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क्या बदल जाएगी 'उद्योग' की परिभाषा?: सुप्रीम कोर्ट ने 1978 पुराने फैसले पर उठाए सवाल, अब दोबारा करेगा समीक्षा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Tue, 17 Mar 2026 07:57 PM IST
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सार
उच्चतम न्यायालय में 'उद्योग' की परिभाषा पर चल रही यह सुनवाई देश के श्रम कानून और सार्वजनिक सेवाओं के वर्गीकरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1978 के फैसले की समीक्षा और वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में इसकी प्रासंगिकता का निर्धारण, भविष्य में कई संस्थाओं के कर्मचारियों के अधिकारों और कार्य-क्षेत्रों को परिभाषित करेगा।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ मंगलवार, 17 मार्च से 'उद्योग' शब्द की परिभाषा से जुड़े एक महत्वपूर्ण और दशकों पुराने मामले की सुनवाई कर रही है। यह मामला 1978 के एक ऐतिहासिक फैसले की कानूनी वैधता की जांच करेगा, जिसने 'उद्योग' की परिभाषा का विस्तार किया था और लाखों कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत सुरक्षा प्रदान की थी। इसके साथ ही कोर्ट यह तय करेगा कि सरकारी विभाग, अस्पताल, स्कूल और एनजीओ जैसी संस्थाएं 'उद्योग' की कैटेगरी में आएंगी या नहीं और उनपर श्रम कानून लागू होंगे या नहीं।
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क्या पूरा मामला और 1978 का फैसला?
यह मामला 1978 में सात न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए एक फैसले से उत्पन्न हुआ है, जिसने बंगलूरू जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड के मामले में 'उद्योग' शब्द की एक व्यापक व्याख्या प्रस्तुत की थी। इस व्याख्या के परिणामस्वरूप, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, क्लब और सरकारी कल्याणकारी विभागों जैसे विभिन्न क्षेत्रों के कर्मचारी भी औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के दायरे में आ गए थे।
नौ न्यायाधीशों की पीठ का कार्यक्षेत्र
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ का मुख्य उद्देश्य 1978 के फैसले की कानूनी शुद्धता का निर्धारण करना है। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया है कि वह 1982 के औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम या 2020 के औद्योगिक संबंध संहिता में 'उद्योग' शब्द की परिभाषा पर विचार नहीं करेगी, क्योंकि ये कानून या तो लागू नहीं हुए या भविष्य में अदालती चुनौती का सामना कर सकते हैं। पीठ का ध्यान विशेष रूप से 1978 के बंगलूरू मामले में दिए गए मूल प्रावधान की व्याख्या पर केंद्रित है।
'ट्रिपल टेस्ट' और उसकी व्यापकता
1978 के फैसले की सबसे महत्वपूर्ण देन जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर द्वारा प्रतिपादित 'ट्रिपल टेस्ट' है। इस टेस्ट के अनुसार, यदि किसी संगठन द्वारा एक व्यवस्थित गतिविधि की जाती है, जिसमें नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच सहयोग शामिल हो, और उसके परिणामस्वरूप वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता हो, तो उसे 'उद्योग' माना जा सकता है। इस व्यापक परिभाषा ने विभिन्न सार्वजनिक और गैर-लाभकारी संस्थाओं को भी श्रम कानूनों के तहत ला दिया, जिससे कई बार मुकदमेबाजी की बाढ़ आ गई।
यह भी पढ़ें - Supreme Court: मृतक के बैंक खातों की जानकारी वारिसों को देने में क्या दिक्कत? केंद्र और RBI से 'सुप्रीम' सवाल
वर्तमान परिदृश्य और चुनौतियां
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमनी ने पीठ के समक्ष तर्क देते हुए कहा कि 'उद्योग' की यह अति-समावेशी परिभाषा अदालती मामलों में वृद्धि का कारण बनी है और राज्य के संप्रभु तथा कल्याणकारी कार्यों को अनजाने में 'औद्योगिक' के रूप में वर्गीकृत कर रही है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने इस बात पर प्रकाश डाला कि 1978 का फैसला 1970 के दशक के समाजवादी युग का परिणाम था, जबकि आज हम उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के युग में जी रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या 'उद्योग' का दायरा उतना ही विस्तृत रहना चाहिए या संतुलन साधने की आवश्यकता है, खासकर जब राज्य के कई कार्य अब निजी क्षेत्र द्वारा किए जा रहे हैं। यह मामला न केवल श्रम कानूनों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों के संचालन की कानूनी स्थिति पर भी गहरा असर डालेगा। नौ न्यायाधीशों की पीठ की अगली सुनवाई बुधवार को जारी रहेगी, जहां इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर आगे विचार-विमर्श किया जाएगा।
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क्या पूरा मामला और 1978 का फैसला?
