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गणेश चतुर्थी 2026: कैसे बने गणपति प्रथम पूज्य, जानें गणेश चतुर्थी का महत्व और पूजन का शुभ मुहूर्त

Thu, 10 Sep 2026 11:26 AM IST
ज्योति मेहरा पं.मनोज कुमार द्विवेदी
पं.मनोज कुमार द्विवेदी Published by: ज्योति मेहरा Updated Thu, 10 Sep 2026 11:26 AM IST
सार

गणेश चतुर्थी सनातन धर्म का प्रमुख पर्व है। इस दिन प्रथम पूज्य भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि विघ्नहर्ता गणपति की आराधना से जीवन में सुख, समृद्धि और मंगल का आगमन होता है। आइए जानते हैं गणपति के जन्म से लेकर प्रथम पूज्य बनने तक की पूरी कथा।

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Ganesh chaturthi 2026 ganpati janam katha puja muhurat
क्यों सबसे पहले होती है गणपति की पूजा - फोटो : AI

गणों के अधिपति श्री गणेश जी प्रथम पूज्य हैं सर्वप्रथम उन्हीं की पूजा की जाती है, उनके बाद अन्य देवताओं की पूजा की जाती है। किसी भी कर्मकांड में श्री गणेश जी की पूजा-आराधना सबसे पहले की जाती है क्योंकि गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, और आने वाले सभी विघ्नों को दूर कर देते हैं।



ऐसे हुआ गजानन का जन्म
शिवपुराण के रुद्रसंहिता खंड के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसे द्वारपाल बना दिया, और स्वयं स्नान करने चली गईं। जब भगवान शिव वापस लौटे और बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया, तब शिव ने युद्ध में अपने गणों की हार के बाद उस बालक का सिर त्रिशूल से काट दिया। माता पार्वती जब लौटकर आईं और देखा तो शोक और क्रोध में संसार को नष्ट करने की घोषणा कर दी। सभी देवताओं ने माता की स्तुति की और तब भगवान शिव ने एक हाथी का मस्तक उस बालक के शरीर पर स्थापित कर दिया इस प्रकार गजानन का जन्म हुआ। उसी क्षण भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया हे गिरिजा नंदन आप देवताओं में सबसे पहले पूजे जाओगे और सभी गणों के अधिपति कहलाओगे।

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लोक मंगल के देवता हैं श्री गणेश - फोटो : freepik

लोक मंगल के देवता हैं श्री गणेश
श्री गणेश जी लोक मंगल के देवता हैं, लोक मंगल उनका उद्देश्य है परंतु जहाँ भी अमंगल होता है, उसे दूर करने के लिए श्री गणेश अग्रणी रहते हैं। गणेश जी रिद्वी और सिद्धी के स्वामी हैं। इसलिए उनकी कृपा से संपदा और समृद्धि का कभी अभाव नहीं रहता है। श्री गणेश जी को दूर्वा और मोदक अत्यंत प्रिय है।

14 सितंबर को होगी श्री गणेश जी की स्थापना
इस वर्ष 14 सितंबर सोमवार को श्री गणेश चतुर्थी है | चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 14 सितंबर को प्रातः काल 7 बजकर 6 मिनट पर होगा और 15 सितंबर को प्रातः काल 7 बजकर 44 पर चतुर्थी तिथि का समापन होगा, इसलिए मध्याह्न व्यापनी चतुर्थी में 14 सितंबर को श्री गणेश जी की स्थापना होगी और इसी के साथ 11 दिवसीय श्री गणेश महोत्सव का शुभारंभ होगा।

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क्यों कहलाते हैं गणेश जी लंबोदर? - फोटो : freepik

गणेश जी की स्थापना का शुभ मुहूर्त
घरों और पंडालों में श्री गणेश जी की मूर्ति स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 10 बजकर 50 मिनट से दोपहर 1 बजकर 18 मिनट तक रहेगा। 25 सितंबर अनंत चतुर्दशी को श्री गणेश जी की प्रतिमाओं का विसर्जन होगा।

भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्थी की महिमा
भाद्रपद की शुक्लपक्ष चतुर्थी भगवान गणपति की प्राकट्य तिथि है। इस तिथि को गणेश जी की पूजा उपासना की जाती है पूरे देश में ग्यारह दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव का आरंभ भी इसी दिन होता है। प्रत्येक माह कृष्णपक्ष की चतुर्थी को श्री गणेश चतुर्थी का व्रत किया जाता है। इस तरह यह व्रत प्रतिवर्ष तेरह बार मनाया जाता है क्योंकि भाद्रपद में दोनों चतुर्थी में यह व्रत किया जाता है, शुक्लपक्ष में केवल भाद्रपद माह की चतुर्थी को ही पूजा की जाती है। यह तिथि अति विशिष्ट है। इस तिथि की बड़ी महिमा है और इस तिथि को व्रत उपवास करके अनेक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। इस तिथि को रात्रि में चन्द्र दर्शन निषेध माना जाता है, जबकि शेष चतुर्थियों में चन्द्र दर्शन पुण्यफलदायक माना जाता है।
 

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क्यों कहलाते हैं गणेश जी लंबोदर? - फोटो : freepik

क्यों कहलाते हैं गणेश जी लंबोदर?
ज्योतिषशास्त्र में तीन गणों का उल्लेख मिलता है, देव, मनुष्य और राक्षस। गणपति समान रूप से देवलोक, भूलोक और दानव लोक में प्रतिष्ठित हैं। श्री गणेश जी ब्रह्मस्वरूप हैं और उनके उदर में यह तीनों लोक समाहित हैं। इसी कारण इनको लंबोदर कहते हैं उनके उदर में सब कुछ समा जाता हैं और गणेश जी सब कुछ पचाने की क्षमता रखते हैं। लंबोदर होने का अर्थ है जो कुछ उनके उदर में चला जाता है, फिर वहाँ से निकलता नहीं है। गणेश जी परम रहस्यमय हैं, उनके इस रहस्य को कोई भेद नहीं सकता है।
 

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गणेशोत्सव का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व - फोटो : freepik

गणेशोत्सव का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
भाद्रपद चतुर्थी को गणपति स्थापना से आरंभ होकर चतुर्दशी को होने वाले विसर्जन तक गणपति विविध रूपों में पूरे देश में विराजमान रहते हैं। उन्हें मोदक तो प्रिय हैं ही, परंतु गणपति अकिंचन को भी मान देते हैं, अतः दूर्वा, नैवेद्य भी उन्हें उतने ही प्रिय हैं। गणेशोत्सव जन-जन को एक सूत्र में पिरोता है। अपनी संस्कृति और धर्म का यह अप्रतिम सौंदर्य भी है, जो सबको साथ लेकर चलता है। श्रावण की पूर्णता, जब धरती पर हरियाली का सौंदर्य बिखेर रही होती है, तब मूर्तिकार के घर-आँगन में गणेश प्रतिमाएं आकार लेने लगती हैं। प्रकृति के मंगल उदघोष के बाद मंगलमूर्ति की स्थापना का समय आना स्वाभाविक है।

पं.मनोज कुमार द्विवेदी ज्योतिषाचार्य

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