Explainer: क्या अल नीनो बढ़ाएगा किसानों की मुश्किलें, आपकी जेब पर कितना होगा असर, सरकार की तैयारी कैसी?
अल नीनो के असर को देखते हुए कृषि मंत्रालय ने देश के कई जिलों को सबसे संवेदनशील माना है। कमजोर मानसून की स्थिति में इन क्षेत्रों में खेती प्रभावित हो सकती है, जिससे फसल उत्पादन, किसानों की आय और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है। आइए विस्तार से जानते हैं।
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विस्तार
मौसम विभाग ने जून-सितंबर 2026 के मानसून कमजोर रहने का अनुमान जताया है। इसके चलते देश के 25 फीसदी हिस्से में सूखा पड़ने की आशंका है। इसका असर फसल उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। केंद्र सरकार सूखे से होने वाले नुकसान को कम करने की तैयारी में जुट गई है। इस कमजोर मानसून की वजह अल नीनो को बताया जा रहा है।
आखिर अल नीनो क्या है? सरकार की ओर से सूखे को लेकर क्या कहा गया है? मौसम विभाग ने मानसून को लेकर क्या अनुमान लगाया है? मौसम की मार का असर किन फसलों पर सबसे ज्यादा हो सकता है? कमजोर मानसून के चलते महंगाई को लेकर क्या अनुमान है? आइये जानते हैं...
अल नीनो है क्या?
- अल-नीनो एक स्पैनिश भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- लिटिल बॉय यानी छोटा लड़का। यह प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो हर दो से सात साल में होती है।
- एक बार अल-नीनो की स्थिति बनने के बाद इसका चक्र आमतौर पर नौ से 12 महीने तक चलता है।
- अल-नीनो की स्थिति तब रिकॉर्ड होती है, जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के केंद्रीय और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है।
- सामान्य स्थितियों में हवाएं समुद्र के गर्म पानी को पश्चिम की ओर (एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ) धकेलती हैं। पर अल-नीनो के दौरान, ये हवाएं कमजोर हो जाती हैं।
इसका क्या असर होता है?
- इस बदलाव का दुनिया भर के मौसम और वायुमंडल से जुड़ी प्रणालियों पर गहरा असर पड़ता है।
- इससे दुनिया के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ आती है, जबकि अन्य हिस्सों में गंभीर सूखा और अत्यधिक गर्मी का सामना करना पड़ता है।
- इसकी वजह से दुनिया के कई हिस्सों में जबरदस्त गर्मी और लू (हीटवेव) का खतरा बढ़ जाता है। अगर यह एक सुपर अल-नीनो में बदल जाता है, तो यह वैश्विक गर्मी के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ सकता है।
भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
- भारत में अल नीनो का संबंध कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून से जोड़ा जाता है। हालांकि हर अल नीनो वर्ष में सूखा नहीं पड़ता, लेकिन इतिहास बताता है कि देश के कई बड़े मानसूनी संकट इसी घटना के दौरान देखने को मिले हैं।
- कृषि मंत्रालय ने देशभर में 197 ऐसे जिलों की पहचान की है जिन पर अल नीनो का सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है।
- इन जिलों में सिंचाई सुविधाओं की पहुंच सीमित होने के कारण खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित होने की आशंका है।
सरकार ने क्या तैयारी की है?
कृषि मंत्रालय ने "खेत बचाओ अभियान" भी शुरू किया है, जिसके जरिए किसानों तक समय रहते मौसम संबंधी चेतावनियां, फसल प्रबंधन सलाह और वैकल्पिक कृषि उपाय पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। सरकार की कोशिश संकट आने के बाद राहत देने के बजाय पहले से तैयारी कर नुकसान को कम करना। इसके लिए प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग आकस्मिक योजना तैयार की गई हैं, ताकि बारिश की कमी या सूखे जैसी स्थिति बनने पर स्थानीय जरूरतों के अनुसार तुरंत कदम उठाए जा सकें।
अल नीनो की स्थिति की समीक्षा के लिए नियमित रूप से साप्ताहिक बैठकें की जा रही हैं। सरकार का दावा है कि खाद्य सुरक्षा को लेकर भी तैयारी की गई है। केंद्रीय वित्त मंत्री वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार देश में पर्याप्त खाद्यान्न बफर स्टॉक मौजूद है और अल नीनो के बावजूद खाद्य संकट की आशंका नहीं है। खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है, जबकि आगामी रबी सीजन के लिए उर्वरकों की आपूर्ति नवंबर से शुरू करने की योजना है।

मौसम विभाग का मानसून पूर्वानुमान क्या कहता है?
- भारतीय मौसम विभाग के नवीनतम दीर्घकालिक पूर्वानुमान के अनुसार जून से सितंबर 2026 के दौरान देशभर में मानसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह सामान्य से कम वर्षा का संकेत हैं।
- उत्तर-पश्चिम भारत, मध्य भारत और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में सामान्य से कम बारिश हो सकती है।
- मौसम विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि जून में देश के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है।
- कम बारिश और अधिक तापमान का यह संयोजन फसलों के लिए दोहरी चुनौती पैदा कर सकता है।

कृषि क्षेत्र पर सबसे बड़ा असर किन फसलों पर पड़ सकता है?
- अल नीनो का सबसे अधिक खतरा उन फसलों पर होता है जो शुरुआती मानसून पर निर्भर होती हैं। धान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
- भारत दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादकों में शामिल है और इसकी खेती बड़े पैमाने पर मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है।
- 2015 के अल नीनो के दौरान भारत में चावल उत्पादन में लगभग एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी।
- मक्का भी ऐसी फसल है जो पर्याप्त नमी और संतुलित तापमान की मांग करती है।
- 2015 में अल नीनो के दौरान भारत का मक्का उत्पादन लगभग चार प्रतिशत घट गया था।
- अगर इस बार भी बारिश की कमी और गर्मी का दबाव बना रहता है तो मक्का उत्पादक क्षेत्रों में उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
- कमजोर मानसून का असर अरहर, उड़द, मूंग, सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलों के उत्पादन लक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है।
संयुक्त राष्ट्र ने अल नीनो पर क्या कहा है?
- संयुक्त राष्ट्र की संस्था खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने भारत, पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में वर्षा आधारित खेती पर विशेष दबाव पड़ने की आशंका जाहिर की है।
- FAO का कहना है कि इस बार स्थिति पहले की तुलना में अधिक जटिल है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी पहले से अधिक गर्म हो चुकी है।
- FAO ने यह भी चेतावनी दी है कि कृषि पर पड़ने वाला असर केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा। इसके प्रभाव पशुपालन, ग्रामीण आय, खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कृषि बाजारों तक फैल सकते हैं।

महंगाई और अर्थव्यवस्था पर अल नीनो का क्या असर पड़ सकता है?
ब्रोकरेज फर्म प्रभुदास लीलाधर ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अल नीनो और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों के संयुक्त प्रभाव से वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही में महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक की छह प्रतिशत की ऊपरी सीमा को पार कर सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार अगर फसल उत्पादन प्रभावित होता है तो सबसे पहले खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। दालें, खाद्य तेल, सब्जियां और अनाज महंगे हो सकते हैं। इसका असर सीधे आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। पशुपालन क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहेगा। कम बारिश के कारण चारे की उपलब्धता घट सकती है, जिससे दूध उत्पादन और पशुधन आधारित आय प्रभावित हो सकती है।