क्या आप जानते हैं कि हमारे शरीर के भीतर भी एक घड़ी होती है? ये भले ही दिखाई न देती हो पर शरीर के कामकाज और सेहत में इसकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। सुबह समय पर उठना, दिन में ऊर्जावान रहते हुए काम करना, सही समय पर खाना और रात में नींद आना ये सब इसी घड़ी से निर्धारित होता है। इसे बॉडी क्लॉक या सर्केडियन रिदम कहा जाता है। हालांकि जब हमारी रोजमर्रा की जिंदगी इस बॉडी क्लॉक के निर्धारित समय से बाहर निकलने लगती है, तब कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं।
सावधान: बॉडी क्लॉक बिगड़ी तो बढ़ सकता है इन बीमारियों का जोखिम, कहीं आपको भी तो नहीं है खतरा?
बॉडी क्लॉक यानी शरीर की प्राकृतिक 24 घंटे की जैविक लय बिगड़ने का असर सिर्फ नींद पर नहीं पड़ सकता। लंबे समय तक अनियमित नींद और सर्केडियन रिदम में गड़बड़ी से मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग और मूड संबंधी समस्याओं के जोखिम भी बढ़ सकता है।
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बॉडी क्लॉक ठीक रहना सेहत के लिए जरूरी
अध्ययनों से पता चलता है कि रोज सोने और जागने के समय में बहुत ज्यादा अनियमितता होने से मेटाबॉलिक और हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम बढ़ सकता है। यानी सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि आप कितने घंटे सो रहे हैं, अच्छी सेहत इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप कब सो रहे हैं और रोज कितने नियमित समय पर सो रहे हैं?
- बॉडी क्लॉक बिगड़ने का असर हर व्यक्ति पर अलग-अलग हो सकता है। कुछ लोगों में सबसे पहले नींद खराब होती है तो कुछ लोगों को दिनभर थकान और चिड़चिड़ापन बना रह सकता है।
- लंबे समय में इसका आपके वजन, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर पर भी असर पड़ सकता है।
बॉडी क्लॉक आखिर बिगड़ती कैसे है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, सूरज की रोशनी कम मिलना और सोने-जागने के समय में बदलाव का बॉडी क्लॉक पर सबसे ज्यादा असर देखा जाता है।
- रात में तेज कृत्रिम रोशनी और स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर की प्राकृतिक सोने-जागने की लय को प्रभावित कर सकती है।
- इसके अलावा रात की शिफ्ट, बार-बार यात्रा, देर रात तक जागना और दिन में प्राकृतिक रोशनी कम मिलना भी सर्केडियन रिदम को बिगाड़ सकता है।
- अगर आप रोज अलग समय पर सोते और जागते हैं, तो शरीर को नियमित संकेत नहीं मिल पाते। शुरुआत में इसका असर नींद, एकाग्रता और दिनभर की ऊर्जा पर दिखाई दे सकता है। लंबे समय तक अनियमितता बनी रहने पर इसका मेटाबॉलिक समस्याओं और हृदय स्वास्थ्य पर भी असर हो सकता है।
वजन और डायबिटीज का खतरा
बॉडी क्लॉक की गड़बड़ी का असर शरीर के मेटाबॉलिज्म पर पड़ता है। लगातार नींद की कमी मोटापा, मेटाबॉलिक सिंड्रोम और टाइप-2 डायबिटीज के जोखिमों को बढ़ाने वाली हो सकती है। मेटाबॉलिक सिंड्रोम को डायबिटीज ही नहीं लिवर की समस्याओं को बढ़ाने वाला भी पाया गया है।
इसके अलावा रात में देर से खाना और शारीरिक गतिविधि कम करने से समस्याएं और बढ़ जाती है। इसलिए सिर्फ नींद के घंटे बढ़ाना नहीं, बल्कि नियमित समय पर पर्याप्त नींद लेना भी जरूरी है।
दिल और ब्लड प्रेशर पर असर
सर्केडियन रिदम और नींद में गड़बड़ी के कारण हृदय और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य से जुड़े खतरे हो सकते हैं। अध्ययनों में नींद की कमी और अनियमितता को हृदय रोग, मेटाबॉलिक सिंड्रोम को बढ़ाने वाला पाया गया है। रात की शिफ्ट और लंबे समय सोने-जागने का पैटर्न में बदलाव भी आपके लिए मुश्किलों का कारण बन सकती है।
इन समस्याओं से कैसे बचें?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बॉडी क्लॉक को ठीक रखने के लिए सबसे पहले सोने और जागने का समय निश्चित करें और वीकेंड में भी उसे न बदलें। सुबह उठने के बाद सूरज की रोशनी लेना बॉडी क्लॉक को संकेत देता है कि अब दिन हो गया है। रात में तेज रोशनी और स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें साथ ही नियमित रूप से व्यायाम और भोजन के समय का भी ध्यान रखें। अगर रात की शिफ्ट या यात्रा के कारण नींद लगातार खराब रहती है, तो इस बारे में डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।