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MP News: बंटवारे के समय पाकिस्तान गए लोगों की जमीन पर अब इनका होगा कब्जा, हाईकोर्ट ने दिया अहम आदेश
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Wed, 18 Dec 2024 06:11 PM IST
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सार
MP High Court: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने विभाजन के दौरान छोड़ी गई "शत्रु भूमि" पर दशकों से काबिज किसानों को जमीन का असली हकदार माना, 2012 के रद्दीकरण को अवैध ठहराते हुए उनके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया।
ग्वालियर हाईकोर्ट का अहम आदेश
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने विभाजन के दौरान पाकिस्तान गए लोगों की जमीन पर कई दशकों से काबिज लोगों को ही जमीन का असली हकदार माना है। हाई कोर्ट ने 2009 में आवंटित सरकार के पूर्व फैसले को सही ठहराते हुए विदिशा कलेक्टर को निर्देशित किया है कि वे कई सालों से जमीन पर काबिज किसानों को जमीन का असली हकदार मानें और राजस्व रिकॉर्ड में उनके नाम अंकित करें।
खास बात यह है कि विदिशा जिले के गुलाबगंज तहसील के मुंगवारा में ऐसी करीब 100 एकड़ से ज्यादा जमीन है जो शत्रु भूमि मानी जाती है। हालांकि जमीन पर विभाजन के बाद स्थानीय लोगों ने कब्जा कर वहां खेती-बाड़ी शुरू कर दी थी। प्रदेश सरकार ने 1990 में स्थानीय किसानों को ही जमीन का असली हकदार माना था और उनके नाम जमीन का आवंटन कर दिया था, लेकिन इसके खिलाफ सरकार के 2005 के एक आदेश का हवाला देते हुए इन आवंटनों को 2012 में रद्द कर दिया था और कहा गया था कि 2009 में जो निष्कांत भूमि यानी शत्रु की जमीन का आवंटन किया गया था, वह कानून 2005 में केंद्र सरकार ने रद्द कर दिया था। इसलिए किसानों को जिस कानून के तहत कृषि भूमि आवंटित की गई थी उसे रद्द कर दिया गया।
इसे लेकर विदिशा जिले के गुलाबगंज तहसील के मुंगवारा गांव के करीब एक दर्जन किसानों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। किसानों के अधिवक्ता पवन रघुवंशी ने न्यायालय को बताया कि निरसन कानून 1954 इन प्रभावित किसानों पर लागू नहीं होता, क्योंकि यह कार्रवाई पहले से ही प्रचलनशील थी। इसलिए 2012 का आदेश सरकार का अवैध था। हाई कोर्ट ने भी किसानों के अधिवक्ता पवन रघुवंशी की दलील को सही माना और 2012 में निरस्त आवंटन को बहाल करने के निर्देश दिए।
एडवोकेट पवन रघुवंशी ने बताया कि विदिशा जिले में करीब निष्कांत भूमि करीब 100 एकड़ है, जो लोग विभाजन के समय देश छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों ही बिरादरी के लोग थे। बाद में स्थानीय लोगों ने इस शत्रु भूमि पर कब्जा कर वहां खेती-बाड़ी शुरू कर दी थी। हाई कोर्ट के इस आदेश से अब पूर्व से काबिज किसानों को बड़ी राहत मिली है।
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खास बात यह है कि विदिशा जिले के गुलाबगंज तहसील के मुंगवारा में ऐसी करीब 100 एकड़ से ज्यादा जमीन है जो शत्रु भूमि मानी जाती है। हालांकि जमीन पर विभाजन के बाद स्थानीय लोगों ने कब्जा कर वहां खेती-बाड़ी शुरू कर दी थी। प्रदेश सरकार ने 1990 में स्थानीय किसानों को ही जमीन का असली हकदार माना था और उनके नाम जमीन का आवंटन कर दिया था, लेकिन इसके खिलाफ सरकार के 2005 के एक आदेश का हवाला देते हुए इन आवंटनों को 2012 में रद्द कर दिया था और कहा गया था कि 2009 में जो निष्कांत भूमि यानी शत्रु की जमीन का आवंटन किया गया था, वह कानून 2005 में केंद्र सरकार ने रद्द कर दिया था। इसलिए किसानों को जिस कानून के तहत कृषि भूमि आवंटित की गई थी उसे रद्द कर दिया गया।
इसे लेकर विदिशा जिले के गुलाबगंज तहसील के मुंगवारा गांव के करीब एक दर्जन किसानों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। किसानों के अधिवक्ता पवन रघुवंशी ने न्यायालय को बताया कि निरसन कानून 1954 इन प्रभावित किसानों पर लागू नहीं होता, क्योंकि यह कार्रवाई पहले से ही प्रचलनशील थी। इसलिए 2012 का आदेश सरकार का अवैध था। हाई कोर्ट ने भी किसानों के अधिवक्ता पवन रघुवंशी की दलील को सही माना और 2012 में निरस्त आवंटन को बहाल करने के निर्देश दिए।
एडवोकेट पवन रघुवंशी ने बताया कि विदिशा जिले में करीब निष्कांत भूमि करीब 100 एकड़ है, जो लोग विभाजन के समय देश छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों ही बिरादरी के लोग थे। बाद में स्थानीय लोगों ने इस शत्रु भूमि पर कब्जा कर वहां खेती-बाड़ी शुरू कर दी थी। हाई कोर्ट के इस आदेश से अब पूर्व से काबिज किसानों को बड़ी राहत मिली है।

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