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झारखंड: लिथियम बैटरियों को डिस्चार्ज करने की नई तकनीक, आईआईटी-आईएसएम की शोधार्थी को मिला पेटेंट
Sun, 18 Oct 2026 01:36 PM IST
प्रतीक पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: प्रतीक पांडेय
Updated Sun, 18 Oct 2026 01:36 PM IST
सार
धनबाद की शोधार्थी प्रतिमा कुमारी ने खराब लिथियम-आयन बैटरियों को सुरक्षित तरीके से डिस्चार्ज करने की तकनीक विकसित की है, जिसे भारत सरकार से पेटेंट मिल गया है। इस प्रक्रिया में बैटरी को पूरी तरह रासायनिक घोल में डुबोने के बजाय उसके टर्मिनलों को नमक के घोल में आंशिक रूप से डुबोकर अल्ट्रासोनिक तरंगों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे बैटरी रीसाइक्लिंग के दौरान होने वाले जोखिम और रासायनिक कचरे को कम करने में मदद मिल सकती है।
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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान धनबाद
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान धनबाद की शोधार्थी प्रतिमा कुमारी ने खराब लिथियम-आयन बैटरियों को सुरक्षित रूप से डिस्चार्ज करने की नई और अनोखी तकनीक विकसित की है। भारत सरकार ने इस तकनीक को पेटेंट प्रदान कर दिया है। डिजिटल क्रांति के इस दौर में मोबाइल फोन, लैपटॉप तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक कचरा भी पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
इस कचरे में मौजूद लिथियम-आयन बैटरियों की रीसाइक्लिंग बेहद खतरनाक मानी जाती है। बैटरियों में बचा हुआ शेष विद्युत चार्ज आग लगने या फिर विस्फोट का कारण बनता है। जमशेदपुर के कदमा क्षेत्र की निवासी प्रतिमा कुमारी की यह खोज इस गंभीर समस्या का बहुत ही सस्ता, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल समाधान प्रस्तुत करती है।
पारंपरिक तरीकों से अलग और नई तकनीक
खराब लिथियम-आयन बैटरियों के निस्तारण के पारंपरिक तरीकों में कई प्रकार की समस्याएं आती रही हैं। पुरानी प्रक्रियाओं के तहत खराब बैटरियों को पूरी तरह किसी रासायनिक या इलेक्ट्रोलाइट घोल में डुबोया जाता है। इस प्रक्रिया में बहुत अधिक मात्रा में तरल पदार्थ की खपत होती है। इसके अलावा पूरी बैटरी के रसायन घोल के भीतर घुलकर उसे अत्यंत जहरीला और दूषित बना देते हैं।
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इस दूषित पानी और घोल का सुरक्षित निस्तारण करना रीसाइक्लिंग संयंत्रों के लिए एक अलग ही बड़ी चुनौती बन जाता है। प्रतिमा कुमारी द्वारा विकसित नई तकनीक पारंपरिक तरीकों की इन कमियों को पूरी तरह दूर करती है। इस नई प्रणाली में बैटरी को किसी भी रासायनिक घोल में पूरी तरह डुबोने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं पड़ती है। इससे रसायनों के रिसाव तथा उनसे होने वाले प्रदूषण पर भी प्रभावी रोक लगती है।
अल्ट्रासोनिक तरंगों और नमक का उपयोग
आईआईटी आईएसएम धनबाद के पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर सुख रंजन समद्दर के कुशल मार्गदर्शन में यह शोध कार्य पूरा किया गया है। इस पेटेंट का आधिकारिक नाम 'प्रोसेस ऑफ डिस्चार्जिंग स्पेंट-लिथियम कोबाल्ट ऑक्साइड बैटरीज यूजिंग अल्ट्रासोनिक असिस्टेड पार्शियल इमर्शन मेथड' रखा गया है।
इस अनोखी प्रक्रिया में बैटरी को सीधे खड़ा रखकर उसके केवल धनात्मक और ऋणात्मक (पॉजिटिव और नेगेटिव) टर्मिनल वाले हिस्से को ही कम लागत वाले साधारण सोडियम क्लोराइड यानी नमक के घोल में आंशिक रूप से डुबोया जाता है। इसके पश्चात अल्ट्रासोनिक तरंगों की मदद ली जाती है। यह अल्ट्रासोनिक तरंगें बैटरी के भीतर बचे हुए विद्युत चार्ज को बेहद तेजी से और पूरी तरह सुरक्षित तरीके से समाप्त या डिस्चार्ज कर देती हैं।
पर्यावरण और रीसाइक्लिंग उद्योग को लाभ
यह नई तकनीक पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ रीसाइक्लिंग उद्योग के लिए भी एक बड़ी संजीवनी साबित हो सकती है। बैटरी को केवल आंशिक रूप से डुबोने के कारण जल और रसायनों की भारी बचत होती है। बैटरी का मुख्य ढांचा घोल के बाहर रहता है, जिससे जहरीले और हानिकारक रसायनों का रिसाव नहीं हो पाता है। इससे रीसाइक्लिंग प्रक्रिया के दौरान बहुत ही कम मात्रा में रासायनिक कचरा उत्पन्न होता है।
