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कौन हैं देवी की अष्टमातृका और सोलह मातृका? जानें इनके रहस्य, स्वरूप और पूजा का महत्व

Wed, 14 Oct 2026 04:52 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: श्वेता सिंह Updated Wed, 14 Oct 2026 04:52 PM IST
सार

हिंदू धर्म में अष्टमातृका और षोडश मातृका की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। आखिर कौन हैं ये दिव्य मातृकाएं, क्या है इनके स्वरूप का रहस्य और देवी उपासना में इनका क्या स्थान है? जानें इनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और पूजन का महत्व।

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Asht Matrika and Shodash Matrika Know Their Mystery, Significance and Worship Benefits
शारदीय नवरात्रि 2026 - फोटो : amar ujala

हिंदू धर्म में देवी उपासना की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। यहां मां दुर्गा को केवल शक्ति और साहस की अधिष्ठात्री ही नहीं, बल्कि सृष्टि की रक्षा करने वाली दिव्य ऊर्जा के रूप में भी पूजा जाता है। देवी से जुड़ी अनेक धार्मिक परंपराओं में अष्टमातृका और षोडश मातृका का विशेष स्थान है। अष्टमातृका का संबंध आठ मातृशक्तियों से है, जबकि षोडश मातृका की परंपरा में सोलह मातृशक्तियों की उपासना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन मातृशक्तियों की आराधना से भक्त देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने और जीवन में सुख, समृद्धि, ज्ञान, धैर्य तथा शांति की कामना करते हैं। आइए जानते हैं अष्टमातृका और षोडश मातृका कौन हैं और देवी पूजन में इनका क्या महत्व है।

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Asht Matrika and Shodash Matrika Know Their Mystery, Significance and Worship Benefits
शारदीय नवरात्रि 2026 - फोटो : ai

कौन हैं देवी की अष्टमातृकाएं?
हिंदू धार्मिक परंपरा में अष्टमातृकाओं को आठ दिव्य मातृशक्तियों के रूप में जाना जाता है। देवी माहात्म्य सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और शाक्त परंपराओं में इन मातृशक्तियों का उल्लेख मिलता है। इन्हें देवी की ऐसी शक्तियों के रूप में देखा जाता है, जो दुष्ट शक्तियों के विनाश और धर्म की रक्षा से जुड़ी हैं। प्रचलित परंपरा में अष्टमातृकाओं के नाम ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी, चामुंडा और नरसिंही बताए जाते हैं। हालांकि, अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में नामों तथा स्वरूपों में कुछ अंतर मिल सकता है। ब्राह्मी को ब्रह्मा की शक्ति, माहेश्वरी को भगवान शिव की शक्ति और कौमारी को भगवान कार्तिकेय की शक्ति से संबंधित माना जाता है। इसी प्रकार वैष्णवी का संबंध भगवान विष्णु, वाराही का वराह स्वरूप, इंद्राणी का इंद्र और नरसिंही का भगवान नरसिंह के स्वरूप से जोड़ा जाता है। चामुंडा देवी को दुष्ट शक्तियों के संहार और नकारात्मकता पर विजय की प्रतीक माना जाता है। इन मातृकाओं के अलग-अलग स्वरूप देवी की व्यापक शक्ति और विविध गुणों को दर्शाते हैं। इनकी उपासना में साहस, विवेक, धर्म की रक्षा और अधर्म पर विजय जैसे भावों को विशेष महत्व दिया जाता है।

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क्या है अष्टमातृका की पूजा का धार्मिक महत्व? - फोटो : instagram

क्या है अष्टमातृका की पूजा का धार्मिक महत्व?
अष्टमातृकाओं की पूजा का संबंध शक्ति उपासना की प्राचीन परंपराओं से है। कई धार्मिक अनुष्ठानों में मातृकाओं का आह्वान करके पूजा की जाती है। विशेष रूप से कुछ शाक्त परंपराओं, मंदिरों और तांत्रिक पूजा पद्धतियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। धार्मिक मान्यता है कि मातृशक्तियों की आराधना से भक्त को साहस, सुरक्षा, आत्मबल और विवेक की प्राप्ति की कामना करनी चाहिए। इन देवियों के स्वरूप यह संदेश भी देते हैं कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना धैर्य और दृढ़ता के साथ करना चाहिए। अष्टमातृकाओं को केवल अलग-अलग देवी स्वरूपों के रूप में ही नहीं, बल्कि देवी की व्यापक शक्ति के विभिन्न रूपों के तौर पर भी समझा जाता है। यही कारण है कि शक्ति उपासना में इनका विशेष महत्व माना गया है।

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शारदीय नवरात्रि 2026 - फोटो : amar ujala

षोडश मातृका कौन हैं और इनकी पूजा क्यों होती है?
अष्टमातृकाओं की तरह षोडश मातृका की उपासना भी हिंदू धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। षोडश का अर्थ सोलह होता है, इसलिए इस परंपरा में सोलह मातृशक्तियों की पूजा की जाती है। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, क्षेत्रों और अनुष्ठान पद्धतियों में इनके नामों तथा क्रम में अंतर मिल सकता है। कुछ प्रचलित सूचियों में गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजय, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, शांति, पुष्टि, धृति और तुष्टि जैसी शक्तियों का उल्लेख मिलता है। हालांकि, षोडश मातृकाओं की सूची सभी परंपराओं में एक समान नहीं है। इन नामों में कई ऐसे गुणों और धार्मिक भावों का संकेत मिलता है, जिन्हें जीवन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। उदाहरण के लिए, मेधा का संबंध बुद्धि और समझ से, धृति का धैर्य से, पुष्टि का पोषण और समृद्धि से तथा शांति का मन की स्थिरता से जोड़ा जाता है। स्वाहा और स्वधा का संबंध वैदिक यज्ञ परंपरा से भी है। इस प्रकार, षोडश मातृका की उपासना में देवी के विविध स्वरूपों और जीवन के अलग-अलग पक्षों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।

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अष्टमातृका और षोडश मातृका में अंतर - फोटो : instagram

अष्टमातृका और षोडश मातृका में क्या अंतर है?
अष्टमातृका और षोडश मातृका के बीच सबसे स्पष्ट अंतर उनकी संख्या और पूजा की परंपरा का है। अष्टमातृका में आठ मातृशक्तियों की उपासना की जाती है, जबकि षोडश मातृका में सोलह मातृशक्तियों को पूजा में शामिल किया जाता है। अष्टमातृकाओं का उल्लेख विशेष रूप से देवी की शक्तियों, दैवी संरक्षण और दुष्ट शक्तियों के संहार से जुड़ी परंपराओं में मिलता है। वहीं, षोडश मातृका की पूजा कुछ धार्मिक संस्कारों और विशेष अनुष्ठानों में की जाती है। इन दोनों परंपराओं का स्वरूप संबंधित ग्रंथ, संप्रदाय और पूजा पद्धति के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए दोनों को एक ही सूची या समान अनुष्ठान मानने के बजाय उनकी विशिष्ट धार्मिक परंपराओं के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।

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