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Saraswati Puja 2026: वसंत पंचमी पर ही क्यों होती है सरस्वती पूजा? शास्त्रों में छिपा है गूढ़ रहस्य
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: श्वेता सिंह
Updated Thu, 22 Jan 2026 11:51 AM IST
सार
Saraswati Puja Importance: वसंत पंचमी का पर्व नई साधना, अध्ययन और विद्या आरंभ का प्रतीक है। यह तिथि मन, बुद्धि और चित्त के परिष्कार और अज्ञान के नाश का संदेश देती है। ऋग्वेद में माता सरस्वती को नदी और देवी दोनों रूपों में वर्णित किया गया है, जो पवित्रता, प्रेरणा और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक हैं। उपनिषदों और पुराणों में उनका दार्शनिक स्वरूप ब्रह्मविद्या और विवेक से जोड़ा गया है।
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saraswati puja 2026
- फोटो : amar ujala
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Saraswati Puja Significance: 23 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी का पावन पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाएगा। यह दिन विशेष रूप से ज्ञान, विद्या और सृजन की देवी मां सरस्वती की उपासना के लिए समर्पित माना जाता है। वसंत पंचमी न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में नवचेतना और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी है। इस दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है, जो समृद्धि, आशा और बौद्धिक विकास का संकेत देता है।
वसंत पंचमी और सरस्वती तत्त्व का अद्भुत संबंध
योग और वेदांत के अनुसार, वसंत पंचमी न केवल ऋतुओं के परिवर्तन का प्रतीक है, बल्कि यह अध्ययन, साधना और नई विद्या आरंभ करने का श्रेष्ठ समय भी माना जाता है। प्राचीन काल से ही गुरुकुलों में विद्यारंभ संस्कार इसी दिन संपन्न होते रहे हैं। माता सरस्वती ज्ञान, विवेक, वाणी और स्मृति की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी पूजा का उद्देश्य साधक के मन, बुद्धि और चित्त को परिष्कृत करना और अज्ञान के अंधकार को दूर करना है। जैसे बसंत ऋतु में प्रकृति में हरियाली, पुष्प और नवीन जीवन का संचार होता है, वैसे ही सरस्वती की उपासना साधक की चेतना में ज्ञान और विवेक का अंकुर लगाती है।
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ऋग्वेद में मां सरस्वती का उल्लेख
ऋग्वेद में माता सरस्वती का उल्लेख नदी और देवी दोनों रूपों में मिलता है। वे पवित्रता, जीवनदायिनी शक्ति और प्रेरणा का स्रोत मानी गई हैं। प्रसिद्ध वैदिक मंत्र “अम्बितमे, नदीतमे, देवितमे सरस्वति”
स्पष्ट करता है कि सरस्वती मातृत्व, प्रवाह और दिव्यता का समग्र रूप हैं। वेदों में वाणी, यज्ञ और मंत्र की सिद्धि उनकी कृपा से मानी जाती है। बिना सरस्वती तत्त्व के ज्ञान, वेदपाठ और साधना अधूरी मानी जाती हैं।
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उपनिषद और पुराणों में दार्शनिक दृष्टि
उपनिषदों में सरस्वती को ब्रह्मविद्या का प्रतिनिधि माना गया है, जो जीव को अज्ञान से मुक्त कर ब्रह्म का साक्षात्कार कराती है। पुराणों में उन्हें भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री और सृष्टि की शक्ति कहा गया है। देवी भागवत और स्कंद पुराण के अनुसार, वे माया और भ्रम से परे ले जाने वाली चेतना हैं। ब्रह्मा को जो विवेक और सृजन शक्ति प्राप्त होती है, उसका स्रोत सरस्वती तत्त्व ही है।
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प्रतीकों का महत्व
माता सरस्वती का श्वेत रंग शुद्धता, सात्त्विकता और निर्विकार ज्ञान का प्रतीक है। उनका वीणा धारण करना यह दर्शाता है कि नाद और शब्द ही ब्रह्म तक पहुँचने का मार्ग हैं। मंत्र-जप, भजन और स्वाध्याय इसी नाद-तत्त्व को जाग्रत करते हैं। उनका वाहन हंस विवेक का प्रतीक है, जो दूध और पानी को अलग कर सकता है, यानी सत्य और असत्य के बीच भेद करना सिखाता है।
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