इसके साथ ही रीसाइक्लिंग संयंत्रों में कार्यरत श्रमिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। आग लगने या फिर रासायनिक रिसाव की घटनाएं न के बराबर रह जाती हैं। साधारण नमक एक सस्ता और आसानी से मिलने वाला पदार्थ है, जिसके कारण औद्योगिक स्तर पर इस तकनीक को लागू करना बहुत ही व्यावहारिक और किफायती है। प्रतिमा कुमारी ने अपने पारिवारिक तथा घरेलू दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए इस कठिन शोध को पूरा किया है। उनकी यह वैज्ञानिक सफलता पर्यावरण सुरक्षा और सर्कुलर इकॉनमी को बढ़ावा देने में एक मील का पत्थर साबित होगी।
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इस कचरे में मौजूद लिथियम-आयन बैटरियों की रीसाइक्लिंग बेहद खतरनाक मानी जाती है। बैटरियों में बचा हुआ शेष विद्युत चार्ज आग लगने या फिर विस्फोट का कारण बनता है। जमशेदपुर के कदमा क्षेत्र की निवासी प्रतिमा कुमारी की यह खोज इस गंभीर समस्या का बहुत ही सस्ता, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल समाधान प्रस्तुत करती है।
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पारंपरिक तरीकों से अलग और नई तकनीक
खराब लिथियम-आयन बैटरियों के निस्तारण के पारंपरिक तरीकों में कई प्रकार की समस्याएं आती रही हैं। पुरानी प्रक्रियाओं के तहत खराब बैटरियों को पूरी तरह किसी रासायनिक या इलेक्ट्रोलाइट घोल में डुबोया जाता है। इस प्रक्रिया में बहुत अधिक मात्रा में तरल पदार्थ की खपत होती है। इसके अलावा पूरी बैटरी के रसायन घोल के भीतर घुलकर उसे अत्यंत जहरीला और दूषित बना देते हैं।
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इस दूषित पानी और घोल का सुरक्षित निस्तारण करना रीसाइक्लिंग संयंत्रों के लिए एक अलग ही बड़ी चुनौती बन जाता है। प्रतिमा कुमारी द्वारा विकसित नई तकनीक पारंपरिक तरीकों की इन कमियों को पूरी तरह दूर करती है। इस नई प्रणाली में बैटरी को किसी भी रासायनिक घोल में पूरी तरह डुबोने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं पड़ती है। इससे रसायनों के रिसाव तथा उनसे होने वाले प्रदूषण पर भी प्रभावी रोक लगती है।
अल्ट्रासोनिक तरंगों और नमक का उपयोग
आईआईटी आईएसएम धनबाद के पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर सुख रंजन समद्दर के कुशल मार्गदर्शन में यह शोध कार्य पूरा किया गया है। इस पेटेंट का आधिकारिक नाम 'प्रोसेस ऑफ डिस्चार्जिंग स्पेंट-लिथियम कोबाल्ट ऑक्साइड बैटरीज यूजिंग अल्ट्रासोनिक असिस्टेड पार्शियल इमर्शन मेथड' रखा गया है।
इस अनोखी प्रक्रिया में बैटरी को सीधे खड़ा रखकर उसके केवल धनात्मक और ऋणात्मक (पॉजिटिव और नेगेटिव) टर्मिनल वाले हिस्से को ही कम लागत वाले साधारण सोडियम क्लोराइड यानी नमक के घोल में आंशिक रूप से डुबोया जाता है। इसके पश्चात अल्ट्रासोनिक तरंगों की मदद ली जाती है। यह अल्ट्रासोनिक तरंगें बैटरी के भीतर बचे हुए विद्युत चार्ज को बेहद तेजी से और पूरी तरह सुरक्षित तरीके से समाप्त या डिस्चार्ज कर देती हैं।
पर्यावरण और रीसाइक्लिंग उद्योग को लाभ
यह नई तकनीक पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ रीसाइक्लिंग उद्योग के लिए भी एक बड़ी संजीवनी साबित हो सकती है। बैटरी को केवल आंशिक रूप से डुबोने के कारण जल और रसायनों की भारी बचत होती है। बैटरी का मुख्य ढांचा घोल के बाहर रहता है, जिससे जहरीले और हानिकारक रसायनों का रिसाव नहीं हो पाता है। इससे रीसाइक्लिंग प्रक्रिया के दौरान बहुत ही कम मात्रा में रासायनिक कचरा उत्पन्न होता है।
इसके साथ ही रीसाइक्लिंग संयंत्रों में कार्यरत श्रमिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। आग लगने या फिर रासायनिक रिसाव की घटनाएं न के बराबर रह जाती हैं। साधारण नमक एक सस्ता और आसानी से मिलने वाला पदार्थ है, जिसके कारण औद्योगिक स्तर पर इस तकनीक को लागू करना बहुत ही व्यावहारिक और किफायती है। प्रतिमा कुमारी ने अपने पारिवारिक तथा घरेलू दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए इस कठिन शोध को पूरा किया है। उनकी यह वैज्ञानिक सफलता पर्यावरण सुरक्षा और सर्कुलर इकॉनमी को बढ़ावा देने में एक मील का पत्थर साबित होगी।