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दशहरा 2026: विजयादशमी पर शस्त्र पूजा की परंपरा क्यों निभाई जाती है? जानें इसका धार्मिक महत्व

Thu, 15 Oct 2026 12:07 PM IST
ज्योति मेहरा धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति मेहरा Updated Thu, 15 Oct 2026 12:07 PM IST
सार

दशहरे पर शस्त्र पूजन क्यों किया जाता है और इसके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं, इसके बारे में बेहद कम लोग ही जानते हैं। ऐसे में आइए इस परंपरा के बारे में विस्तार से जानते हैं। 

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Dussehra shastra puja significance tradition in hindi
दशहरा पर शस्त्र पूजा क्यों की जाती है? - फोटो : AI

दशहरा यानी विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन जहां भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और मां दुर्गा की महिषासुर पर जीत का उत्सव मनाया जाता है, वहीं कई जगहों पर शस्त्र पूजा की परंपरा भी निभाई जाती है। इस अवसर पर लोग अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ कामकाज में इस्तेमाल होने वाले औजारों की भी पूजा करते हैं। आखिर दशहरे पर शस्त्र पूजन क्यों किया जाता है और इसके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं, इसके बारे में बेहद कम लोग ही जानते हैं। ऐसे में आइए इस परंपरा के बारे में विस्तार से जानते हैं। 



शस्त्र पूजा का धार्मिक महत्व
हिंदू परंपरा में शस्त्रों को शक्ति, साहस, आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना गया है। शस्त्र पूजा का उद्देश्य केवल हथियारों की आराधना करना नहीं, बल्कि शक्ति का सदुपयोग करने और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का संकल्प लेना भी है। विजयादशमी को नई शुरुआत और विजय के लिए शुभ अवसर मानने की परंपरा है। इसी कारण कई स्थानों पर सैनिक, पुलिसकर्मी और सुरक्षा से जुड़े लोग अपने हथियारों की पूजा करते हैं। कारीगर, किसान और अन्य पेशों से जुड़े लोग भी अपने औजारों को पूजते हैं। 
 

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Dussehra shastra puja significance tradition in hindi
महाभारत से जुड़ी है शस्त्र पूजा की परंपरा - फोटो : AI

महाभारत से जुड़ी है शस्त्र पूजा की परंपरा
शस्त्र पूजा से जुड़ी एक प्रमुख मान्यता महाभारत की कथा से संबंधित है। पौराणिक परंपरा के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अस्त्र-शस्त्रों को शमी के वृक्ष में छिपाकर रखा था। अज्ञातवास पूरा होने के बाद अर्जुन ने इसी वृक्ष से अपने शस्त्र वापस निकाले और राजा विराट के राज्य की रक्षा के लिए कौरवों की सेना का सामना किया। इस प्रसंग को विजयादशमी से जोड़कर देखा जाता है। इसी वजह से कई क्षेत्रों में दशहरे पर शमी वृक्ष की पूजा और शस्त्र पूजन किया जाता है। 
 

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भगवान श्रीराम और मां दुर्गा से भी है संबंध - फोटो : AI

भगवान श्रीराम और मां दुर्गा से भी है संबंध
दशहरे का संबंध भगवान श्रीराम की रावण पर विजय से भी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रीराम ने रावण का वध करके अधर्म का अंत किया और धर्म की स्थापना की। वहीं, देवी महात्म्य की कथा में मां दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध किए जाने का वर्णन मिलता है। इन दोनों प्रसंगों में अन्याय और नकारात्मक शक्तियों पर विजय का संदेश निहित है। शस्त्र पूजा इसी भावना को आगे बढ़ाती है कि शक्ति का इस्तेमाल धर्म, न्याय और दूसरों की रक्षा के लिए होना चाहिए। 
 

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कैसे की जाती है शस्त्र पूजा? - फोटो : AI

कैसे की जाती है शस्त्र पूजा?
शस्त्र पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती है। सामान्य तौर पर दशहरे के दिन शस्त्रों और औजारों की सफाई की जाती है। इसके बाद उन्हें स्वच्छ स्थान पर रखकर पूजा की जाती है। पूजा में रोली, अक्षत, पुष्प और दीपक का इस्तेमाल किया जा सकता है। कई लोग अपने वाहनों, मशीनों, पुस्तकों और काम में आने वाले उपकरणों की भी पूजा करते हैं। दक्षिण भारत में आयुध पूजा के अवसर पर कामकाज के साधनों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। 
 

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शस्त्र पूजा से क्या संदेश मिलता है? - फोटो : AI

शस्त्र पूजा से क्या संदेश मिलता है?
शस्त्र पूजा हमें याद दिलाती है कि शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। हथियार हों या रोजमर्रा के काम आने वाले उपकरण, उनका इस्तेमाल सावधानी, अनुशासन और सही उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए। यह परंपरा अपने काम के साधनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और नई शुरुआत के लिए शुभकामनाएं मांगने का अवसर भी है। इस प्रकार, दशहरे पर शस्त्र पूजन केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि साहस, कर्तव्य, आत्मरक्षा और शक्ति के सदुपयोग का प्रतीक है। इसका मूल संदेश यही है कि विजय तभी सार्थक है, जब उसका उद्देश्य न्याय और धर्म की रक्षा करना हो।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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