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ज़रा याद इन्हें भी कर लो, ये खेल जो आपने खेले हैं
Wed, 17 Dec 2014 11:56 AM IST
Updated Wed, 17 Dec 2014 11:56 AM IST
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ज़रा याद इन्हें भी कर लो, ये खेल जो आपने खेले हैं
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हवा के संग ऊंची उड़ती पतंगें अब रोमांचित नहीं करतीं। न अब चाचा चौधरी की बातें बच्चों को भाती हैं और न ही पिंकी की शरारतें। कहीं गर्मियों की छुप्पन छुपाई के लिए अब जगह नहीं बची है तो कहीं सांप-सीढ़ी का खेल बच्चों को मजा नहीं दे पा रहा है। कैरम के लिए दिलचस्पी कम हुई तो कंचे ने बरबस ही दम तोड़ दिया। जानिए ऐसे ही खेलों के बारे में जिन्हें अब बच्चे नहीं खेलते।
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कंचे-
कांच की गोलियों से खेला जाने वाला यह खेल कभी लोगों में एक ऐसा रोमांच पैदा करता था जो शायद ही आज के दौर में तीरंदाजी भी मुश्किल से दे पाए। खैर अब ये खेल परंपरागत होकर भी चलन से बाहर हो चला है।
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पतंगबाजी-
मकर संक्रांति हो, 26 जनवरी हो या फिर 15 अगस्त पतंगबाजी का खुमार हरदम तारी हुआ करता था। एक तरफ से लंबे कन्नों से बंधी तिरंगा, चांद-तारा जैसी तरह तरह की पतंगे आसमान से बातें किया करती थीं। सामने वाले की पतंग काटना और बाजू वाले की पतंग लूटना बच्चों को खूब भाता था।
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रस्सी कूदना-
स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाली किशोरियों के लिए रस्सी कूद एक बेहद रोमांचित खेल हुआ करता था। व्यायाम के तौर पर खेले जाने वाले इस खेल को स्कूल की लड़कियां बड़े टशन के साथ इसे खेला करती थीं, लेकिन अब यह बमुश्किल से दिखा करता है।
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चिड़िया उड़-
घर के बड़े बुजुर्गों के साथ टाइम पास का बेहतर खेल माना जाता था, चिड़िया उड़। एकाग्रता और चुश्ती का खेल माना जाने वाला चिड़िया उड़ भी अब बच्चों को कतई नहीं भाता।
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