अच्छी सेहत के लिए स्वच्छता बेहद जरूरी है। लेकिन ये बात जब महिलाओं के लिए कही जाती है तो ज्यादातर लोगों का इस पर ध्यान नहीं जाता। जब मासिक धर्म के दौरान जरूरी स्वच्छता को लेकर जागरुक करने स्वाति बेडेकर गुजरात के एक गांव में गईं तो गांव की महिलाओं की बातों ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। कि कैसे उस गांव की महिलाओं की जिंदगी हर महीने दांव पर लग जाती थी। महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ होने वाले इस खिलवाड़ के लिए वे खुद जागरुक होने के लिए तैयार नहीं थी। लेकिन स्वाति ने हार नहीं मानी। गीतों और लाखों तरीकों के जतन के बाद आखिर उनकी जीत हुई। आज वो वात्सल्य फाउंडेशन की मदद से सस्ते सैनेटरी पैड बना रही हैं।
स्वाति बेडेकर: जिन्होंने केवल सस्ते पैड ही नहीं बनाए बल्कि पति की मदद से दिया इन्हें नष्ट करने का उपाय
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तब स्वाति ने गांव की महिलाओं से इस बारे में बात की तो उन्होंने बताया कि अगर उनके पास ब्लीडिंग रोकने के लिए पुराना कपड़ा नहीं होता है तो वो राख और मिट्टी का इस्तेमाल करती हैं। इस भयावह परिस्थिति को सुनने के बाद स्वाति ने उन महिलाओं को जागरूक करने के बारे में सोचा। लेकिन गांव की महिलाओं ने इसे समझने से इंकार कर दिया। उन्हें तो महीने के पांच दिन दर्दनाक और सेहत के साथ खिलवाड़ करते बिताने में कोई दिक्कत नहीं थी। वो लोग पैड्स को शहर की चीज समझकर प्रयोग करने से मना करती थीं।
तब स्वाति ने इस बारे में नेट पर बता किया। इंटरनेट पर रिसर्च किया, तो पता चला कि कोयमबटूर के अरुणाचलम मोरुगनानाथाम सेनेटरी नैपकिन का एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो सस्ता होने के साथ ही काफी इफेक्टिव भी है। मैंने उस मॉडल को समझा और गाँव की कुछ महिलाओं को भी समझाया और फिर पैड्स बनाने की ट्रेनिंग शुरू कर दी।
लेकिन अब महिलाओं के सामने इन पैड्स को फेंकने की दिक्कत थी। क्योंकि गांव के पुरुषों को लगता था कि अगर ये गंदे पैड्स गांव में फेंके जाएंगे तो इससे खेत की मिट्टी खराब होगी।स्वाति की इस परेशानी का हल निकाला उनके इंजीनियर पति ने। उन्होंने ऐसी मशीन तैयार की जो इन पैड्स को आसानी से डिस्पोज कर देती थी वो भी इकोफ्रेंडली तरीके से। कम लागत में तैयार इस मशीन को गांववाले भी आसानी से खरीद सकते थे।

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