविताएं भी पढ़ेंगी। यह कार्यक्रम कई धर्मनिरपेक्ष और कट्टरता विरोधी संगठनों द्वारा मिलकर आयोजित किया जा रहा है। बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद इस आयोजन को अभिव्यक्ति की आजादी और धर्मनिरपेक्षता से जोड़कर देखा जा रहा है।
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पश्चिमबांगर जोन्नो संगठन और इस कार्यक्रम के आयोजक मोहित रॉय ने कहा- यह तस्लीमा नसरीन की शहर में वापसी का एक बड़ा उत्सव होगा। 2007 में तत्कालीन वामपंथ (लेफ्ट फ्रंट) सरकार ने कट्टरपंथी ताकतों के आगे घुटने टेक दिए थे और उन्हें शहर छोड़ने पर मजबूर किया था। लेकिन यह एक नया बंगाल है। खुद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी इस कार्यक्रम में शामिल होंगे। वहीं जब आयोजकों से पूछा गया कि क्या तस्लीमा अब हमेशा के लिए कोलकाता में रहेंगी, तो उन्होंने कहा कि फिलहाल इस बारे में कोई बातचीत नहीं हुई है।
राजनीतिक मायने और भाजपा का रुख
भाजपा के लिए तस्लीमा नसरीन की वापसी सिर्फ एक लेखिका का लौटना नहीं है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। उस समय तस्लीमा नसरीन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह राजनीतिक दलों के हाथों की फुटबॉल नहीं बनना चाहतीं। उन्हें सिर्फ शांति से साहित्य उत्सवों और पुस्तक मेलों में शामिल होने की अनुमति मिलनी चाहिए।
- पुरानी सरकारों पर निशाना: भाजपा नेताओं का कहना है कि पिछली वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस सरकारों ने वोट बैंक की राजनीति के कारण तस्लीमा को कभी वापस नहीं आने दिया, जबकि वह लगातार कोलकाता आने की इच्छा जताती रही थीं।
- संसद में भी उठा था मुद्दा: पिछले साल भाजपा के राज्यसभा सांसद और बंगाल इकाई के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने संसद में केंद्र सरकार से तस्लीमा की वापसी का रास्ता साफ करने की मांग की थी। उन्होंने तस्लीमा को इस्लामिक कट्टरपंथ के खिलाफ एक मजबूत आवाज बताया था।
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क्यों छोड़ना पड़ा था तस्लीमा नसरीन को कोलकाता?
तस्लीमा नसरीन का विवादों और संघर्षों से पुराना नाता रहा है।
- 1994 में बांग्लादेश छोड़ा: 90 के दशक की शुरुआत में तस्लीमा ने धार्मिक कट्टरता और महिलाओं के अधिकारों पर खुलकर लिखा। उनके उपन्यास 'लज्जा' (जिसमें बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को दिखाया गया था) के प्रकाशन के बाद उनके खिलाफ मौत के फतवे जारी किए गए, जिसके कारण 1994 में उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा।
- 2004 में कोलकाता को बनाया घर: यूरोप और अमेरिका में करीब 10 साल बिताने के बाद वह 2004 में भारत आईं और कोलकाता में रहने लगीं। बंगाली भाषी होने के कारण वह इस शहर को अपना दूसरा घर मानती थीं।
- 2007 का हिंसक विरोध: साल 2007 में उनकी आत्मकथा 'द्विखंडितो' के कुछ हिस्सों को लेकर मुस्लिम संगठनों ने कोलकाता में भारी विरोध प्रदर्शन किया। हिंसा इतनी बढ़ गई कि शहर में सेना बुलानी पड़ी।
- शहर से बाहर निकाला गया: कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए बुद्धदेव भट्टाचार्य की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने तस्लीमा को कोलकाता छोड़ने के लिए कह दिया। उन्हें पहले जयपुर और फिर दिल्ली भेजा गया। तब से वह दिल्ली में ही रह रही हैं, जहां केंद्र सरकार उन्हें लंबी अवधि का रेजिडेंट परमिट देती आ रही है।