यह मामला 1978 में सात न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए एक फैसले से उत्पन्न हुआ है, जिसने बंगलूरू जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड के मामले में 'उद्योग' शब्द की एक व्यापक व्याख्या प्रस्तुत की थी। इस व्याख्या के परिणामस्वरूप, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, क्लब और सरकारी कल्याणकारी विभागों जैसे विभिन्न क्षेत्रों के कर्मचारी भी औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के दायरे में आ गए थे।
नौ न्यायाधीशों की पीठ का कार्यक्षेत्र
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ का मुख्य उद्देश्य 1978 के फैसले की कानूनी शुद्धता का निर्धारण करना है। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया है कि वह 1982 के औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम या 2020 के औद्योगिक संबंध संहिता में 'उद्योग' शब्द की परिभाषा पर विचार नहीं करेगी, क्योंकि ये कानून या तो लागू नहीं हुए या भविष्य में अदालती चुनौती का सामना कर सकते हैं। पीठ का ध्यान विशेष रूप से 1978 के बंगलूरू मामले में दिए गए मूल प्रावधान की व्याख्या पर केंद्रित है।
'ट्रिपल टेस्ट' और उसकी व्यापकता
1978 के फैसले की सबसे महत्वपूर्ण देन जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर द्वारा प्रतिपादित 'ट्रिपल टेस्ट' है। इस टेस्ट के अनुसार, यदि किसी संगठन द्वारा एक व्यवस्थित गतिविधि की जाती है, जिसमें नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच सहयोग शामिल हो, और उसके परिणामस्वरूप वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता हो, तो उसे 'उद्योग' माना जा सकता है। इस व्यापक परिभाषा ने विभिन्न सार्वजनिक और गैर-लाभकारी संस्थाओं को भी श्रम कानूनों के तहत ला दिया, जिससे कई बार मुकदमेबाजी की बाढ़ आ गई।
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वर्तमान परिदृश्य और चुनौतियां
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमनी ने पीठ के समक्ष तर्क देते हुए कहा कि 'उद्योग' की यह अति-समावेशी परिभाषा अदालती मामलों में वृद्धि का कारण बनी है और राज्य के संप्रभु तथा कल्याणकारी कार्यों को अनजाने में 'औद्योगिक' के रूप में वर्गीकृत कर रही है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने इस बात पर प्रकाश डाला कि 1978 का फैसला 1970 के दशक के समाजवादी युग का परिणाम था, जबकि आज हम उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के युग में जी रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या 'उद्योग' का दायरा उतना ही विस्तृत रहना चाहिए या संतुलन साधने की आवश्यकता है, खासकर जब राज्य के कई कार्य अब निजी क्षेत्र द्वारा किए जा रहे हैं। यह मामला न केवल श्रम कानूनों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों के संचालन की कानूनी स्थिति पर भी गहरा असर डालेगा। नौ न्यायाधीशों की पीठ की अगली सुनवाई बुधवार को जारी रहेगी, जहां इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर आगे विचार-विमर्श किया जाएगा।
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