गणों के अधिपति श्री गणेश जी प्रथम पूज्य हैं सर्वप्रथम उन्हीं की पूजा की जाती है, उनके बाद अन्य देवताओं की पूजा की जाती है। किसी भी कर्मकांड में श्री गणेश जी की पूजा-आराधना सबसे पहले की जाती है क्योंकि गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, और आने वाले सभी विघ्नों को दूर कर देते हैं।
गणेश चतुर्थी 2026: कैसे बने गणपति प्रथम पूज्य, जानें गणेश चतुर्थी का महत्व और पूजन का शुभ मुहूर्त
गणेश चतुर्थी सनातन धर्म का प्रमुख पर्व है। इस दिन प्रथम पूज्य भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि विघ्नहर्ता गणपति की आराधना से जीवन में सुख, समृद्धि और मंगल का आगमन होता है। आइए जानते हैं गणपति के जन्म से लेकर प्रथम पूज्य बनने तक की पूरी कथा।
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लोक मंगल के देवता हैं श्री गणेश
श्री गणेश जी लोक मंगल के देवता हैं, लोक मंगल उनका उद्देश्य है परंतु जहाँ भी अमंगल होता है, उसे दूर करने के लिए श्री गणेश अग्रणी रहते हैं। गणेश जी रिद्वी और सिद्धी के स्वामी हैं। इसलिए उनकी कृपा से संपदा और समृद्धि का कभी अभाव नहीं रहता है। श्री गणेश जी को दूर्वा और मोदक अत्यंत प्रिय है।
14 सितंबर को होगी श्री गणेश जी की स्थापना
इस वर्ष 14 सितंबर सोमवार को श्री गणेश चतुर्थी है | चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 14 सितंबर को प्रातः काल 7 बजकर 6 मिनट पर होगा और 15 सितंबर को प्रातः काल 7 बजकर 44 पर चतुर्थी तिथि का समापन होगा, इसलिए मध्याह्न व्यापनी चतुर्थी में 14 सितंबर को श्री गणेश जी की स्थापना होगी और इसी के साथ 11 दिवसीय श्री गणेश महोत्सव का शुभारंभ होगा।
गणेश जी की स्थापना का शुभ मुहूर्त
घरों और पंडालों में श्री गणेश जी की मूर्ति स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 10 बजकर 50 मिनट से दोपहर 1 बजकर 18 मिनट तक रहेगा। 25 सितंबर अनंत चतुर्दशी को श्री गणेश जी की प्रतिमाओं का विसर्जन होगा।
भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्थी की महिमा
भाद्रपद की शुक्लपक्ष चतुर्थी भगवान गणपति की प्राकट्य तिथि है। इस तिथि को गणेश जी की पूजा उपासना की जाती है पूरे देश में ग्यारह दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव का आरंभ भी इसी दिन होता है। प्रत्येक माह कृष्णपक्ष की चतुर्थी को श्री गणेश चतुर्थी का व्रत किया जाता है। इस तरह यह व्रत प्रतिवर्ष तेरह बार मनाया जाता है क्योंकि भाद्रपद में दोनों चतुर्थी में यह व्रत किया जाता है, शुक्लपक्ष में केवल भाद्रपद माह की चतुर्थी को ही पूजा की जाती है। यह तिथि अति विशिष्ट है। इस तिथि की बड़ी महिमा है और इस तिथि को व्रत उपवास करके अनेक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। इस तिथि को रात्रि में चन्द्र दर्शन निषेध माना जाता है, जबकि शेष चतुर्थियों में चन्द्र दर्शन पुण्यफलदायक माना जाता है।
क्यों कहलाते हैं गणेश जी लंबोदर?
ज्योतिषशास्त्र में तीन गणों का उल्लेख मिलता है, देव, मनुष्य और राक्षस। गणपति समान रूप से देवलोक, भूलोक और दानव लोक में प्रतिष्ठित हैं। श्री गणेश जी ब्रह्मस्वरूप हैं और उनके उदर में यह तीनों लोक समाहित हैं। इसी कारण इनको लंबोदर कहते हैं उनके उदर में सब कुछ समा जाता हैं और गणेश जी सब कुछ पचाने की क्षमता रखते हैं। लंबोदर होने का अर्थ है जो कुछ उनके उदर में चला जाता है, फिर वहाँ से निकलता नहीं है। गणेश जी परम रहस्यमय हैं, उनके इस रहस्य को कोई भेद नहीं सकता है।
गणेशोत्सव का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
भाद्रपद चतुर्थी को गणपति स्थापना से आरंभ होकर चतुर्दशी को होने वाले विसर्जन तक गणपति विविध रूपों में पूरे देश में विराजमान रहते हैं। उन्हें मोदक तो प्रिय हैं ही, परंतु गणपति अकिंचन को भी मान देते हैं, अतः दूर्वा, नैवेद्य भी उन्हें उतने ही प्रिय हैं। गणेशोत्सव जन-जन को एक सूत्र में पिरोता है। अपनी संस्कृति और धर्म का यह अप्रतिम सौंदर्य भी है, जो सबको साथ लेकर चलता है। श्रावण की पूर्णता, जब धरती पर हरियाली का सौंदर्य बिखेर रही होती है, तब मूर्तिकार के घर-आँगन में गणेश प्रतिमाएं आकार लेने लगती हैं। प्रकृति के मंगल उदघोष के बाद मंगलमूर्ति की स्थापना का समय आना स्वाभाविक है।
पं.मनोज कुमार द्विवेदी ज्योतिषाचार्य
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